बड़ा चार धाम में से एक ओडिशा के पुरी में हर साल बड़े धुमधाम के साथ भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की सवारी निकाली जाती है, जिसे रथ यात्रा के नाम से जाना जाता है। इस साल रथ यात्रा 7 जुलाई यानी कल निकाली जाएगी। पुरी के जगन्नाथ मंदिर से तीन विशालकाय रथों पर सवार होकर तीनों भाई-बहनों की सवारी निकाली जाती है जो गुंडिचा मंदिर तक जाती है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार गुंडिचा मंदिर भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर है। इन रथों का निर्माण अक्षय तृतिया के दिन से शुरू हो जाता है। मान्यता है कि जगन्नाथ देव की रथ यात्रा में शामिल होने का मतलब 100 यज्ञों के बराबर पुण्य कमाने के समान होता है।

जगन्नाथ मंदिर से निकली रथ यात्रा को पुरी में ही मौजूद गुंडिचा मंदिर तक पहुंचने में कई घंटों का समय लग जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के जगन्नाथ स्वरूप की पूजा करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ से इस समय पुरी पट चुका होता है। सड़कों पर चलने की जगहें भी नहीं रहती है। लोग नाचते-गाते और अपने प्रभु का गुणगान करते हुए आगे बढ़ते हैं।
कहा जाता है कि एक बार जिसने भी भगवान जगन्नाथ का रथ खींचने वाली रस्सी को हाथ लगा लिया, वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है। लेकिन क्या आपको पता है, जिस रथ को छुने भर से इतना पुण्य मिलता है, वहीं रथ हर साल एक मजार के सामने कुछ पल के लिए जरूर रुकता है। आखिर क्यों जो भगवान दुनिया भर के पालनहार हैं, उनके रथ का पहिया एक मजार के सामने रुक जाता है?

किसका है मजार?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा जिस मजार के सामने आकर हर साल रुकती है, वह मजार इस्लाम धर्म को मानने वाले एक व्यक्ति का है, जिसका नाम सालबेग बताया जाता है। The Quint की एक रिपोर्ट के अनुसार मुगल सम्राट जहांगीर के शासनकाल में 1 साल के लिए बंगाल का सूबेदार (1607-1608) था जहांगीर कुली खान, जिसे लालबेग के नाम से भी जाना जाता था।
ओडिशा में अपनी सैन्य यात्रा के दौरान एक युवा ब्राह्मण विधवा महिला की सुन्दरता ने उसे आकर्षित किया। उसने जबरदस्ती उस महिला से शादी की। जब उसका बेटा पैदा हुआ तो उसका नाम सालबेग रखा गया।
मंदिर में नहीं कर सका प्रवेश
कहा जाता है कि सालबेग अपनी मां की तरह भगवान जगन्नाथ का बहुत बड़ा भक्त था और भगवान के प्रति उसके मन में अपार श्रद्धा थी। लेकिन हिंदू धर्म का नहीं होने की वजह से उसे मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। वह भगवान जगन्नाथ के दर्शन करना चाहता था, लेकिन ऐसा वह कभी नहीं कर पाया।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार एक बार भगवान जगन्नाथ ने अपने भक्त को सपने में दर्शन दिया और भगवान का दर्शन पाते ही सालबेग की मृत्यु हो गयी। इसके बाद उसकी मजार बना दी गयी।
हर साल क्यों रुकता है रथ?
अगली बार जब उसके मजार के सामने से भगवान जगन्नाथ का रथ निकला तो उसके पहिये खुद-ब-खुद वहां रुक गये। काफी प्रयास करने के बावजूद जब भगवान जगन्नाथ का रथ अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ तो रथ को खींच रहे लोगों ने भगवान से सालबेग की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
इसके बाद ही रथ आगे बढ़ सका। तब से हर साल रथ यात्रा के समय भगवान जगन्नाथ का रथ कुछ देर के लिए अपने भक्त सालबेग की मजार के सामने जरूर रुकता है और लोग उसकी आत्मा की शांति के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं।
सालों बाद आज भी जब भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है तो भगवान का रथ कुछ देर के लिए अपने भक्त सालबेग की मजार पर उसे सम्मान देने के लिए जरूर रुकता है, जिसके बाद ही रथ को आगे बढ़ाया जाता है।



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