
[नेटिवप्लैनेट की Exclusive पेशकश Origin] अचानक लखनऊ की आबो हवा का मिजाज़ बदल गया। एक चर्चा अचानक शुरू हो गई... चर्चा है लखनऊ का नाम बदल कर लक्षमणपुरी करने की। जी हां उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के सांसद संगमलाल गुप्ता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर लिख कर मांग की है कि प्रदेश की राजधानी के नाम में गुलामी की झलक दिखाई देती है और भगवान राम ने यह शहर अपने छोटे भाई लक्षमण को यह शहर भेंट किया था, इसलिए इसका नाम बदलकर लखनऊ की जगह लखनपुरी या लक्षमणपुरी कर देना चाहिए।
खैर सांसद जी स्वयं जो न तो लखनऊ में पैदा हुए और न लखनऊ में इन्होंने पढ़ाई की। प्रतापगढ़ से विधायक रहे सांसद जी की राजनीति का जरिया जरूर यह लखनऊ शहर बना है। खैर राजनीति नेटिवप्लैनेट का विषय नहीं है, लेकिन हां, हम अपने लेख के माध्यम से सांसद महोदय को वह रिसर्च जरूर पढ़ा सकते हैं, जो देश के सबसे प्राचीन शहर वाराणसी स्थित महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में हुआ। 1988 में प्रोफेसर शैलेंद्र पंथरी के सानिध्य में यह रिसर्च आनंद प्रकाश सिंह ने किया और इसी रिसर्च के बाद आनंद सिंह, डॉ. आनंद सिंह बन गये। यानि कि उन्हें पीएचडी की डिग्री से नवाज़ा गया। हम उन्हीं के रिसर्च के कुछ अंश आपके सामने रख रहे हैं, जिसमें हम आपको इतिहास के उन पन्नों पर ले जाएंगे, जहां लखनऊ शहर के नाम करण पर विस्तार से चर्चा की गई है।
शोधपत्र का पहला चैप्टर ही Nomenclature of Lucknow - लखनऊ का नामकरण है। हम इसी के आधार पर लखनऊ के अलग-अलग नामों से जुड़ा इतिहास और प्रमाण के बारे में बतायेंगे।

पहला नाम- लक्षमणपुर
कथन- रिसर्च के अनुसार यह शहर एक समय में कौसल साम्राज्य का एक हिस्सा था। ऐसा कहा जाता है कि यहां पर भगवान राम के भाई लक्षमण ने शासन किया था। और उन्होंने ही इस नगर का नाम लक्षमणपुर रखा था। आगे चलकर नगर का नाम लक्षमनावती रख दिया गया।
प्रमाण 1- शहर में मच्छीभवन के पास स्थित लक्षमण टीला इस कथन का समर्थन करता है कि शहर का पुराना नाम लक्षमणपुर था।
प्रमाण 2- इसी लक्षमण टीला के शीर्ष पर एक बड़ा छिद्र है। कहा जाता है कि यह बड़ा गड्ढा सर्प-राज शेषनाग का निवास स्थान है। इसीलिए एक लंबे समय से सर्प देवता की पूजा के रूप में इस गड्ढे में श्रद्धालु फूल, फल, प्रसाद आदि चढ़ाते आ रहे हैं। आदिकथाओं के अनुसार चूंकि लक्षमण शेषनाग के अवतार थे, इसलिए शहर का नाम लक्षमणपुर पड़ा।

दूसरा नाम- लखनपुर
कथन 1- जैसा कि आपने पढ़ा कि भाजपा सांसद ने नया नाम लखनपुरी के रूप में प्रस्तावित किया है। दरअसल इसके पीछे की वजह शहर का वो नाम है, जो एक दूध वाले के नाम पर है। कहा जाता है कि एक दूध बेचने वाला, जिसका नाम लखन था। कहा जाता है कि ईश्वर की लखन पर ऐसी कृपा हुई कि वो बहुत अमीर बन गया और आगे चलकर उसने एक शहर की स्थापना की, जिसका नाम लखनपुर रखा गया।
प्रमाण- इस कहानी के कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं हैं।
कथन 2- मच्छीभवन के पास अवध के सूबेदार द्वारा बनवाये गये किले का नाम, "किला लखना" रखा गया, जोकि प्रसिद्ध हिन्दू आर्किटेक्ट लखना के नाम पर था।
प्रमाण- उस दौरान शेख यहां पर शासन करने आये और पुराने लक्षमनावती शहर का विकास किया और शहर का नाम लखनपुर रख दिया।

तीसरा और वर्तमान नाम- लखनऊ
कथन - शहर का यह नाम करीब एक हजार साल पहले से है। तब से लेकर अब तक दरअसल "लखनऊ" नाम ही लखनऊ की शान है।
प्रमाण 1- 1300 ई. के मशहूर दार्शनिक इबनी बतूता ने अपनी एक रचना में शहर का नाम "अलखनऊ" और "लखनऊ" का जिक्र किया।
प्रमाण 2- 1500 ई. में मुगल शासक अकबर के शासनकाल में सभाओं के आयोजनकर्ता अबुल फ़ज़ल ने अपने दस्तावेज़ में अवध सूबे को "लखनऊ सरकार" लिखकर संबोधित किया। लेकिन उन्होंने कभी शहर की उत्पत्ति का जिक्र नहीं किया।
प्रमाण 3- लखनऊ प्राचीन इतिहास में बहुत प्रसिद्ध शहर नहीं था। दरअसल 1800 शदाब्दी में नवाब आसफउद्दौला ने शहर का भरपूर विकास किया। तमाम इमारतों का निर्माण उनके कार्यकाल में हुआ, जो आज भी लखनऊ की शान हैं। खास बात यह है कि उन्होंने शहर का नाम लखनऊ के सबसे प्रसिद्ध वास्तुकार लखना के नाम पर ही शहर का नाम लखनऊ रखा।

अंग्रेज़ों ने भी की थी लखनऊ के नाम से छेड़छाड़
इतिहास के पन्ने यह भी बताते हैं कि 1904 में ब्रिटिश शासन द्वारा प्रकाशित होने वाले सरकारी गैजेट संख्या पी. 143 में लखनऊ के नाम को Lakhna और Lyakhna लिखा गया। हालांकि इन गलत नामों की उत्पत्ति भी असली नाम लखनऊ से हुई।
हिन्दू-मुस्लिम एकता की बेशकीमती मिसाल है लखनऊ
ज़र सोचिए लोग कहते हैं कि नवाब आसफउद्दौला ने शहर का नाम लखनपुर से बदलकर लखनऊ किया, इसमें कितना सच है, यह आप इस शोध में मौजूद तथ्यों से समझ सकते हैं। इन सबके बीच सबसे अहम बात यह है कि नवाब आसफउद्दौला चाहते तो शहर का विकास करने के बाद किसी भी मुस्लिम व्यक्ति के नाम पर शहर का नाम रख सकते थे, चाहते तो अपने ही नाम आसफ पुरी, या बेगम हज़रत पुरी, कुछ भी, लेकिन उन्होंने उस समय के शहर के सबसे सम्मानीय वास्तुकार लखना के नाम पर यह नाम रखा और ऐसा करके उन्होंने शहर की गंगा-जमुनी तहज़ीब की बड़ी मिसाल पेश की।



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