
बिहारशरीफ बिहार राज्य स्थित भारत का एक प्राचीन शहर है, जो वर्तमान में नालंदा जिले का मुख्यालय है। यह शहर मस्जिद, कब्रों के रूप में गुप्त काल के दौरान की इस्लामी वास्तुकला को भली भांति चित्रित करता है। यह प्राचीन समय में एक समृद्ध और सक्रिय शहर हुआ करता था। इसके अलावा यह प्राचीन स्थल गौतम बुद्ध के जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है, इसलिए यहां बौद्ध अनुयायियों का आना जाना लगा रहता है।
इतिहास पर और गहराई से नजर डालें तो पता चलता है कि बिहारशरीफ कभी पाल शासकों की राजधानी हुआ करता था, जिसमें 5वीं शताब्दी के गुप्त स्तंभ शामिल हैं। यह बाबा मणिराम के अखाड़ा में आयोजित होने वाले लंगोट मेले और, सुफी संत शेख शरीफुद्दीन याह्या मनेरी की दरगाह के लिए भी काफी प्रसिद्ध है। आइए जानते हैं पर्यटन के लिहाज से यह प्राचीन शहर आपके लिए कितना खास है जानिए यहां के चुनिंदा सबसे खास स्थलों के बारे में।

शरीफ-उद-दीन का मकबरा
आप बिहाशरीफ भ्रमण की शुरुआत यहां के प्रसिद्ध सूफी संत हजरत मखदूम शाह शरीफ-उद-दीन के मकबरे से कर सकते हैं। यह मकबरा बिहारशरीफ में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले स्थानों में शामिल है। स्थानीय नदी के दक्षिणी तट पर स्थित इस मकबरे का निर्माण 1569 में करवाया गया था।
स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोग सावान महीने के के पांचवें दीन यहां संत मखदूम की मृत्य की सालगिरह मनाने और उनकी शिक्षाओं का प्रचा करने के लिए इकट्टा होते हैं। इसके अलावा यह मकबरा धर्मनिरपेक्षता और विविधता में एकता को भी प्रदर्शित करता है, यहां मुस्लिमों के साथ-साथ गैर मुस्लिम भी आते हैं।

मलिक इब्राहिम वाया का मकबरा
मखदूम शाह के मकबरे को देखने के बाद आप यहां के अन्य आकर्षण मलिक इब्राहिम वाया का मकबरा भी देख सकते हैं। यह एक खास प्राचीन स्थल है जो आपको सीधे बिहारशरीफ के अतीत की ओर ले जाएगा। इस स्थल के भ्रमण के बाद आपको शहर की वास्तविक जड़ों के बारे में पता चलेगा। बड़ी पहाड़ी पर स्थित यह स्थल जारसंध की जेल के मलबे से घिरा हुआ है। हरा भरा यह पहाड़ी स्थल आपको निश्चत रूप से आत्मिक और मानसिक शांति का अनुभव कराएगा।
इतिहास पर गहराई से नजर डालने पर पता चलता है कि मलिक इब्राहिम वाया अपनी प्रशासनिक उपलब्धियों के कारण मुस्लिम शासकों के बीच एक लोकप्रिय चेहरा बने और बिहार शरीफ पर शासन करने वाले महानतम राजाओं में शामिल हुए। इस मकबरे का निर्माण 1596 में इस महान राजा को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए बनवाया गया था।

ओदंतपुरी
अगर आप इतिहास प्रेमी हैं तो आपको बिहार शरीफ के ओदंतपुरी का भ्रमण अवश्य करना चाहिए। इस स्थल को ओदंतुपुरा और उदंदापुर (प्राचीन ओदंतपुरी विश्वविद्यालय) के नाम से भी जाना जाता है, जो 8 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में एक प्रसिद्ध विहार औऱ बौद्ध धर्म और बौद्ध संस्कृति सीखने का प्रमुख केंद्र था। माना जाता है कि इस स्थल की खोज पाल राजवंश के गोपाल नाम से शासक ने इसकी खोज की थी नालंदा विश्वविद्यालय के साथ ओदंतपुरी को भी महान शिक्षण केंद्रों में गिना जाता है।
हालांकि अब यह स्थल ध्वंसावशेष स्थित में मौजूद है। इस विश्वविद्यालय को 13वीं शताब्दी के दौरान , मुगल सम्राट के स्थानीय सेना प्रमुख बख्तियार खिलजी ने जला दिया था। इतिहास प्रेमी इस स्थल का भ्रमण कर सकते हैं।

जरासंध का अखाड़ा
इन स्थलों के अलावा आप प्रसिद्ध जरासंध का अखाड़ा भी देख सकते हैं, जिसे रणभाभी के नाम से भी जाना जाता है। यह अखाड़ा स्थल नालंदा जिले के राजगीर में स्थित है। इस जगह का नाम मगधान सम्राट, जरासंध के नाम से रखा गया है। पौराणिक किवंदती के अनुसार इस स्थल को भीम और जरासंध के बीच हुई महाभारत युद्ध में सबसे रोमांचक लड़ाई के रूप में देखा जाता है।
माना जाता है कि यह लड़ाई 27 दिनों तक चली थी। इसके अलावा पुरातात्विक अन्वेषण में यहां मणियार मठ और सोनभंदर गुफाओं का पता चला है।

नालंदा विश्वविद्यालय
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उपरोक्त स्थानों के अलावा आप यहां के सबसे प्रसिद्ध प्राचीन स्थल नांदला विश्वविद्यालय की सैर का आनंद ले सकते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय भारत के सबसे प्राचीन शिक्षण केंद्रों में गिना जाता है जहां पढ़ने के लिए सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने से विद्यार्थी आया करते थे। यह उस काल का सबसे विकसित और आधुनिक विश्वविद्यालय था।
यहां हिन्दू धर्म शास्त्रों के साथ बौद्ध धर्म की शिक्षाएं भी दी जाती थी। यहां छात्रों के पढ़ने और रहने के की सभी सुविधाएं उपलब्ध थी। यहां तक कि यहां एक विशाल पुस्तकालय भी मौजूद था।



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