
बीरभूम पश्चिम बंगाल स्थित भारत का एक प्राचीन क्षेत्र है जिसपर कभी वीर राजाओं शासन हुआ करता था, इसलिए इसका नाम वीरों की भूमि यानी बीरभूम पड़ा। वर्तमान में यह राज्य का एक बड़ा जिला है, जिसके अंतर्गत कई खूबसूरत शहर और नगर आते हैं। बीरभूम को लाल मिट्टी की भूमि भी कहा जाता है। बरसो से पश्चिम बंगाल की लोक संस्कृति और परंपराओं को संभाले ये जिला राज्य का सांस्कृतिक केंद्र भी है।
यहां की यात्रा आपको सीधे यहां की अमीट लोक संस्कृति और धार्मिक गतिविधियों की तरफ ले जाएगी। जिले में कई खूबसूरत प्राचीन मंदिर भी मौजूद हैं। कुछ अगल अनुभव के लिए आपको इस सांस्कृतिक विरासत की यात्रा जरूर करनी चाहिए। इस खास लेख में जानिए पर्यटन के लिहाज से पश्चिम बंगाल की यह प्राचीन जिला आपके लिए कितना खास है।

शांतिनिकेतन
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बीरभूम जिले के अंतर्गत शांतिनिकेतन एक छोटा सा शहर है जो नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के बसाए विश्व भारती विश्वविद्यालय के लिए जाना जाता है। यह विश्वविद्यालय एक सांस्कृतिक विरासत है जो पूर्व और पश्चिम दोनों के आदर्शों के संगम को चिह्नित करता है। शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय की स्थापना रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा की गई थी।
अध्ययन के अलावा यहां सालभर विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है। यहां मनाए जाने वाला पुश मेला पूरे विश्व को अपनी ओर आकर्षित करता है, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

शक्तिपीठ
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पौराणिक किवदंतियों के अनुसार देवी सती को पिता दक्ष द्वारा आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में अपमानित होना पड़ा, परिणामस्वरूप उन्हे अपना देह त्याग करना पड़ा। जिसके बाद दुःखपूर्ण शिव ने रुद्र तांडव का प्रदर्शन किया। माना जाता है कि देवी सती के मृत शरीर को लेकर शिव जहां-जहां आगे बढ़े वहां-वहां सती के शरीर का कोई न कोई अंग गिरता चला गया। माना जाता है कि उन स्थानों पर आज देवी सती को समर्पित शक्तिपीठ मौजूद हैं।
तारापीथ को उस जगह के रूप में माना जाता है जहां सती की आंख गिरी थी, कंकलिताल जहां सती की कमर गिरी थी। इसके अलावा, नलहाती में नलेतेश्वरी मंदिर को भी शक्तिपीठ माना जाता है जो एक पहाड़ी पर स्थित है।

जयदेव केंदुली
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जिले के अंतर्गत स्थित जयदेव केंदुली एक पवित्र स्थल है जहां बड़ी संख्या में तीर्थयात्रि और बाउल(लोक गायन करने वाले) वार्षिक रूप से आयोजित होने वाले मेले में भाग लेते हैं। यह स्थान पश्चिम बंगाल के एक महान कवि जयदेव का जन्म स्थान माना जाता है। अपनी विशेषताओं के चलते यह एक धार्मिक केंद्र के रूप में उभरा जहां वर्तमान में कई आश्रम मौजूद हैं।
बाउल यहां का विशेष आकर्षण हैं। एकतारे की मदद से बाउल संगीत प्रस्तुत किया जाता है। यह लोक संगीत काफी उत्साहजनक होता है। अगर आप यहां आएं तो इस मेले का आनंद जरूर उठाएं।

पठारचापुरी
पठारचापुरी भी एक महत्वपूर्ण स्थान है जहां मार्च-अप्रैल महीने के दौरान 'दाता साहेबर मेला' आयोजित किया जाता है। माना जाता है कि सूफी विचारक और संत, हजरत दाता महबूब शाह वाली ने इस जगह अपनी आखिरी सांस ली थी।
उनका एक मकबरा यहां के एक गांव में स्थित है,जहां सैकड़ों की तादादा में श्रद्धालु दर्शन के लिए और दाता साहब की मौत की सालगिरह मनाने के लिए आते हैं। ऐसा कहा जाता है कि संत के पास रोगों को ठीक की चमत्कारी शक्तियां थीं।

बकरेश्वर
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उपरोक्त स्थानों के अलावा आप जिले के अन्य महत्वपूर्ण स्थान बकरेश्वर की यात्रा कर सकते हैं। यह स्थल गर्म झरनों की उपस्थिति के कारण भूगर्भीय रूप से प्रसिद्ध है, जो पुरानी बीमारियों का इलाज करने के लिए काफी कारगर माना जाता है।
खार कुंडा, भैरव कुंडा, अग्नि कुंड, दुध कुंड और सूर्य कुंडा यहां के कुछ प्रसिद्ध हैं जहां पानी का तापमान 60 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहता है। बकरेश्वर में शिव मंदिर भी है जहां बड़ी संख्या में तीर्थयात्री पूजा और प्रार्थना करने के लिए आते हैं।



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