पंजाब में जालंधर से करीब 40 किमी दूर मौजूद है नूरमहल कस्बा। इतिहासकारों का मानना है कि मुगल बेगम नूरजहां का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। इसी जगह पर मौजूद है 17वीं सदी का बना नूरमहल सराय, जो मुगल वास्तुकला का शानदार उदाहरण है। कोई कहता है कि यह शाहजहां के पिता जहांगीर का अपनी बेगम नूरजहां के लिए बनवाया गया प्यार का तोहफा तो कोई इसे मुगल बेगम नूरजहां की व्यापारिक समझ का नतीजा मानता है।

हालांकि इस सराय के बारे में आज काफी कम लोगों को पता है लेकिन जिन लोगों को इतिहास के गलियारों में झांकने की आदत है, उनके लिए काफी गहरा इतिहास अपने आप में छिपा रखा है नूरमहल सराय ने।
कहां है नूरमहल?
नूरमहल कस्बा पंजाब के जालंधर जिले में फिल्लौर से करीब 20 किमी पश्चिम में मौजूद एक छोटा सा कस्बा है नूरमहल। कहा जाता है कि मुगल काल में यह जगह लाहौर से दिल्ली जाने के रास्ते में पड़ता था। ईरान से दिल्ली जाने के दौरान जब नूरजहां के पिता मिर्जा ग्यारा मुहम्मद बेग का काफिला इस जगह से गुजर रहा था, तो उन्होंने कुछ देर यहां आराम फरमाने का फैसला लिया। उस समय नूरजहां की मां गर्भवती थी।
उस वक्त इस जगह का नाम कोट कोहलूर था। जिस समय बेग का काफिला आराम फरमा रहा था, तभी उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हुई और इसी जगह पर नूरजहां का जन्म हुआ था। कई इतिहासकारों ने भी इस बात का जिक्र अपनी किताबों में किया है कि नूरजहां का जन्म दिल्ली से कंधार के रास्ते में हुआ था। जब जहांगीर के साथ नूरजहां का निकाह हुआ तो अपनी बेगम के नाम पर जहांगीर ने कोट कोहलूर का नाम बदलकर नूरमहल कर दिया।
नूरमहल सराय को क्यों बनवाया गया था, इस बात को लेकर भिन्न-भिन्न मत हैं। लेकिन उनमें से सबसे अधिक प्रचलित जो दो विचार हैं हम आगे उनके बारे में बता रहे हैं।
बेगम के लिए बनवाया जहांगीर का महल
कुछ लोगों का मानना है कि फिल्लौर का नूरमहल सराय जहांगीर द्वारा अपनी प्यारी बेगम नूरजहां के लिए बनवाया हुआ महल है। कहा जाता है कि नूरजहां की ख्वाहिश थी कि उनके जन्मस्थल पर उनका एक महल हो। बीवी नूरजहां की इसी इच्छा को पूरा करते हुए जहांगीर ने नूरमहल सराय का निर्माण करवाया था। सीधे सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि पत्नी को मुमताज महल के लिए ताजमहल बनाने वाले शाहजहां के पिता जहांगीर ने भी अपनी बेगम नूरजहां के लिए नूरमहल सराय का निर्माण करवाया था।

नूरजहां की व्यापारिक समझ का नतीजा है नूरमहल सराय
इतिहासकारों के दूसरे मत के अनुसार नूरमहल सराय का निर्माण नूरजहां ने खुद करवाया था। जैसा हमने पहले ही बताया है कि मुगलकाल में इस रास्ते से होकर लाहौर-आगरा-दिल्ली के रास्ते व्यापार करने वाले व्यापारियों का आना-जाना लगा रहता था। इसलिए जालंधर के तत्कालिन शासक जकारिया खान की देखरेख में बेगम नूरजहां ने उन यात्रियों के रुकने के लिए ही इस सराय का निर्माण करवाया था। कहा जाता है कि इस सराय का निर्माण 1619 से 1621 के बीच किया गया था और इसे तैयार होने में 2 सालों का समय लग गया था।
मुगल वास्तुकला का है शानदार उदाहरण
लाल रंग के बलुआ पत्थरों से निर्मित सराय नूरमहल को देखकर ही समझ में आता है कि उस काल की वास्तुकला कितनी उन्नत हुआ करती थी। दिवारों पर पक्षियों, हाथियों, ऊंट, परियों और इंसानों की कलाकृतियां उकेरी हुई हैं। सराय के बीच में बागिचा और तीन तरफ से कमरे हैं। वहीं चौथी तरफ हमाम (सार्वजनिक स्नानागार) है।
सराय परिसर के अंदर एक मस्जिद भी मौजूद है। मुख्य द्वार पर दो हाथी सूंड उठाएं स्वागत की मुद्रा में हैं। देखभाल के अभाव में नूरमहल सराय का कुछ हिस्सा खंडहर में बदल गया है। पंजाबी लोकगीतों में नूरमहल कस्बे का जिक्र आता है, जिसमें बताया जाता है कि किसी जमाने में यहां प्रसिद्ध मेला लगा करता था।

पहले पति का जहांगीर ने करवाया था कत्ल
इतिहासकारों का कहना है नूरजहां की पहली शादी शेर अफगान अली कुली खां से हुई थी। शादी के बाद दोनों बंगाल में रहते थे। नूरजहां के हुस्न पर फिदा होकर जहांगीर बार-बार नूरजहां से अपने पति को तलाक देकर उससे शादी करने की मिन्नतें करने लगा। कहा जाता है कि जब नूरजहां राजी नहीं हुई तो जहांगीर ने अली कुली का कत्ल करवा दिया। इतिहासकारों ने लिखा है कि इसके बाद भी नूरजहां राजी नहीं हुई थी और काफी मान-मनौव्वल के बाद ही वह जहांगीर से शादी के करने के लिए राजी हुई।



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