हर साल ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की उनके बड़े भाई बलभद्र और छोटी बहन सुभद्रा के साथ रथ यात्रा निकाली जाती है। यह एक प्रकार से प्रभु जगन्नाथ का नगर भ्रमण ही होता है। इस साल 7 जुलाई को रथ यात्रा निकाली जाएगी। पुरी का जगन्नाथ मंदिर बड़ा चार धाम में से एक है, जो भगवान श्रीकृष्ण के जगन्नाथ स्वरूप को समर्पित है। इस मंदिर को धरती का बैकुंठ धाम भी कहा जाता है।
क्या आप जानते हैं रथ यात्रा के दिन तीनों भाई-बहनों का जो रथ होता है न सिर्फ उनके अलग-अलग नाम होते हैं बल्कि उनको बनाने की लकड़ियां भी बड़ी खास होती है! क्या आपको यह पता है कि रथ यात्रा के बाद पुरी में इन तीनों विशालाकार रथों का क्या किया जाता है? क्यों इस साल भारतीय रेलवे तीनों रथों का पहिया खरीदने वाली है? और सबसे बड़ी बात...रथ यात्रा के साथ रसगुल्ला का क्या संबंध है?

आइए इन सारे सवालों का एक-एक कर जवाब ढूंढते हैं :
कौन सी लकड़ी से बनता है रथ?
रथ यात्रा का रथ बनाने के लिए लकड़ियों का चुनाव करते समय कई बातों का ध्यान रखा जाता है। हर साल अक्षय तृतिया के दिन रथ बनाने का काम शुरू हो जाता है। रथ बनाने के लिए 12 पेड़ों की लकड़ियों को काटा जाता है, जिनका नाप पहले से ही निर्धारित रहता है। भगवान जगन्नाथ का रथ बनाने के लिए आसन, धौरा, फासी, सिमनी, ताड़, बबूल आदि पेड़ों की लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है।
फासी से रथ का पहिया और तुभ, धौरा से अख चढ़ेई, सिमनी की लकड़ी से रथ की दीवार, पोटल, कलश, तार के पेड़ों से सीढ़ियां, बबूल की लकड़ी से जगन्नाथ देव का सेना पटा बनाया जाता है। सभी पेड़ों को खोरधा, बौध, कटक आदि के जंगलों से काट कर लाया जाता है।
इन लकड़ियों को माली समाज के लोग सोने की कुल्हाड़ी से काटते हैं। जिन पेड़ों को रथ बनाने के लिए काटा जाता है उनकी गोलाई 2 हाथ से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और न ही उन पेड़ों पर पक्षियों का कोई घोसला होना चाहिए।
क्या होता रथ का नाम और इसकी खासियतें?
रथ यात्रा के समय सबसे पहले भगवान बलराम का रथ, बीच में बहन सुभद्रा और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ होता है। इन तीनों रथों का निर्माण कभी भी मशीनों द्वारा नहीं बल्कि परंपरागत रूप से हाथों द्वारा ही किया जाता है। तीनों रथों को बनाने में ठीक 865 टूकड़े लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। न एक कम और न ही एक ज्यादा।
| किसका रथ | रथ का नाम | रंग | ऊंचाई (लगभग) |
| बलभद्र | तालध्वज | लाल और हरा | 45 फीट |
| देवी सुभद्रा | दर्पदलन | काला और लाल | 44.7 फीट |
| प्रभु जगन्नाथ | नंदिघोष | पीला और लाल | 45 फीट |

रथ यात्रा के बाद क्या होता रथों का?
रथ यात्रा के समय तो जगन्नाथ मंदिर से बड़े ही धुमधाम के साथ भगवान जगन्नाथ की मौसी के घर गुंडिचा के लिए यात्रा निकाली जाती है और 7 दिन बाद उल्टा रथ के दिन ठीक उसी प्रकार सभी रथ वापस जगन्नाथ मंदिर में लौट भी आते हैं। लेकिन उसके बाद इन विशालाकार रथों का क्या होता है?
इतने बड़े रथों को कहां रखा जाता होगा? रथ यात्रा के बाद तीनों रथों को विखंडित कर दिया जाता है। इन रथों को विखंडित करने से मिलने वाली लकड़ियों को जलाकर ही अगले 1 साल तक जगन्नाथ मंदिर के मेगा किचन में हर दिन लगभग 50 हजार भक्तों के लिए महाप्रसाद बनाया जाता है।
भारतीय रेलवे क्यों खरीदेगी रथ का पहिया?
इस साल रथ यात्रा के बाद भारतीय रेलवे तीनों रथों का एक-एक पहिया खरीदने वाली है। मीडिया को दिये एक बयान में रथ बनाने वाले प्रमुख वास्तुकार मनोजय रथ ने बताया कि हर साल रथ यात्रा के बाद तीनों रथों को विखंडित कर उनकी लकड़ियों को जलाकर मंदिर की रसोई में देवताओं के लिए भोग पकाने का काम किया जाता है।
लेकिन इस साल रथ यात्रा के बाद भारतीय रेलवे तीनों रथों का एक-एक पहिया खरीदने वाली है, जिसे पुरी के रेलवे स्टेशन पर स्थापित किया जाएगा। बता दें, पुरी रेलवे स्टेशन देश के उन हजारों रेलवे स्टेशनों में से एक है, जिन्हें अमृत भारत योजना के तहत विश्वस्तरीय सुविधाओं के साथ पुनर्विकसित किया जा रहा है।

अब बताते हैं रथ यात्रा और रसगुल्ला का संबंध
रसगुल्ला का GI टैग भले ही पश्चिम बंगाल के पास है लेकिन अध्यात्मिक रूप से यह दावा किया जाता है कि रसगुल्ला को सबसे पहले भगवान जगन्नाथ ने बनाया था। इसी वजह से ओडिशा भी खुद को रसगुल्ला के GI टैग का प्रबल दावेदार मानता है। दरअसल, स्थानीय मान्यताओं के अनुसार स्नान यात्रा के बाद जब तीनों भाई-बहन (बलभद्र, सुभद्रा और जगन्नाथ) बीमार पड़ गये और 15 दिनों के एकांतवास पर चले गये।
एकांतवास से वापस लौटकर भगवान जगन्नाथ अपने भाई और बहन के साथ मौसी के घर घूमने निकल पड़ते हैं लेकिन देवी लक्ष्मी को साथ में नहीं ले जाते हैं। इस वजह से उनके वापस लौटने पर देवी लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं। वह देवी सुभद्रा और बलराम को तो घर में प्रवेश करने देती हैं लेकिन जगन्नाथ देव को नहीं। तब नाराज पत्नी (देवी लक्ष्मी) को मनाने और उनका 'मान भंजन' के लिए भगवान जगन्नाथ ने पहली बार रसगुल्ला बनाया था। जिसे खाकर देवी लक्ष्मी खुश हो गयी थी।



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