कोलकाता का ठाकुर परिवार किसी शाही परिवार से कम नहीं था। व्यापार से लेकर संगीतकार, लेखक से लेकर कलाकार हर क्षेत्र में इस परिवार के लड़कों का नाम बड़ी ही प्रमुखता के साथ लिया जाता था। मूल रूप से जशोर (वर्तमान बांग्लादेश) का रहने वाला टैगोर परिवार कोलकाता में आकर बस गया था।
18वीं सदी में कोलकाता में कई बंगाली परिवार अच्छी तरह से फल-फूल रहे थे लेकिन उनमें सबसे प्रमुख नाम था टैगोर या ठाकुर परिवार का। इसी ब्राह्मण परिवार में 7 मई 1861 (बांग्ला कैलेंडर के अनुसार 25 बैशाख) को देबेन्द्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के घर जन्म हुआ रवींद्रनाथ टैगोर अथवा ठाकुर का। 13 जीवित बच्चों में रवींद्रनाथ अपने माता-पिता की सबसे छोटी संतान थे। उन्होंने महज 8 साल की उम्र से कविता लिखना शुरू कर दिया था।

रवींद्रनाथ टैगोर की जड़े भले ही कोलकाता (तत्कालिन कलकत्ता) से जुड़ी हुई हो, लेकिन देशभर में ऐसी कई जगहें हैं जहां उन्होंने न सिर्फ निवास किया बल्कि उनकी कई रचनाओं के साक्षी भी ये जगहें बनी। आइए कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर से संबंधित वो जगहें जहां आज भी उनकी यादों को बड़े ही जतन के साथ संजो कर रखा गया है -
1. जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी, कोलकाता
वर्तमान कोलकाता के गिरीश पार्क इलाके में मौजूद जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी वास्तव में एक विशाल हवेली है। इसी हवेली में रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ था। लाल रंग की यह आज कोलकाता की पहचान के साथ-साथ कोलकाता का सांस्कृतिक केंद्र भी बन चुका है।
जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी के एक हिस्से को आज म्यूजियम बना दिया गया है जहां सिर्फ रवींद्रनाथ टैगोर ही नहीं बल्कि ठाकुर खानदार से जुड़ी कई पीढ़ियों की यादों को संभाल कर रखा गया है। वहीं दूसरे हिस्से में रवींद्रभारती विश्वविद्यालय का एक परिसर बनाया गया है, जिसकी स्थापना रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी।

2. शांतिनिकेतन, बीरभूम
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित शांतिनिकेतन को अगर राज्य की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाए, तो ऐसा कहना गलत नहीं होगा। शांतिनिकेतन में विश्वभारती विश्वविद्यालय की रवींद्रनाथ टैगोर ने न सिर्फ स्थापना की थी, बल्कि वह खुद भी वहां पढ़ाते भी थे।
अपने खाली समय में वह शांतिनिकेतन के अपने घर में बैठकर किताबें पढ़ना, कविताएं-उपन्यास आदि लिखा करते थे। आज भी शांतिनिकेतन में कविगुरु का घर सुरक्षित रखा हुआ है और यहां हर वह चीज संभाल कर ठीक उसी तरह से रखी हुई है जैसा रखना उन्हें पसंद था।
3. अल्मोड़ा, उत्तराखंड
रवींद्रनाथ टैगोर को पहाड़ी जगहों पर समय बिताना खुब पसंद आता था। उत्तराखंड के पहाड़ी शहर अल्मोड़ा के जिस घर में उन्होंने अपना समय बिताया था, आज उसे टैगोर भवन कहा जाता है। बताया जाता है कि रवींद्रनाथ टैगोर अल्मोड़ा के इस घर में अक्सर आया करते थे। साल 1913 में उनकी जिस रचना 'गीतांजलि' के कारण उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, उसका काफी हिस्सा उन्होंने इसी घर में लिखा था।
4. कालिंगपोंग, पश्चिम बंगाल
कालिंगपोंग के गौरीपुर में रवींद्रनाथ टैगोर ने अपना 78वां जन्मदिन मनाया था। सिर्फ इतना ही नहीं, इस उपलक्ष्य में उन्होंने अपनी एक कविता 'जन्मदिन' की रचना भी की थी। कालिंगपोंग के अपने इस घर से ही उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए एक कविता का पाठ भी किया था।
इस घर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां से कंचनजंघा की चोटियां साफ-साफ नजर आती हैं। चाय बागानों के बीच में मौजद इस घर को बड़े ही प्यार और आदर के साथ आज भी संजो कर रखा गया है। न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन से यह जगह करीब 72 किमी की दूरी पर मौजूद है।

5. मोंगपु, पश्चिम बंगाल
प्रसिद्ध लेखिका मैत्रेयी देवी (साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित) के आमंत्रण पर पहली बार रवींद्रनाथ टैगोर मोंपगु के इस घर में आए थे। यह जगह उन्हें इतना पसंद आ गया था, कि वह यहां अक्सर आने लगे थे। मैत्रेयी देवी के पति और क्वीनाइन फैक्ट्री के निदेशक डॉ. मनमोहन सेन के इस बंगले में रवींद्रनाथ टैगोर फायर प्लेस के ठीक बगल में बैठ कर घंटो बिता दिया करते थे।
इस जगह पर आज रवींद्र म्यूजियम बनाया गया है, जहां आज भी रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा इस्तेमाल की गयी वस्तुओं को देखा जा सकता है। कालिंगपोंग से मोंगपु महज 50 किमी की दूरी पर मौजूद है।
6. रामगढ़, उत्तराखंड
नैनीताल से लगभग 30 किमी की दूरी पर मौजूद रामगढ़ रवींद्रनाथ टैगोर की सबसे पसंदीदा जगहों में से एक थी। इस जगह पर अपने प्रवास के दौरान भी उन्होंने 'गीतांजलि' के एक हिस्से की रचना की थी। वर्ष 1903 में रवींद्रनाथ टैगोर रामगढ़ आए थे। उस समय वह एक झोपड़ीनुमा घर में रुके थे।
आज भले ही वह घर नष्ट हो गया है लेकिन जिस पहाड़ी की चोटी पर वह घर बना है, उसे टैगोर टॉप कहा जाता है। बाद में वह राइटर्स बंगलो (Writer's Bungalow) में ठहरे, जो आज नीमराना प्रॉपर्टी है। रामगढ़ में राइटर्स बंगलो से टैगोर टॉप तक की ट्रेकिंग की जाती है, जो प्रमुख टूरिस्ट स्पॉट है।
7. शिलॉन्ग, मेघालय
देवदार से पेड़ो से छनकर आती सूर्य की किरणें रवींद्रनाथ को काफी भाती थी। वह अक्सर इसके बारे में मजाकिया लहजे में लिखा भी करते थे, 'उन्हें मेरी सफेद दाढ़ी से डर नहीं लगता। वे आनंद-उत्सव से पूरी तरह से भरी होती हैं।' मेघालय की राजधानी शिलॉन्ग उन दिन अविभाजित असम की राजधानी हुआ करती थी। यहां वह उम्श्रीपी धारा के किनारे स्थित एक छोटे से घर में रहा करते थे, जिसे ब्रुकसाइड कहा जाता है।
बाद में उन्होंने इस धारा का नाम 'निर्झरिनी' रखा था। शिलॉन्ग पहाड़ी का रवींद्रनाथ टैगोर से बड़ा ही गहरा संबंध था। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता 'रक्तो करोबी', 'शिलॉन्गेर चिठी' के अलावा दक्षिण भारत में रहकर लिखी अपने उपन्यास 'सेशेर कविता' में भी शिलॉन्ग का जिक्र किया है। आज भी लोग ब्रुकसाइड में जाकर रवींद्रनाथ टैगोर की यादों के बीच उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।



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