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राजस्थान के इस गांव में दाह-संस्कार के बाद नदी में नहीं बहायी जाती है अस्थियां

हिंदू धर्म में सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार जब भी किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसके दाह-संस्कार के बाद बची राख को किसी भी पवित्र नदी में विसर्जित कर दी जाती है। अंतिम-संस्कार के बाद बची राख को नदी में प्रवाहित करने के अलावा और कोई भी अनुष्ठान या किसी अन्य प्रकार से इस्तेमाल करने के बारे में हम सोच भी नहीं सकते हैं।

लेकिन क्या आप हमपर यकिन करेंगे अगर हम आपसे कहें कि हमारे देश में एक गांव ऐसा भी है, जहां न तो अंतिम संस्कार के बाद राख को नदी में प्रवाहित की जाती है और न ही कोई धार्मिक अनुष्ठान होता है। इस गांव में किसी को भी धार्मिक अनुष्ठानों या पूजा-पाठ पर कोई यकिन नहीं है। जी नहीं, इस गांव के लोग ईश्वर पर आस्था भी रखते हैं और नास्तिक नहीं कहलाते हैं।

village

दरअसल इस गांव के लोग एकमात्र कर्म करने पर ही यकिन करते हैं। यह गांव राजस्थान के चुरू जिले में स्थित है। राजस्थान के तारानगर तहसील में स्थित 'लांबा की ढाणी' गांव में रहने वाले लोग सिर्फ बातों में नहीं बल्कि असली जिंदगी में भी धार्मिक कर्मकांडों के बजाए मेहनत और लगन पर ज्यादा ध्यान देते हैं।

गांव में रहने वाले लोगों ने सालों पहले सामुहिक रूप से यह तय किया था कि इस गांव में जब किसी की मृत्यु होगी तो दास-संस्कार के बाद अस्थियों को नदी में विसर्जित नहीं किया जाएगा। बताया जाता है कि इस गांव में पिछले करीब 70 सालों से कोई भी मृत्युभोज नहीं हुआ है।

चिकित्सा, ऊंचे सरकारी पद और विदेशों में कार्यरत हैं लोग

लांबा की ढाणी भारत का शायद एकमात्र ऐसा गांव है, जहां न तो कोई मंदिर है और न ही कोई मस्जिद। इस गांव में 105 घर हैं और गांव की कुल आबादी लगभग 750 है। इनमें से लगभग 25 लोग चिकित्सा के क्षेत्र में, कई युवा कनाडा में कार्यरत हैं। 60 से ज्यादा बुजूर्गों को सरकारी पेंशन मिलता है तो लगभग 200 लोग अभी भी विभिन्न सरकारी पदों पर कार्यरत हैं।

गांव के 5 युवकों ने खेलों में राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता है। इस गांव से 2 लोग इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी, 2 प्रोफेसर, 7 वकील और 35 अध्यापक हैं। कुल मिलाकर यह गांव एक विकसित और जागरुक गांव की श्रेणी में आता है।

rajasthan village with no temple

क्या होता है अस्थियों का

लगभग 70 साल पहले ही इस गांव के लोगों ने साथ मिलकर यह तय किया था कि गांव में जब भी किसी की मृत्यु होगी, तो अंतिम संस्कार के बाद न तो उसकी अस्थियों को नदी में विसर्जित किया जाएगा और न ही मृत्युभोज आयोजित होगा। तो फिर दाह-संस्कार के बाद बची अस्थियों का क्या किया जाता है? जब भी गांव में किसी की मृत्यु होती है और उसका अंतिम संस्कार किया जाता है।

इसके बाद बची हुई अस्थियों को फिर से जलाकर उसे राख बना दिया जाता है। इस गांव में कभी भी कोई मंदिर या मस्जिद नहीं बनाया गया है बल्कि दो प्राइवेट और एक हाई स्कूल, एक उपस्वास्थ्य केंद्र और पोस्ट ऑफिस बनाया गया है।

गांव के लोग खुद को किसी भी प्रकार के अंधविश्वास से कोसों दूर रखते हैं और केवल कर्म में ही विश्वास करते हैं।

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