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जयपुर में होली पर गुब्बारा नहीं एक-दूसरे को मारा जाता है 'गुलाल गोटा', 400 साल पुरानी है परंपरा

दिल्ली-मुंबई या कोलकाता हो, पटना-बनारस या लखनऊ हो अथवा बैंगलोर-चेन्नई या मैसूर हो...होली वाले दिन सुबह-सुबह धमाचौकड़ी मचाती बच्चों की टोली, उनके हाथों में रंगों से भरी पिचकारी और बाल्टी भरकर रंगों से भरे गुब्बारे। यह नजारा हर शहर में कॉमन ही होता है...है न। जब रंगों से भरे ये गुब्बारे किसी को फेंककर मारे जाते हैं, तो उसे चोट तो नहीं लगती लेकिन वह व्यक्ति पूरी तरह से रंगों से सराबोर जरूर हो जाता है।

क्या आप जानते हैं, आज से लगभग 400 साल पहले भी राजा-महाराजा एक-दूसरे को गुब्बारे मारकर होली खेला करते थे। नहीं...तो चलिए हमारे साथ जयपुर की गलियों में...जहां आज भी 400 साल पुरानी इस परंपरा को बरकरार रखते हुए बनाएं जाते हैं 'गुलाल गोटा'।

making of gulal gota in jaipur

400 साल पहले राजा-महाराजा के जमाने में गुब्बारे मारने वाली बात अभी तक हजम नहीं कर सकें। अरे भई, हमने ऐसा कब कहा कि वो गुब्बारे भी आज की तरह रबड़ से बने गुब्बारे होते थे। खा गये न गच्चा...। चलिए आपके कन्फ्यूजन को और न बढ़ाते हुए बताते हैं, कैसी होती थी 400 साल पहले गुलाल गोटा वाली होली।

मशहूर है जयपुर की गुलाल गोटे वाली होली

जिस तरह मथुरा, वृंदावन या फिर बरसाना अपने अनोखे अंदाज में फूलों, लड्डूओं या फिर लट्ठमार होली के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है। काशी के मणिकर्णिका घाट की मसान होली को देखने के लिए खासतौर पर होली के समय दूर-दराज के देशों से भी पर्यटक यहां पहुंचते हैं। ठीक उसी तरह राजस्थान के जयपुर में गुलाल गोटे वाली होली भी खूब मशहूर है। गुलाल गोटे वाली होली राजा और प्रजा के बीच खेली जाने वाली एक खास होली होती थी जिसे मुख्य रूप से जयपुर में ही खेली जाती थी।

color bomb gulal gota

क्या होता है गुलाल गोटा

गुलाल गोटा रंगों से भरा लड्डू के आकार का एक छोटा सा गुलाल बम होता है। जैसे ही कोई इसे दूसरे को फेंककर मारता है, तो तुरंत गुलाल गोटा फूट जाता है और उसमें भरा गुलाल लोगों के पूरे शरीर पर फैल जाता है। गुलाल गोटा बड़ी मेहनत से लाख से बनाया जाता है। यह इतना मुलायम होता है कि इससे जरा भी चोट नहीं लगती और जिस पर इसे फेंका जाता है, उसके शरीर को छुते ही यह फूट जाता है व पूरा रंग फैल जाता है।

गुलाल गोटे को 4 ग्राम लाख से बनाया जाता है जिसमें 8 ग्राम गुलाल भरा होता है। पहले गुलाल गोटा में प्राकृतिक वस्तुओं से बने रंग भरे जाते थे। आज भी इसमें गीला रंग नहीं बल्कि सिर्फ अरारोट वाले गुलाल भी भरे जाते हैं। 4 ग्राम लाख को लेकर उसे पहले गर्म किया जाता है। फिर उसे फुंक मारकर गोल लड्डू का आकार दिया जाता है। इसके बाद उसमें गुलाल भरकर मुंह को सील कर दिया जाता है।

gulal gota making jaipur

राजा और प्रजा के बीच होली खेलने का है प्रतिक

गुलाल गोटा मूल रूप से राजा और प्रजा के बीच होली खेलने का प्रतिक है। दरअसल, जब होली के दिन राजा-महाराजा अपनी प्रजा से संवाद करने, उनसे मिलने किलों से बाहर आते थे, तब उनके लिए यह संभव नहीं था कि बाहर राजा का इंतजार कर रही हजारों की भीड़ में हर एक के साथ होली खेली जाए।

इसलिए उस समय प्रजा गुलाल गोटा बनाकर उसे राजा पर मारा करती थी। इससे प्रजा अपने राजा के साथ होली भी खेल ली। समय के साथ धीरे-धीरे बाद में यह जयपुर की पहचान बन गया। बताया जाता है कि सवई जयसिंह, सवई मानसिंह आदि गुलाल गोटे से ही राजपरिवार में और जनता के साथ होली खेला करते थे।

family siting together to make gulal gota

मुस्लिम परिवार बनाता है गुलाल गोटा

जयपुर में गुलाल गोटा बनाने और उनका कारोबार करने वाले अधिकांश लोग मुस्लिम परिवार से आते हैं। इन कारिगरों का दावा है कि लगभग सैंकडों साल पहले उनके पूर्वजों को कच्छवा राजा ने अरब से लाकर जयपुर में बसाया था। उनके पूर्वजों के बनाए गुलाल गोटे से ही राजपरिवार होली खेला करता था। आज भी जयपुर में गुलाल गोटा बनाना और बेचने का काम अधिकांश मुस्लिम परिवार के सदस्य ही करते हैं।

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