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12 हजार राजपूती राजकुमारियों ने इस किले में किया था राजस्थान का एकमात्र 'जल-जौहर'

अपनी शान व इज्जत को बचाने के लिए राजस्थान में राजपूती राजकुमारियों या रानियों द्वारा जौहर करने का इतिहास काफी पुराना रहा है। जब भी राजपूती राजकुमारियों या रानियों के जौहर करने की बात होती है, तो सबसे पहला नाम चित्तौड़ की रानी पद्मावती का आता है।

मुगल शासक अलाउद्दीन खिलजी के बुरे इरादों की वजह से ही रानी पद्मावती को अन्य राजपूती महिलाओं के साथ जौहर करना पड़ा था। जौहर के बारे में हम सबकी यहीं धारणा है कि आग के जलते हुए कुंड में कुद कर स्वेच्छा से राजपूती रानियों व राजकुमारियों का आत्मदाह ही जौहर कहलाता है। लेकिन...

क्या आप जानते हैं, राजस्थान में रानी पद्मावती से पहले भी अलाउद्दीन खिलजी के कारण ही राजपूती राजकुमारियों व रानियों को जौहर करना पड़ा था? और तो और...

ranthambore 36 chhatri pillers

यह जौहर अग्निकुंड में कुदकर नहीं बल्कि जल-समाधि लेकर किया गया 'जल-जौहर' था। हम जिस 'जल-जौहर' की बात कर रहे हैं, इतिहासकारों के मुताबिक वह राजस्थान के इतिहास में किया गया पहला और एकमात्र 'जल-जौहर' है।

इस किले में हुआ था 'जल-जौहर'

राजस्थान के इतिहास में किया गया एकमात्र 'जल-जौहर' रणथंभौर किले में किया गया बताया जाता है। सवई माधोपुर से लगभग 6 मील की दूरी पर मौजूद रणथंभौर किला अलावली पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा एक पहाड़ी किला है। इतिहासकारों की मानें तो रणथंभौर का असली नाम 'रन्तःपुर' हुआ करता था, जिसका मतलब है रण की घाटी में बसा नगर। इस किले का निर्माण राजा सज्जन वीर सिंह नागिल ने करवाया था।

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बाद में धीरे-धीरे किले के अन्य उत्तराधिकारियों ने किले के निर्माण में अपना योगदान दिया था। रणथंभौर किले के निर्माण में राव हम्मीर देव चौहान की प्रमुख भूमिका मानी जाती है। इस किले में राव हम्मीर देव चौहान की पत्नी रंगादेवी ने अन्य राजपूती राजकुमारियों व महिलाओं के साथ जौहर किया था।

अलाउद्दीन खिलजी बना था कारण

इतिहासकारों का कहना है अलाउद्दीन के गुजरात से लुटे गये खजाने को लेकर उसके सेनानायकों के बीच विद्रोह शुरू हो गया था। अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मद शाह को राव हम्मीर देव चौहान ने अपने यहां शरण दी थी। इससे खिलजी काफी नाराज हो गया था। 1300 ई. में खिलजी ने विशाल सैन्य बल के साथ रणथंभौर किले पर आक्रमण कर दिया।

इस आक्रमण में अलाउद्दीन खिलजी का सेनापति नुसरत खां भी मारा गया। रणथंभौर किले पर कब्जा करने का उसने 3 विफल प्रयास किया। 11 महीनों की घेराबंदी के बाद आखिरकार जुलाई 1301 ई. को उसने रणथंभौर किले पर कब्जा कर लिया।

राव के साथ हुआ विश्वासघात

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स्थानीय लोगों का कहना है कि अलाउद्दीन खिलजी के साथ युद्ध में राव हम्मीर देव चौहान की ही जीत हुई थी। युद्ध पर जाते समय उन्होंने अपनी रानियों से कहा था कि अगर वह युद्ध में जीते तो केसरिया झंडा फहराया जाएगा और अगर खिलजी जीता तो काला झंडा फहरेगा। कहा जाता है कि युद्ध में जीत को राव हम्मीर देव चौहान की ही हुई थी लेकिन उनके तीन विश्वासघाती सेनापति रणमल, रतिपाल और सामंत भोजराज ने अपने सैनिकों को काला झंडा देकर किले की ओर भेजा जिससे रानियों को लगा कि युद्ध में राव हम्मीर वीरगति को प्राप्त हुए हैं। इसके बाद ही राजपूती रानियों व राजकुमारियों ने जौहर करने का फैसला ले लिया।

किले की इस तालाब में हुआ था 'जल-जौहर'

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रणथंभौर किले में कई तालाब हैं, जैसे रनिहाड़ तालाब, हमीर कुंड, सुखसागर तालाब और पद्मला तालाब। कहा जाता है कि जब चौहान वंश की राजपूती राजकुमारियों व रानियों को युद्ध में राव हम्मीर देव चौहान की मृत्यु का भ्रम हुआ तो उन्होंने जौहर करने का फैसला लिया। बताया जाता है कि 12 हजार राजपूती राजकुमारियों व रानियों को साथ में लेकर रानी रंगादेवी ने पद्मला तालाब में जल-समाधि लेकर 'जल-जौहर' किया था।

इसे राजस्थान का सबसे पहला जौहर बताया जाता है, जो 1301 ई. में किया गया था। इतना ही नहीं यह राजस्थान के इतिहास का एकमात्र 'जल-जौहर' था।

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स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जब राव हम्मीर देव चौहान को रानियों के 'जल-जौहर' करने के फैसले के बारे में पता चला तो वह हवा की गति से अपना घोड़ा दौड़ाते हुए किले पर पहुंचे थे। लेकिन तब तक रानियों व राजकुमारियों ने जौहर कर लिया था। कहा जाता है कि इससे दुःखी होकर राव हम्मीर देव चौहान ने हठ में आकर अपने आराध्य भगवान महादेव को याद कर अपना शीश उनको अर्पित कर दिया।

अगली बार जब आप रणथंभौर किले पर घूमने जाएं तो पद्मला तालाब को जरूर देखें जो राजपूती शान के एक प्रतिक के तौर पर किले में आज भी मौजूद है। हमें पूरा यकिन है कि आप जब पद्मला तालाब को देखेंगे तो आपको Native Planet का यह आर्टिकल जरूर याद आएगा।

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