
दिल्ली का लाल किला भारत का सबसे ऐतिहासिक स्थल माना जाता है। इसका मुख्य कारण है कि हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा यहां झण्डा फहराया जाता है। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित होने के कारण इस किले शाही किले को लाल किला कहा जाता है। मुगलकालीन इस ऐतिहासिक स्थल विश्व धरोहर की लिस्ट में जगह दी गई है और यह भारत के सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों में से एक भी है।
साल 2007 में इस ऐतिहासिक स्थल को युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया गया था, जिसका भव्यता और बनावट देखने के लिए देश से ही बल्कि विदेशी पर्यटक भी पहुंचते हैं। यह शाही किला न सिर्फ मुगलों का राजनीतिक केंद्र रहा बल्कि औपचारिक केंद्र भी था। कहा जाता है इस किले पर मुगलों का 200 साल से अधिक समय तक राज रहा। देश के लिए यह किला इसलिए भी खास है क्योंकि आजादी के एक दिन बाद सार्वजनिक रूप से 16 अगस्त 1947 को लाल किले पर ही नेहरू ने झंडा फहराया था और आजाद भारत को अपना पहला संबोधन दिया था।

250 एकड़ में फैला है लाल किला
1648 ईस्वी में बने इस भव्य किले के अंदर एक बेहद सुंदर संग्रहालय भी मौजूद है, जिसे देखने के लिए पर्यटकों की काफी संख्या पहुंचती है। भारत का राष्ट्रीय गौरव के रूप में चिन्हित यह किला करीब 250 एकड़ में फैला हुआ है। कहा जाता है कि इस किले का निर्माण शाहजहां ने करवाया था, जिसके निर्माण में करीब 10 साल का समय लगा था। दिल्ली के केंद्र में बना हुआ यह किला तीन ओर से यमुना नदी से घिरा हुआ है, जो बेहद आकर्षक दिखाई पड़ता है।

ताजमहल के वास्तुकार ने ही की थी डिजाइन
लाल किले को भव्य और आकर्षक बनाने के लिए मुगल काल के प्रसिद्ध वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी को रखा गया था, जिन्होंने आगरा के ताजमहल की डिजाइन तैयार की थी। तत्कालीन समय में दिल्ली को शाहजहांनाबाद कहा जाता था। शाहजहां के बाद उसके बेटे औरंगजेब ने इस किले में मोती मस्जिद का निर्माण करवाया, जिसे आज भी देखा जा सकता है। आजादी के बाद इस किले का इस्तेमाल सैनिक प्रशिक्षण के लिए किया जाता था और बाद में यह शाही किला एक पर्यटन स्थल के रूप में सभी के सामने उभर कर आया, जिसने अपनी भव्यता से सभी के दिलों में जगह बनाई।

लाल किला की वास्तुकला
लाल किला ना सिर्फ दिल्ली की बल्कि देश की एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर है, जिसे विदेशों में भी ख्याति प्राप्त है। यहां आपको फारसी, यूरोपीय एवं भारतीय कला का समायोजन देखने को मिलेगा। इसकी दीवारों को भी काफी बारिकी से तराशा गया है। इसमें दो मुख्य द्वार है, जिसे दिल्ली दरवाज़ा और लाहौर दरवाज़ा के नाम से जाना जाता है। लाहौर दरवाज़ा, किले का मुख्य प्रवेश द्वार है, इसमें प्रवेश करते ही आपको एक लम्बा बाजार देखने को मिलेगा, जहां लाइन से कई दुकानें है, यहां आने वाले पर्यटक खरीददारी भी करते हैं।

लाल किला का आकर्षण
गेट से अंदर प्रवेश करने पर आपको नक्करख़ाना (संगीतज्ञों हेतु बने महल का मुख्य द्वार), दीवान-ए-आम (जनसाधारण हेतु बना वृहत प्रांगण), नहर-ए-बहिश्त (पूर्वी छोर पर ऊंचे चबूतरों पर बने गुम्बददार इमारतों की कतार), मुमताज महल (संग्रहालय), रंग महल (सुवर्ण मण्डित नक्काशीदार छतें और संगरमरमर सरोवर), खास महल (शाही महल व बुर्ज, जहां से बादशाह जनता को दर्शन देते थे), दीवान-ए-खास (सम्राट का निजी सभा कक्ष), मोती मस्जिद और हयात बख़्श बाग देखने को मिलेगा, जो किसी जन्नत से कम नहीं है। पर्यटकों के लिए लाल किला आजादी की दास्तां बयां करने वाला एक किला ही नहीं बल्कि एक राजशाही अंदाज को दिखाता जीवित किला भी है, जो आज भी उसी खूबसूरती के साथ खड़ा है, जैसे मुगल काल में था।

लाल किला में प्रवेश करने का समय
लाल किला में मंगलवार से रविवार तक सुबह 9:30 बजे से लेकर शाम 4:30 बजे तक प्रवेश किया जा सकता है। वहीं, सोमवार के दिन लाल किला में पर्यटकों के लिए जाने पर मनाही है।

लाल किला का प्रवेश शुल्क
भारतीयों के लिए - 10 रुपया
विदेशियों के लिए - 250 रुपया
फोटोग्राफी - निशुल्क
वीडियोग्राफी - 25 रुपया
साउंड एंड लाइट शो के लिए (शाम 6:00 बजे) - 80 रुपया (बच्चों के लिए 30 रुपया)

कैसे पहुंचें लाल किला
दिल्ली में नेताजी सुभाष मार्ग पर स्थित लाल किला का नजदीकी मेट्रो स्टेशन चांदनी चौक और नजदीकी रेलवे स्टेशन आनंद विहार है। यहां का नजदीकी एयरपोर्ट दिल्ली में ही है। इसके यहां सड़क मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है, जो विभिन्न राज्यों से जुड़ा हुआ है।
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