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» »सावन में हर साल इस चमत्कारी मंदिर में महादेव का दर्शन करने आते हैं नाग देवता

सावन में हर साल इस चमत्कारी मंदिर में महादेव का दर्शन करने आते हैं नाग देवता

पुराणों के अनुसार समुद्रमंथन के बाद जब हलाहल विष समुद्र से बाहर आया तो महादेव ने उसे अपने कंठ में धारण कर सृष्टि को बचाया था। मान्यता है कि भगवान शिव को विष के जलन से शांति प्रदान करने के लिए नागदेवता उनके कंठ से लिपट गये थे। इसके बाद से ही महादेव और सांपों का संबंध एक-दूसरे से काफी गहराई से जुड़ गया था।

Sangameshwar mahadev

लेकिन क्या आप धरती पर किसी ऐसे मंदिर के बारे में जानते हैं, जहां नाग देवता भगवान शिव के दर्शन करने हर साल आते हैं।

आइए आपको कुरुक्षेत्र के इस चमत्कारी मंदिर के बारे में बताते हैं :

कहां है यह चमत्कारी मंदिर?

हरियाणा राज्य के कुरुक्षेत्र में पिहोवा के पास अरुणाय गांव में स्थित है संगमेश्वर महादेव का मंदिर। अद्भूत वास्तुकला की वजह से यह मंदिर हमेशा से ही सैलानियों को आकर्षित करता रहता है। यह स्थल अरुणा और सरस्वती नदी का संगम स्थल है। इसी वजह से यहां स्थापित महादेव को संगमेश्वर महादेव के नाम से पूजा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार महर्षी वशिष्ट के श्राप से बचने के लिए सरस्वती नदी ने इस स्थान पर भगवान शिव की आराधना की थी, जिसके बाद से इस मंदिर में पूजा-अर्चना का प्रचलन शुरू हो गया।

हर साल आते हैं नाग देवता

lord shiva

किसी पौराणिक मान्यता के आधार पर नहीं बल्कि स्थानीय लोगों के अनुसार संगमेश्वर महादेव के मंदिर में हर साल सावन के समय सांप का एक जोड़ा उनके दर्शन के लिए आता है। बताया जाता है कि सांपों का यह जोड़ा कुछ देर तक शिवलिंग के इर्द-गिर्द लिपटकर वापस लौट जाता है। यह सिलसिला पिछले कई सालों से लगातार जारी है। दोनों सांप कहां से आते हैं और वापस कहां लौट जाते हैं, इस बारे में किसी को कुछ पता नहीं चल पाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन सांपों ने आज तक किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

संगमेश्वर महादेव के मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि वशिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र की हत्या करने के उद्देश्य से सरस्वती नदी से उन्हें बहाकर उनके आश्रम तक लाने का आदेश दिया था, क्योंकि दोनों ऋषियों में तपोबल हासिल करने की होड़ लगी थी। सरस्वती नदी ऋषि विश्वामित्र को बहाकर लेकर भी आयी थी लेकिन जैसे ही महर्षि वशिष्ठ ने उनकी हत्या करने का प्रयास किया सरस्वती नदी उन्हें अपने तेज बहाव के साथ बहाकर आगे लेकर चली गयी।

lord shiva

इससे क्रोधित महर्षि वशिष्ठ ने सरस्वती नदी को खून की नदी बन जाने का श्राप दिया था। उनके श्राप से बचने के लिए ऋषि विश्वामित्र ने इस स्थान पर स्थापित महादेव के शिवलिंग की पूजा करने की सलाह सरस्वती नदी को दी। इस शिवलिंग की पूजा करने के बाद ही सरस्वती नदी श्रापमुक्त हो सकी थी और वापस अपनी जलधारा को प्राप्त किया था।

कैसे पहुंचे संगमेश्वर महादेव के मंदिर?

संगमेश्वर महादेव का मंदिर अंबाला रोड के पिहोवा से लगभग 6 किमी दूर अरुणाय गांव में स्थित है। इस मंदिर तक पिहोवा से चलने वाली बसों के माध्यम से आसानी से पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा यह मंदिर सड़क मार्ग से कई शहरों से जुड़ा हुआ है। इसलिए यहां टैक्सी या निजी गाड़ी से भी पहुंचा जा सकता है।

सावन के महीने में बड़ी संख्या में कांवड़िये भगवान संगमेश्वर का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। साथ ही इस मंदिर की प्रसिद्धि की वजह से यहां नेता-मंत्रियों व राजनेताओं का आना-जाना भी लगा रहता है।

इस साल भी सावन की शुरुआत हो चुकी है और लोगों को नाग देवता का महादेव के दर्शन के लिए आने का इंतजार है।

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