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पाकिस्तान में मौजूद इस शक्तिपीठ की यात्रा में मां अपने बेटे को भी नहीं पिला सकती पानी

देवी सती के अंग जिन-जिन स्थानों पर कट कर गिरे थे, उन सभी स्थानों पर शक्तिपीठ स्थापित है। ऐसे ही कुल 51 शक्तिपीठ हैं। इनमें से ज्यादातर शक्तिपीठ भारत के विभिन्न राज्यों में मौजूद है लेकिन आज हम आपको पाकिस्तान में मौजूद एकलौते शक्तिपीठ के बारे में बता रहे हैं। इस शक्तिपीठ की यात्रा को अमरनाथ से भी ज्यादा कठिन माना जाता है।

Hinglaj mata

और तो और इस यात्रा के दौरान कोई माता अपने बच्चे को अपने बोतल से पानी तक नहीं पिला सकती है। भले ही उसका बच्चा रेगिस्तान में पानी की एक बूंद के लिए तड़प-तड़प कर अपनी जान ही क्यों ना दे दे। आइए आपको पाकिस्तान में स्थित शक्तिपीठ हिंगलाज माता के बारे में बताते हैं।

पाकिस्तान में गिरा था सिर

पौराणिक मान्यता के अनुसार पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में पति महादेव का अपमान सहन ना कर पाने की वजह से देवी सती ने आत्मदाह कर लिया था। पत्नी की मृत्यु के दुःख में महादेव देवी सती का शव उठा कर तांडव करने लगे थे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र के प्रहार से देवी सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिये थे।

Hinglaj mata

धरती पर जहां-जहां ये टुकड़े गिरे, वहां एक शक्तिपीठ स्थापित हुआ। पाकिस्तान के बालुचिस्तान के लसबेला कस्बे में स्थित है हिंगलाज माता का मंदिर। कहा जाता है कि इस स्थान पर देवी सती का सिर गिरा था। यह मंदिर इतना प्रसिद्ध है कि इसके सामने से गुजरते वक्त क्या हिंदु क्या मुस्लिम सभी सिर झुका कर ही आगे बढ़ते हैं।

बेहद कठिन है यात्रा

हिंगलाज माता के मंदिर की यात्रा को बेहद कठिन माना जाता है। यह रास्ता इतना कठिन है कि इसके आगे अमरनाथ यात्रा को भी सरल समझा जाता है। दरअसल, हिंगलाज माता के मंदिर की यात्रा में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर ही करीब 1000 फुट ऊंचे-ऊंचे पहाड़ मिलते हैं। इसके अलावा दूर-दूर तक फैले रेगिस्तान, जंगली जानवरों से भरे जंगल और करीब 300 फीट ऊंचे मड ज्वालामुखी को पार करके ही इस मंदिर में पहुंचना पड़ता है। इसके साथ ही रास्ते में आतंकवादियों और डाकुओं का खतरा भी बना रहता है।

baluchistan

इसलिए यात्री हमेशा 40-50 के समूह में ही इस यात्रा पर आगे बढ़ते हैं। भारत से हिंगलाज माता के मंदिर जाने वाले तीर्थ यात्रियों को सबसे पहले कराची जाना पड़ता है। कराची से हिंगलाज मंदिर की दूरी लगभग 250 किमी है। पहले यात्रियों को करीब 200 किमी का रास्ता पैदल ही तय करना पड़ता था जिसमें 2-3 महीनों का समय लग जाता था। लेकिन साल 2007 में चीन द्वारा वहां रास्ता बनवाने की वजह से अब 55 किमी का रास्ता तीर्थ यात्रियों को पैदल तय करना पड़ता है।

दो कठोर शपथ का करना पड़ता है पालन

हिंगलाज माता के मंदिर की यात्रा करने वाले हर तीर्थ यात्री को दो शपथ लेने होते हैं और उनका कठोरता के साथ पालन करना पड़ता है। तभी इस यात्रा को सफल माना जाता है। इस यात्रा पर जाने वाले हर यात्री को पहला शपथ लेना पड़ता है कि माता के दर्शन कर वापस लौटने के बाद वह सन्यास ग्रहण कर लेगा। दूसरा शपथ इससे भी अधिक कठिन माना जाता है।

hinglaj mata

इस कठिन यात्रा पर जाने वाले यात्री को दूसरा शपथ यह लेना होता है कि चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, वह अपने बोतल या सुराही का पानी किसी भी दूसरे व्यक्ति को पीने के लिए नहीं देगा। यहां तक की कोई मां अपने बच्चे को भी अपने बोतल या सुराही से पानी नहीं पिला सकती है। भले ही रेगिस्तान के विराने में वह प्यास से तड़प कर अपनी जान ही क्यों ना दे दे। इस कठिन यात्रा पर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने साथ खुद का बोतल या सुराही लानी पड़ती है।

हज की तरह मानते हैं पवित्र

हिंगलाज माता के मंदिर पर सिर्फ हिंदू ही नहीं बल्कि मुस्लिम की भी काफी आस्था है। यहां हर साल नवरात्रि के समय होने वाली विशेष पूजा में सिर्फ पाकिस्तान और भारत से ही नहीं बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन से भी तीर्थ यात्री आते हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में हिंदू व मुस्लिम के बीच का फर्क मिट सा जाता है।

hinglaj mata cave

कई बार मंदिर के पुजारी और सेवक मुस्लिम टोपी पहनकर मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं तो मुस्लिम भी पूजा के समय सिर झुकाये यहां खड़े रहते हैं। इस मंदिर को हिंदू हिंगलाज माता का मंदिर कहते हैं। वहीं मुस्लिम इसे बीबी नानी पीर या नानी का हज या नानी मंदिर के नाम से पुकारते हैं।

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