आजादी के 75 साल पूरे हो चुके हैं। इस 15 अगस्त को देश आजादी का 76वां साल मनाने वाला है। हर तरफ स्वतंत्रता दिवस से जुड़ी तैयारियां शुरू हो चुकी है। आजादी का अमृत महोत्सव भी मनाया जा रहा है। इसी क्रम में हम आपको एक ऐसे जेल के बारे में बता रहे हैं जिसका नाम सुनते ही कैदियों के पसीने छुटने लगते थे।

हम बात कर रहे हैं सेल्यूलर जेल की जिसे काला पानी के नाम से भी जाना जाता था।
अंडमान और निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में स्थित इस जेल को अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्रामियों को सजा देने के मकसद से ही बनवाया था। भारत की भूमि से हजारों किमी दूर समुद्र के बीच में स्थित इस जेल में वैसे कैदियों को रखा जाता था, जिन्हें काला पानी की सजा सुनायी गयी हो। काला पानी जिसमें काला यानी काल अथवा समय और चारों तरफ से पानी से घिरा हुआ। अर्थात पानी से घिरी ऐसी जगह जहां मौत तक लोगों को कैद रखा जाता था। हालांकि अंग्रेजों ने इस जेल का नाम सेल्यूलर जेल रखा था, जिसकी भी बड़ी ही अजीब वजह है।

सेल्यूलर जेल या काला पानी जेल की नींव वर्ष 1897 में रखी गयी थी। इस जेल को बनने में कई सालों का समय लग गया था। 1906 में यह जेल बनकर पूरी तरह से तैयार हो गया था। जेल में 15/8 फीट को 698 कोठरियां बनायी गयी थी, जिसमें कैदियों को रखा जाता था। कोई भी कैदी दूसरे कैदियों से बात ना कर सकें इसलिए इन कोठरियों में 3 मीटर की ऊंचाई पर रोशनदान बनाये गये थे।

कैदियों को ना तो अपनी कोठरियों से बाहर निकलने की इजाजत होती थी और ना ही उन्हें किसी से मिलने जुलने दिया जाता था। अकेलेपन, अंधेरी कोठरियों की सिलन और पूरा दिन मुंह बंद रखकर चुपचाप बैठे रहने का असर कैदियों की मानसिक स्थिति पर पड़ता था। वे शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से भी बीमार पड़ जाते थे। बताया जाता है कि कई कैदियों की मृत्यु तो कई अन्य वजहों से भी हो जाती थी, जिनका कोई रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है।
छोटी चहारदिवारी पर भागने का उपाय नहीं

किसी भी आम जेल की तरह सेल्यूलर या काला पानी जेल की चहारदिवारी ऊंची-ऊंची नहीं थी। इस जेल की चहारदिवारी काफी छोटी थी लेकिन कोई भी कैदी बाहर निकलकर भागने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। इसकी वजह चारों तरफ समुद्र का खारा पानी फैला हुआ था।
अगर कोई कैदी तैरकर भागने के बारे में भी सोचता तो मीलों तक फैले इस समुद्र को पार करने में कई दिनों का समय लग जाता। इतने समय में या तो कैदी पकड़ा जाता, किसी समुद्री जीव का शिकार बन जाता या फिर पानी में डूबकर उसकी मृत्यु हो जाती। यानी काला पानी के लिए भेजे गये कैदियों के वापस लौटने की कोई गुंजाइश ही नहीं होती थी। उनकी दर्दनाक मौत तय होती थी। जेल में ना जाने कितने भारतीय कैदियों को फांसी की सजा भी दी गयी थी।
भारतीय इतिहास का काला अध्याय
सेल्यूलर जेल को भारतीय इतिहास का काला अध्याय माना जाता है। चुंकि इस जेल में हर कैदी को अलग-अलग सेल में रखा जाता था, इसलिए इस जेल को अंग्रेजों ने सेल्यूलर जेल का नाम दिया। जिन क्रांतिकारियों से अंग्रेजी हुकूमत को ज्यादा खतरा होता था, उन्हें सेल्यूलर जेल में भेज दिया जाता था। बटुकेश्वर दत्त, योगेश्वर शुल्का और विनायक दामोदर सावरकर जैसे क्रांतिकारियों को काला पानी की सजा में सेल्यूलर जेल भेज दिया गया था। जेल में आज भी सावरकर कोठरी मौजूद है, जहां उन्हें रखा गया था।

इस जेल में कैदियों को सिर्फ कोठरियों में ही बंद नहीं रखा जाता था बल्कि उन्हें कई तरह की यातनाएं भी दी जाती थी। कैदियों को कोल्हू से बैल की तरह बांधकर तेल पिरवाया जाता था। कैदियों को 30 मन तेल निकालना होता था। अगर कोई कैदी ऐसा करने में असमर्थ होता तो उसे मारा जाता। जब जेल में बंद कैदियों ने यहां होने वाले अत्याचारों के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू की तो अंग्रेजों ने एक कैदी को जबर्दस्ती दुध पिला दिया। इस वजह से जब उसकी मौत हो गयी तो उसके शव को पत्थरों से बांध कर समुद्र में फेंक दिया गया।
आज यहां कोई जेल नहीं है, बल्कि सेल्यूलर जेल को म्यूजियम और स्मारक बना दिया गया है।



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