काशी या बनारस या फिर महादेव की नगरी। जैसे ही बनारस का नाम आता है तो जहन में तीन बातें आती हैं। वो तीन बातें हैं महादेव, गंगा और बनारस के घाट। गौरतलब है कि आज बनारस में कोई 100 घाट के आस पास हैं जो अपने आप में बेहद अनूठे हैं, सबकी अपनी अलग विशेषताएं हैं। बनारस के सभी घाट अपने आप में बेमिसाल हैं। यहां आकर ये नहीं कहा जा सकता कि ये घाट सुन्दर है या वो घाट ऐसे में यहां घाटों को वर्गीकृत करना बेहद मुश्किल हो जाता है।

आज हम आपको बताने जा रहे हैं वाराणसी के उस घाट के बारे में जो अपनी चहल पहल से देश के अलावा विदेशों के पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करता रहा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं वाराणसी के अस्सी घाट की, अस्सी घाट, पर्यटकों, शोधकर्ताओं, इजरायल के सैनिकों ( वह सैनिक जो सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद घूमना पसंद करते है ) का पसंदीदा गंतव्य स्थल है, यह घाट गंगा नदी के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित है।
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अस्सी घाट, अस्सी नदी और गंगा नदी के संगम पर स्थित है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवी दुर्गा ने राक्षस शुम्भ - निशुम्भ का वध करने के बाद यहां ही अपनी तलवार को फेंका था, यह राक्षस बहुत भयानक था। माना जाता है कि वह तलवार जिस स्थान पर गिरी, वहां से अस्सी नदी का क्षेत्र शुरू हो जाता है। इस घाट का वर्णन कई हिंदू धार्मिक ग्रंथों और पुराणों जैसे - मत्स्य पुराण, अग्नि पुराण, काशी कांड और पद्म पुराण आदि में मिलता है।

इस घाट पर पीपल के वृक्ष के नीचे भगवान शिव की शिवलिंग भी है और भगवान अस्सींगमेश्वारा का मंदिर भी है जिन्हे दो नदियों के प्रवाह और संगम का देवता माना जाता है। यहां एक काफी प्राचीन टैंक भी है जिसे लोरका टैंक के नाम से जाना जाता है जो जमीनी स्तर से 15 मीटर की गहराई पर स्थित है। अस्सी घाट में हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु भ्रमण करने आते है। चैत्र और माघ के माह में यहां काफी भक्त आते है।



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