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तस्वीरों में देखें! कैसे लखनऊ बन गया है उत्तर भारत का दूसरा सबसे बड़ा शहर

जाने लखनऊ आजादी से पहले कैसे दिखता था, और अब कितना बदल गया है

By Goldi

नवाबों की नगरी के नाम से विखाय्त लखनऊ गोमती नदी के तट पर स्थित है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की स्थापना नवाब आसफ - उद - दौला द्वारा की गई थी, उन्‍होने इसे अवध के नवाबों की राजधानी के रूप में पेश किया था।

लखनऊ को कभी 'सोने की नगरी' और 'शिराज ए हिंद' भी कहा जाता था। जहाँ कदम कदम पर कहकहे, हैं बुलबुलों के चह-चहे। लखनऊ का नाम आते ही तहज़ीब और नज़ाकत की ना जाने क्यूँ बरबस ही याद आ जाती है। लखनऊ के बाशिंदे जो वाक़ई लखनऊ की सरज़मीं से जुड़े हुए हैं उनकी हर बात इतने सलीके-तरीके और मीठे अंदाज़ में होती है की बस ऐसा लगता है मानो मुंह से फूल झड़ रहे हों।

लखनऊ में भले ही नवाब न बचे हों लेकिन उनकी शान-ओ-शौक़त आज भी लखनऊ की संस्कृति में साफ़ साफ़ झलकती है। गोमती नदी के किनारे बसा यह ऐतिहासिक नगर अपनी तहज़ीब के लिए दुनिया भर में मशहूर है, इसलिए इस शहर को 'शहर ऐ अदब' भी कहा जाता है। "लखनऊ है तो महज़ गुम्बद-ओ मीनार नहीं,सिर्फ एक शहर नहीं,कूचा ओ बाज़ार नहीं, इसके दामन में मोहब्बत के फूल खिलते हैं, इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं, लखनऊ हम पर फ़िदा, हम फ़िदा ऐ लखनऊ"।

लखनऊ बीते कई सालों में काफी बदल चुका है, आज लखनऊ, दिल्ली के बाद यह उत्तर, पूर्व और मध्य भारत का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। लखनऊ को हमेशा एक बहुसांस्कृतिक शहर के रूप में जाना जाता है जो 18 वीं और 19वीं शताब्दी में उत्तर भारतीय सांस्कृतिक और कलात्मक केंद्र है। आइये तस्वीरों में देखते हैं लखनऊ बीते कुछ सालों में कितना बदल चुका है-

इमामबाड़ा

इमामबाड़ा

बड़ा इमामबाड़ा, एक विशेष धार्मिक स्‍थल है। इसे आसिफ इमामबाड़ा के नाम से भी जाना जाता है क्‍योंकि इसे 1783 में लखनऊ के नबाव आसफ - उद - दौला द्वारा बनवाया गया था। इमामबाड़ा, लखनऊ की सबसे उत्‍कृष्‍ट इमारतों में से एक है।

 इमामबाड़ा

इमामबाड़ा

बड़ा इमामबाड़ा अवध की कलात्मक शैली का अद्भुत नमूना है। जिसको अवध के नवाब आसिफुद्दौला ने बनवाया था। इस इमारत में एक बहुत बड़ा हॉल है जिसमे करबला की बहुत सी निशानियाँ रखी हुई हैं। इस हॉल की खासियत यह है कि इसके एक कोने पे जाकर आप कागज़ फाड़ो तो दूसरे कोने में इसकी आवाज़ सुनाई देती है।Pc:Atis Basak

छोटा इमामबाड़ा

छोटा इमामबाड़ा

छोटा इमामबाड़ा को हुसैनाबाद इमामबाड़ा भी कहा जाता है। इस इमामबाड़ा को 1838 में मोहम्‍मद अली शाह के द्वारा बनवाया गया था, जो अवध के तीसरे नवाब थे। यह इमामबाड़ा, लखनऊ के पुराने क्षेत्र चौक के पास में ही स्थित है। इस इमामबाड़े को नवाब के अन्तिम विश्राम स्‍थल यानि मकबरे के रूप में बनाया गया है। इस स्‍थल पर नवाब की और उनके परिवार के अन्‍य सदस्‍यों की कब्र बनी हुई है।

 छोटा इमामबाड़ा

छोटा इमामबाड़ा

यह महीन नक्काशियों वाला अवधकाल की स्थपत्य कला का बेजोड़ नमूना है। छोटा इमामबाड़ा को पैलेस ऑफ लाइट कहा जाता है क्‍योंकि त्‍यौहारों के दौरान इसे अच्‍छी तरह सजाया जाता था। इस स्‍मारक में लगी झूमरें, बेल्जियम से आयात करके लाई गई थी, जिन्‍हे इंटीरियर के लिए मंगवाया गया था।Pc:Nikhil2789

रूमी दरवाजा

रूमी दरवाजा

तुर्किश द्वार के नाम से विख्यात चाउ स्थित रूमी दरवाजे का नाम 13 वीं शताब्‍दी के महान सूफी फकीर, जलाल-अद-दीन मुहम्‍मद रूमी के नाम पर पड़ा था। इस 60 फुट ऊंचे दरवाजे को सन् 1784 में नवाब आसफ - उद - दौला के द्वारा बनवाया गया था। यह द्वार अवधी शैली का एक नायाब नमूना है और इसे लखनऊ शहर के लिए प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है।

रूमी दरवाजा

रूमी दरवाजा

मुग़ल स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना रूमी दरवाज़ा बड़े इमामबाड़े की सड़क के सामने ही बड़ा सा आलीशान ऐतिहासिक दरवाज़ा है। इसके अंदर से सेंकडों गाड़ियां गुज़रती हुई बेहद लुभावनी लगती हैं। इस दरवाज़े की ऊंचाई 60 फुट है। इस दरवाज़े खासियत यह है की इसमें कहीं भी लकड़ी या लोहे का इस्तमाल नहीं किया गया है।Pc:Harvinder Chandigarh

घड़ी मीनार

घड़ी मीनार

हुसैनाबाद घंटाघर, हुसैनाबाद इमामबाड़ा के ठीक सामने स्थित है और रूमी दरवाजा से कुछ ही दूरी पर स्थित है। इस घंटाघर का निर्माण 1887 में करवाया गया था, जिसे रास्‍केल पायने ने डिजायन किया था। यह टॉवर भारत में विक्‍टोरियन - गोथिक शैली की वास्‍तुकला का शानदार उदाहरण है। इसके निर्माण की शुरूआत नवाब नसीर-उद-दीन ने अवध के पहले संयुक्‍त प्रांत के लेफ्टिनेंट गर्वनर जॉर्ज काउपर के स्‍वागत में करवाया था। उन दिनों इस घंटाघर पर 1.74 लाख की लागत लगी थी।

घड़ी मीनार

घड़ी मीनार

घड़ी मीनार (क्लॉक टॉवर) छोटे इमामबाड़े के सामने ही क्लॉक टावर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह क्लॉक टावर पूरे भारत का सबसे ऊँचा टॉवर है। जो कि 221 फुट ऊँचा और इसका पेंडुलम 14 फुट लंबा है। चारों और घंटियां लगी इस घड़ी का डायल 12 पंखुड़ियों वाला है।Pc: Prabhat1729

रेजीडेंसी

रेजीडेंसी

रेजीडेंसी का निर्माण नवाब आसफ-उद- दौला ने 1775 में शुरू किया करवाया था और 1800 ई. में इसे नवाब सादत अली खान के द्वारा पूरा करवाया गया। रेजीडेंसी के नाम से ही स्‍पष्‍ट है कि यह एक निवासस्‍थान है, यहां ब्रिटिश निवासी जनरल का निवास स्‍थान था, जो नवाबों की अदालत में ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधित्‍व किया करते थे। इस पूरे परिसर ने भारत की आजादी की पहली लड़ाई में लखनऊ के प्रसिद्ध घेराबंदी में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रेजीडेंसी का एक प्रमुख हिस्‍सा अंग्रेजी बलों और भारतीय विद्रोहियों के बीच की लड़ाई में नष्‍ट हो गया था। युद्ध के बाद इसे जस का तस छोड़ दिया गया।

रेजीडेंसी

रेजीडेंसी

रेजीडेंसी की टूटी - फूटी दीवारों में आज भी तोप के गोलों के निशान बने हुए हैं। इस परिसर में एक खंडहर चर्च भी है जहां एक कब्रिस्‍तान है जिसमें लगभग 2000 अंग्रेज सैनिकों, आदमियों, औरतों और बच्‍चों की कब्र बनी हुई है। रेजीडेंसी में हर शाम को यहां के इतिहास पर प्रकाश ड़ाला जाता है। रेजीडेंसी परिसर में 1857 मेमोरियल म्‍यूजियम भी स्‍थापित किया गया है जहां 1857 में हुई भारत की आजादी की पहली क्रांति को बखूबी चित्रित किया गया है।

हजरतगंज

हजरतगंज

हजरतगंज मार्केट, लखनऊ का केंद्र है जिसे 1810 में अमजद अली शाह ने बनवाया था यह मार्केट पहले क्‍वींस मार्ग पर स्थित था जहां अंग्रेज अपनी गाडि़यां और बग्‍घी चलाने जाया करते थे।

हजरतगंज

हजरतगंज

हज़रतगंज को लखनऊ का दिल भी कहा जाता है। इस सड़क का सौंदर्यीकरण 2010 - 2011 में किया गया था, जिसमें इसे विक्‍टोरियन लुक दिया गया था। इस लुक को लाने के लिए इस बाजार में विक्‍टोरियन लुक की लाइट्स, फव्‍वारे, बेंच सभी कुछ लगाया गया था और सभी दुकानों को एक ही रंग में पेंट करवाया गया। हजरतंगज बाजार में कई छोटे- छोटे बाजार, शॉपिंग मॉल, उत्‍तम दर्जे के शोरूम, होटल, पीवीआर थियेटर, रेस्‍टोरंट, फूड कोर्ट और कई नामचीन कार्यालय भी हैं।Pc:Mohit

दिलकुशा कोठी

दिलकुशा कोठी

लखनऊ के दिलकुशा क्षेत्र में गोमती नदी के तट पर स्थित है, इस कोठी को सन् 1800 में एक ब्रिटिश मेजर गोरे ऑस्‍ले ने बनवाया था, जो अवध के नवाब के दोस्‍त हुआ करते थे। वर्तमान में यह कोठी या प्राचीन स्‍मारक एक खंडहर में तब्‍दील हो चुका है।

दिलकुशा कोठी

दिलकुशा कोठी

इस इमारत की वास्‍तुकला डिजायन में इंग्‍लैंड के नॉर्थम्‍बरलैंड के सिटॉन डेलावल हॉल के पैटर्न की स्‍पष्‍ट झलक देखने को मिलती है। इसे वास्‍तव में नवाबों के शिकार लॉज के रूप में बनवाया गया था लेकिन बाद में इसे गर्मियों में रहने वाले घरों के तौर पर इस्‍तेमाल किया जाने लगा। इस कोठी का इस्‍तेमाल भारत की आजादी की पहली लड़ाई के दौरान स्‍वतंत्रता सेनानियों द्वारा किया गया था। हालांकि, भारी बमबारी के बाद ब्रिटिश सेना ने इस पर कब्‍जा कर लिया था और फलस्‍वरूप यह कोठी अपनी भव्‍यता और महिमा खोती चली गई। Pc: Arpan Mahajan

ला मार्टिनियर

ला मार्टिनियर

ला मार्टिनियर इमारत यूरोपीय स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। ला मार्टिनियर इमारत ब्रिटिश काल के मेजर जनरल क्लायड मार्टिन अपने रहने के लिए बनवाई थी। इस महल के लॉन में एक झील भी है। मार्टिन ने मरने से पहले अपनी वसीयत में लिखा था कि उसके मरने के बाद इस इमारत में 'ला मार्टिनियर स्कूल' बनाया जायगा। जो कि वैसा की किया गया है।Pc:Felice Beato

ला मार्टिनियर

ला मार्टिनियर

आज ला-मार्टीनियर कॉलेज देश के प्राचीनतम शिक्षण संस्थानों में शुमार है। साथ ही यह खूबसूरत इमारत का बॉलीवुड भी दीवाना है। इस कैंपस में अब तक शतरंज के खिलाड़ी, गदर एक प्रेमकथा, अनवर, ऑल्वेज कभी-कभी सहित कई हिट फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। हालांकि बच्चों की पढ़ाई के चलते यहां शूटिंग में काफी दुश्वारियां होती हैं फिर भी इमारत की भव्यता और खूबसूरती पर फिदा निर्माता-निदेशक इसे बर्दाश्त करने को तैयार रहते हैं।Pc:Mohitextreme

चारबाग़

चारबाग़

लखनऊ का प्रमुख रेलवे स्टेशन है। चारबाग में स्थित होने के कारण इसे चारबाग स्टेशन भी कहते हैं। यह 1914में बनकर तैयार हुआ था और इसके स्थापत्य में राजस्थानी भवन निर्माण शैली की झलक देखी जा सकती है।

चारबाग़

चारबाग़

बदलते जमाने के साथ भारत के चुनिंदा सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों में से एक है।Pc:Mohit


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