गंगा हो या यमुना नदियों का प्रदूषण सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। खासतौर पर वाराणसी, हरिद्वार या फिर ऋषिकेश जैसे धार्मिक शहरों से होकर बहने वाली नदियां, जहां इनके प्रदूषित होने की संभावना भी काफी ज्यादा बढ़ जाती है। बनारस धार्मिक आस्था का केंद्र है जहां जीने के साथ-साथ मरना भी शुभ माना जाता है।

मरने के बाद भी सभी धार्मिक अनुष्ठान नदियों को केंद्र में रखकर ही पूरे किये जाते हैं। इस वजह से वाराणसी में गंगा कई गुना ज्यादा प्रदूषित भी होती है। लेकिन क्या आपको पता है, अब गंगा को साफ रखने की जिम्मेदारी एक नन्हें जीव ने अपने मजबूत कंधे या यूं कहे पीठ पर उठा ली है। जी हां, हम बात कर रहे हैं कछुओं के बारे में। जो गंगा की सफाई करने में लगे हुए हैं वो भी अभी नहीं बल्कि पिछले कई सालों से। जल्द ही वाराणसी से गंगा में कछुओं को फिर से छोड़ा जाएगा।
कैसे करते हैं सफाई
आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि कछुए आखिर गंगा की सफाई में कैसे अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। दरअसल, हजारों की तादाद में नदी में कछुओं को छोड़ा जाता है, जो नदी में बहाए जाने वाले फुल-पत्तियों के साथ-साथ सड़े और अधजले शवों, मरी मछलियों को भी खाते हैं। इससे गंगा को प्रदूषणमुक्त होने में कछुए काफी मददगार साबित हो रहे हैं।

इन कछुओं को गंगा की सफाई के लिए केंद्र सरकार द्वारा चलायी जा रही 'नमामि गंगे' प्रोजेक्ट के तहत छोड़ा जाता है। जानकारी के अनुसार कछुओं को गंगा में छोड़ने के बाद जब पानी की गुणवत्ता जांची गयी तो उसमें काफी सुधार मिला। कछुओं को गंगा में डालने के बाद कई जगहों से पानी लेकर जांची गयी और उसके पीएच लेवल में काफी सुधार मिला। यह पानी अब नहाने के योग्य तक माना गया। कछुए पानी को इतना साफ बना देते हैं कि ये अगले 10-15 सालों तक ऐसे ही साफ रह सकते हैं।
कहां से आते हैं इतने कछुए
वाराणसी के पास सारनाथ क्षेत्र में 1980 से टर्टल रिहैबिलिटेशन सेंटर चल रहा है। जहां कछुओं को बचाने और उनके संरक्षण को लेकर लोगों को जागरूक किया जाता है। बताया जाता है कि अब तक गंगा में करीब 4,000 कछुओं को छोड़ा जा चुका है। आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि आखिर इतनी तादाद में कछुए आते कहां से है?

दरअसल, चंबल क्षेत्र के तटीय इलाकों से वन विभाग की टीम कछुओं का अंडा लेकर आती है। इन अंडों की लगभग 70 दिनों तक निगरानी में सेने का काम किया जाता है। जब अंडों से कछुए निकल आते हैं तो उन्हें पहले 2 सालों के लिए कृत्रिम तालाब में रखकर उनकी प्रजाति के अनुसार खाना खिलाया जाता है। जब ये कछुए सड़े मांस और फुल-पत्ती खाकर सफाई करने में माहिर हो जाते हैं तो उन्हें गंगा में छोड़ दिया जाता है।
दो तरह के कछुए छोड़े जाते हैं

गंगा नदी की सफाई की जिम्मेदारी दो तरह के कछुओं को सौंपी गयी है। शाकाहारी और मांसाहारी कछुए। साल 2013-14 से गंगा में कछुओं को छोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ है जो नियमित अंतराल पर जारी है। जानकारी के मुताबिक पिछले 10 सालों में 4000 से ज्यादा शाकाहारी और मांसाहारी कछुओं को गंगा में छोड़ा जा चुका है। इस साल अब तक 300 से ज्यादा कछुए अंडे से निकल चुके हैं, जिनका पालन-पोषण भी शुरू हो चुका है। अगले 2 महीनों में लगभग 1000 कछुओं को फिर से गंगा नदी में छोड़ने की तैयारियां की जा रही हैं।
कब कितने कछुए गंगा में छोड़े गये
| वर्ष | छोड़े गये कछुए |
| 2012-13 | 831 |
| 2013-14 | 1066 |
| 2014-15 | 815 |
| 2015-16 | 215 |
| 2016-17 | 458 |
| 2017-18 | 52 |
| 2018-19 | 494 |
| 2019-20 | 615 |
| 2022-23 | 300 (अब तक) |
(मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार)



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