दिवाली का त्योहार सिर्फ 1 दिन नहीं बल्कि यह 5 दिनों तक चलने वाला त्योहार होता है। धनतेरस से शुरू होकर त्योहारों का यह सिलसिला धनतेरस पर खत्म होता है। देश भर में प्रकाश पर्व के रूप में मनाये जाने वाली दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा होती है लेकिन नवाबी शहर लखनऊ में दिवाली के अगले दिन करीब 300 साल पुराना एक त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार कोई आम नहीं बल्कि बेहद नवाबी होता है।

क्या आप जाते हैं, दिवाली के अगले दिन लखनऊ में पतंगबाज़ी की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। अब तक आपने मकर संक्रांति के समय गुजरात और पंजाब की पतंगबाज़ी के किस्से जरूर सुने होंगे लेकिन क्या आपको पता है एक जमाने में लखनऊ की पतंगबाज़ी प्रतियोगिताओं में बड़े-बड़े नवाब भी हिस्सा लिया करते थे।
300 साल पुरानी है परंपरा

दिवाली के अगले दिन यानी गोवर्धन पूजा के दिन लखनऊ में पतंगबाज़ी की परंपरा कोई नहीं बल्कि काफी पुरानी है। स्थानिय लोगों की मानें तो लखनऊ की यह परंपरा लगभग 300 साल पुरानी है। दिवाली के अगले दिन लखनऊ में 'जमघट' नामक त्योहार मनाया जाता है, जिसमें पतंगबाज़ी की जाती है। इसमें लोग सिर्फ अपने घरों की छतों से ही पतंगबाज़ी का लुत्फ नहीं उठाते बल्कि पूरे लखनऊ शहर में पतंगबाज़ी की कई प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती है। लोग तरह-तरह के पतंग सिर्फ उड़ाते ही नहीं बल्कि पेंच भी लड़ाते हैं।
नवाब भी होते थे शौकिन

कहा जाता है कि लखनऊ की पतंगबाज़ी प्रतियोगिता के शौकिन सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि नवाब भी होते थे। कहा जाता है कि नवाबों के पतंगों को बड़े ही आकर्षक तरीके से सजाया जाता था, जिसमें सोने और चांदी के झालर बंधे होते थे। पतंग के पेंच लड़ाए जाते थे और जिसकी छत पर ये पतंग कट कर गिरते थे, उस दिन उसके घर पुलाव पकाने का रिवाज होता था।
आज भी लखनऊवाले को दिवाली के अगले दिन होने वाले इस त्योहार का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करते हैं। लोग पतंगबाज़ी प्रतियोगिता में बढ़-चढ़ कर हिस्सा भी लेते हैं और इसका लुत्फ भी उठाते हैं। सिर्फ प्रतियोगिताएं ही नहीं बल्कि लखनऊ के 'जमघट' में पतंगबाज़ी प्रतियोगिता में जितने वाले लोगों को नगद पुरस्कार भी दिया जाता है।
बरेली का मांझा और लखनऊ की पतंग

लखनऊ में पतंगबाज़ी प्रतियोगिता सिर्फ आम लोगों के बीच ही नहीं होती बल्कि यहां कई काइट क्लब भी हैं। इन काइट क्लब्स का कहना है कि यूं तो पतंग के मांझे लखनऊ में भी तैयार होते हैं लेकिन बरेली के मांझे की बात ही अलग होती है। बरेली के मांझे में डोर पर खास केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी मांग लखनऊ में पतंगबाज़ी करने वालों में काफी ज्यादा होती है।
वहीं अगर पतंग की ही बात की जाए तो लखनऊ के पतंग ही सबसे ज्यादा पसंद किये जाते हैं। शहर के कई ऐसे इलाके हैं जहां दिवाली के समय घर-घर में पतंग तैयार किया जाता है। लखनऊ की पतंगबाज़ी में बरेली के मांझे और लखनऊ की पतंग की सबसे ज्यादा मांग होती है।
किन इलाकों में तैयार होते हैं पतंग
- चूड़ी वाली गली
- वज़ीरबाग के दरीवाला
- सआदतगंज के बीबी गंज
- मोनीपुरसा
- हुसैनगंज
- रकाबगंज
लखनऊ के पतंग विक्रेताओं की माने तो दिवाली के समय यहां रंगी-बिरंगी डिजाइनर पतंग के साथ-साथ कार्टून वाली पतंग, हैप्पी दिवाली लिखी पतंग आदि की भी काफी मांग होती है। साल में यह ऐसा समय होता है जब हर रोज यहां 8 से 10 हजार तक पतंग बिकती हैं।
लूट की पतंग से होती है नवाबी

पतंगबाज़ी यूं तो खरीदी हुई पतंग से होती है लेकिन लूट की पतंग से जो लोग पतंग उड़ाते हैं, उनका अलग ही सम्मान होता है। कई बार पतंग लूटने के चक्कर में ये फट भी जाती हैं लेकिन लूटने वाले व्यक्ति की इज्जत बढ़ जाती है। दिवाली के समय लखनऊ के बाजारों में 4 से 9 इंच की पतंग मिलती हैं। इनकी कीमत आमतौर पर 10 रुपए से लेकर 20 रुपये के बीच में होती है और कभी-कभी बाजार में 100-150 रुपये के पतंग भी दिखते हैं। लखनऊ में पतंगों को खास नाम भी दिया जाता है। इनमें से मानदार, लट्ठेदार, तौखिया, गेंददार और चांदतारा पतंग सबसे ज्यादा पसंद किये जाते हैं।



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