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कपाट बंद होने के बाद कहां मिलेंगे केदारनाथ और बद्रीनाथ के दर्शन?

धर्म और आस्था के केंद्र भारत में भगवान की निद्रा में जाने से लेकर उनके जागने, मंदिरों के कपाट खुलने से लेकर उनके कपाट के फिर से बंद होने की प्रक्रिया को पूरे भक्तिभाव और श्रद्धा के साथ एक समारोह के तौर पर मनाया जाता है। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित चार धाम यात्रा के मंदिरों के कपाट को शीतकाल के लिए बंद करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

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इसमें से केदारनाथ और यमुनोत्री के कपाट भाईदूज (15 नवंबर) के दिन ही बंद कर दिये गये थे। गंगोत्री धाम के कपाट अन्नकुट के दिन बंद कर दिया गया। वहीं बद्रीनाथ के कपाट 18 नवंबर को बंद कर दिये जाएंगे। केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिरों को भगवान समेत ही बंद नहीं कर दिया जाता है बल्कि दोनों मंदिरों से भगवान को बाहर निकालकर उन्हें उनकी शीतकालिन गद्दी में विराजमान कर दिया जाता है।

यानी वह जगह जहां ठंड के दौरान करीब 6 महीनों तक दोनों मंदिरों के भगवान विराजमान रहते हैं और फिर जब केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिरों के कपाट खुलते हैं तो भगवान को फिर से उनके अपने-अपने मंदिरों में स्थापित कर दिया जाता है। जब केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट बंद रहते हैं, तब कहां मिलेंगे इन देवताओं के दर्शन? कहां होती है इनकी शीतकालीन गद्दी?

क्या होती है केदारनाथ के कपाट बंद होने की प्रक्रिया?

भाईदूज के दिन ब्रह्म मुहूर्त से ही केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद होने की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी। इस दिन मंदिर के मुख्य पुजारी ने स्वयंभू शिवलिंग को सबसे पहले श्रृंगार मुक्त किया। इसके बाद ब्रह्मकमल और कुमजा पुष्प के साथ स्वयंभू शिवलिंग को समाधिस्थ करने की पूजा शुरू हुई, जो सुबह 6.30 में संपन्न हुई।

इसके बाद एक-एक कर सभामंडप के सभी छोटे मंदिरों के कपाट बंद किये गये। सुबह 8.30 बजे पहले केदारनाथ मंदिर के दक्षिण द्वार को और उसके बाद पूर्व के द्वार को बंद कर भगवान केदारनाथ के कपाट इस साल बंद होने की प्रक्रिया संपन्न की गयी। इसके बाद भगवान केदार की पंचमुखी चल विग्रह उत्सव डोली को मंदिर से बाहर निकाला गया।

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कहां स्थापित होगी चल विग्रह उत्सव डोली?

केदारनाथ मंदिर के बंद होने के बाद बाबा केदार की पंचमुखी चल विग्रह उत्सव डोली को तीन बार मंदिर की परिक्रमा करवायी गयी। इसके बाद डोली यात्रा आरंभ हुई जो रामपुर में रात्रिवास के लिए रुकी। 16 नवंबर को डोली गुप्तकाशी पहुंची और 17 नवंबर को अपने शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ पहुंची, जहां अगले 6 महीनों तक यह डोली स्थापित रहेगी। ऊखीमठ में ही बाबा केदार शीतकाल के दौरान अपने भक्तों को दर्शन देंगे और मंदिर खुलने वाले दिन वह वापस केदारनाथ मंदिर में स्थापित किये जाएंगे।

यमुनोत्री और गौरीकुंड की गौरा माई की डोली

भाईदूज के दिन ही यमुनोत्री के कपाट को भी बंद कर दिया गया। दोपहर 11.57 बजे यमुनोत्री धाम के कपाट बंद किये गये। बहन यमुनोत्री को लाने के लिए स्वयं भाई शनि महाराज खरसाली से यमुनोत्री धाम पहुंचे थे। मंदिर से देवी यमुना की भोगमूर्ति को बाहर निकाला गया और डोली में उन्हें स्थापित किया गया।

इसके बाद शनि महाराज की अगुवाई में देवी यमुना की डोली खरसाली गांव पहुंची जो अगले 6 महीनों तक देवी यमुना की शीतकालिन गद्दी होगी। उसी तरह गौरीकुंड में सुबह 5 बजे गौरा माई की भोगमूर्ति को डोली में विराजमान किया गया और 8.15 बजे मंदिर के कपाट बंद कर दिये गये। गौरा माई का शीतकालिन प्रवास स्थल गौरी गांव में चंडिका मंदिर में होगा।

शुरू हो चुकी है बद्रीनाथ के कपाट बंद होने की प्रक्रिया

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बद्रीनाथ मंदिर के कपाट 18 नवंबर को दोपहर 03.33 मिनट पर बंद किये जाएंगे, जिसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। मंदिर के कपाट बंद होने के बाद बाबा बद्रीविशाल की डोली उनके शीतकालिन प्रवास जोशीमठ में स्थित नृसिंह मंदिर पहुंचेगी। अगले 6 महीने तक बाबा बद्री विशाल इसी मंदिर में भक्तों को दर्शन देंगे। बद्रीनाथ मंदिर के बंद होने की प्रक्रिया भी काफी अलग होती है। इस मंदिर के कपाट एक नहीं बल्कि तीन अलग-अलग लोगों के पास स्थित चाभियों से खुलती और बंद होती है।

बद्रीनाथ में है घी का विशेष महत्व

मंदिर के कपाट को बंद करने से पहले भगवान विष्णु की शालिग्राम प्रतिमा पर घी का लेप लगाया जाता है। मान्यता है कि जब मंदिर के कपाट अगले वर्ष खुले उस समय अगर घी पूर्व स्थिति में ही पाया गया तो पूरा साल खुशहाली में गुजरेगा। अगर घी सूख गया तो इसे किसी बड़ी विपत्ति आने का संकेत माना जाता है। इसके साथ मान्यता है कि मंदिर के कपाट बंद करने से पहले पुजारी मंदिर के सामने घी का एक दीया जलाते हैं जो 6 महीने बाद, जब मंदिर खुलता है उस समय भी जलता हुआ ही मिलता है।

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