हर फेस्टिवल का अपना अलग रंग और खुशमिजाजी होती है। गोवा एक ऐसी जगह है जहां सभी फेस्टिवल्स को समान उत्साह के साथ मनाया जाता है। शायद यहीं वजह है कि फेस्टिवल चाहे कोई भी हो, लेकिन गोवा में घूमने जाने वाले लोगों की संख्या में कभी कमी नहीं आती है।
Good Friday का लॉन्ग वीकेंड हो या बस यूं ही बैग पैक कर गोवा निकल जाने का मन हो...अगर आप अभी यानी 28 मार्च से 8 अप्रैल के बीच गोवा जाने का प्लान बना रहे हैं तो वहां चल रहे कुछ अनोखे लेकिन बड़े ही खास फेस्टिवल्स में जरूर शामिल हों। यहां आपको ऐसा अनुभव मिलेगा जिसे आप पूरी जिंदगी अपने दिल में बड़े प्यार से संजो कर रखना पसंद करेंगे।

गोवा में इस समय कौन-कौन से Ongoing Festivals हैं -
1. शिग्मो फेस्टिवल

इसे अगर गोवा का होली कार्निवल भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यह फेस्टिवल गोवा के कई शहरों में मनाया जाता है। ढोल, ताशा और कसाले के साथ इस फेस्टिवल को सेलिब्रेट किया जाता है। शिग्मो फेस्टिवल दो तरह के होते हैं - धाक्तो शिग्मो (छोटा शिग्मो) और व्हाडलो शिग्मो (बड़ा शिग्मो)।
इस साल शिग्मोत्सव 26 मार्च से 8 अप्रैल तक गोवा के विभिन्न शहरों में मनाया जा रहा है जिनमें पोंडा, कैलंगुट, वल्पोई, पणजी, मडगांव मापुसा आदि शामिल है।
शिग्मोत्सव या शिग्मो फेस्टिवल से जुड़ी विस्तृत जानकारी के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लीक कर हमारा यह आर्टिकल जरूर पढ़ें -
2. ज़ेनी उज्जो

यह एक वार्षिक त्योहार है जो शिग्मो फेस्टिवल में पहली पूर्णिमा की रात के बाद मनाया जाता है। इसे मुख्य रूप से क्यूपेम में मोलकोर्नेम गांव में मनाया जाता है। इस फेस्टिवल में गांव की स्थापना और उनकी मान्यताओं को सम्मानित करने के साथ ही वसंत ऋतु में फसल की कटाई का जश्न भी मनाया जाता है।
प्राकृतिक संसाधनों जैसे गाय के गोबर से बने उपले, जिन्हें स्थानीय रूप से ज़ेनी कहा जाता है और पत्तियों का उपयोग कर चिंगारी उत्पन्न की जाती है जिसे उज्जो कहा जाता है। इस आग के चारों ओर ग्रामीण बड़े उत्साह के साथ नृत्य करते हैं। इसे गोवा की आग वाली होली भी कही जाती है।
3. घोड़े मोडनी

घोड़े मोडनी गोवा में मनायी जाने वाली सदियों पुरानी परंपरा है। यह घुड़सवारों और मार्शल आर्ट को दर्शाता है। इसमें पारंपरिक योद्धाओं की पोशाक में घुड़सवार अपने आकर्षक रूप से सजे हुए घोड़ों पर बैठकर कला प्रदर्शित करते हैं। घोड़े मोडनी लोकनृत्य शिग्मो फेस्टिवल का प्रमुख आकर्षण है, जो मूल रूप से फसलों की कटाई के समय किया जाता है।
4. शिशा रन्नी

यह कानाकोना में अवेम-खोतिगाव में श्री मल्लिकार्जुन मंदिर में आयोजित होता है। यह एक पारंपरिक रस्म की तरह होती है, जिसमें परंपरागत रूप से चावल पकाने वाले चुल्हे के आकार में तीन पुरुष के सिर पर मिट्टी का बर्तन रखकर उसमें चावल पकाया जाता है। ये तीनों पुरुष ही जमीन पर लेटे रहते हैं।
कानाकोना तालुक के गांवडोंगरीम से तीन पुरुष अपनी इच्छा से अपने सिर से लकड़ी का चुल्हा तैयार करते हैं जिसपर चावल पकाया जाता है। तीनों के सिर को गीले कपड़े से ढंक दिया जाता है। इस परंपरा के तहत शिशा पेड़ की लकड़ियों को जलाकर उसपर बर्तन रखा जाता है, जो पारंपरिक चुल्हे का प्रतिक होता है।
कानाकोना में श्री मल्लिकार्जुन मंदिर 3 जगहों पर स्थित है - श्रीस्थल, कानाकोना में मुख्य मंदिर और गाओडोंग्रीम गांव। शिशरन्नी परंपरा तीनों मंदिरों में हर तीन पर आयोजित होती है।



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