एक सप्ताह से भी कम दिनों का इंतजार। उसके बाद ही दस्तक देने वाला है खुशियों और उमंगों का त्योहार होली। बृज, मथुरा, बरसाना, नंदगांव या फिर बनारस में अलग अंदाज में मनायी जाने वाली होली के साथ ही अलग-अलग समुदाय भी कई तरह की होली मनाते हैं। सिखों को 10वें गुरु गोविंद सिंहजी ने भी अपने ढंग से होली मनाने की परंपरा की शुरुआत की थी।
सिखों की होली को 'होला मोहल्ला' के नाम से जाना जाता है। क्या आप जानते हैं, होला मोहल्ला सिर्फ रंगों और खुशियां मनाने का ही पर्व नहीं है बल्कि यह सिखों की शौर्यगाथा भी सुनाता है।

क्या है होला मोहल्ला का इतिहास
होला मोहल्ला पर्व की शुरुआत वर्ष 1680 में पंजाब के किला आनंदगढ़ साहिब में गुरु गोविंद सिंहजी ने की थी। होला-मोहल्ला नाम दो तरह के शब्दों से मिलकर बना है। इसका पहला शब्द 'होला' होली का ही पुलिंग शब्द है। वहीं 'मोहल्ला' शब्द मय यानी बनावटी और हल्ला यानी हमला से बना है।
गुरु गोविंद सिंह ने होला मोहल्ला पर्व को बनाकर सिखों में वीरता के जज्बे को बढ़ाने की कोशिश की थी। होला मोहल्ला में सिख समुदाय के लोगों को दो दलों में बांटकर युद्ध करने की कला सिखायी जाती थी। इतिहासकारों के मुताबिक गुरु गोविंद सिंह ने जब इसकी शुरुआत की थी, तब लोग एक-दूसरे पर फूल और फूलों से बने रंग डालते थे।

कब मनाया जाएगा होला-मोहल्ला
होला मोहल्ला की शुरुआत होली के दिन से होती है। यह त्योहार 6 दिनों तक मनाया जाता है। इसमें पहले 3 दिन का पर्व कीरतपुर साहिब में और अगले 3 दिनों का पर्व आनंदपुर साहिब में मनाया जाता है। इस उत्सव को देखने के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश से लोग आनंदपुर साहिब में जमा होते हैं।
इस साल होला मोहल्ला 25 से 27 मार्च तक मुख्य रूप से मनाया जाएगा। इस उत्सव में 6 साल के बच्चे से लेकर 60 साल तक के वृद्ध तक शामिल होते हैं। होला मोहल्ला के मौके पर जगह-जगह लंगर का आयोजन भी किया जाता है जिसमें लोग बड़े ही आदर से प्रसाद खाने का अनुरोध भी करते हैं।

निहंग सिख करते हैं शौर्य का प्रदर्शन
होला मोहल्ला पर्व की शुरुआत गुरु गोविंद सिंह ने कमजोर वर्ग में साहस और वीरता बढ़ाने के लिए किया था। होला मोहल्ला के मौके पर आनंदपुर साहिब में खासतौर पर गुरुवाणी का पाठ तो किया ही जाता है लेकिन इस समय कई तरह के पुराने शस्त्रों को भी प्रदर्शित किया जाता है। होला-मोहल्ला के मौके पर पर्यटक निहंग सिखों के नये और पुराने दोनों तरह के शस्त्र देख सकते हैं।

होला मोहल्ला के दौरान जब निहंग सिख, जिन्हें गुरु गोविंद सिंह की लाडली सेना कहा जाता है, अपनी शक्ति प्रदर्शन करते हैं, तब लोग दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए निहंग सिख इस दिन घुड़सवारी, तलवारबाजी और गतका चलाते हैं।



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