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भारत के इन स्थानों की यात्रा कोई बच्चों का खेल नहीं, बड़ी हिम्मत चाहिए

Posted By: Staff

यदि आप एडवेंचर के शौक़ीन होने के अलावा बहादुर भी हैं और ये सोंचते हैं कि आप किसी भी स्थान की यात्रा बिना डर और झिझक के कर सकते हैं तो हो सकता है हमारा ये लेख आपको थोडा विचलित कर दे, और आपके इरादे हो बदल दे। आज हम आपको बताने जा रहे हैं भारत की उन चुनिंदा जगहों के बारे में जहां जाने पर आपको डर और रोमांच की अनुभूति एक साथ होगी।तो आइये जाने भारत के उन स्थानों के बारे में जहां वही जा सकता है जिसमें डर को जीतने का दम हो।

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कुलधारा एक वीरान गांव

कुलधारा एक वीरान गांव

स्वर्ण नगरी जैसलमेर से करीब 25 किलोमीटर दूर बसे गांव कुलधारा के बारे में प्रचलित है कि ये गांव अपने एक जालिम दीवान सालिम सिंह की वजह से श्रापित हुआ है। आज भी इस गांव पर उस समय रहने वाले पालीवाल ब्राह्मणों का श्राप है। भवन निर्माण इन ब्राह्मणों का मुख्य व्यवसाय हुआ करता था और उस समय इनकी निपुणता की चर्चा दूर दूर तक थी। यहां आने वालों के मुताबिक जैसे जैसे आप इस गांव के खँडहर में चलते जाएंगे आपको एक अजीब सी ठंड और बेचैनी का एहसास होगा।

न भूत न आत्मा फिर भी है डरावना

न भूत न आत्मा फिर भी है डरावना

हम में से बहुत से लोग अँधेरे और सन्नाटे से डरते हैं। देश के उत्तर पूरब में बसे राज्य मेघालय में आज भी कई ऐसी गुफाएं मौजूद हैं जहां जाने पर आपकी सांसे थम जाएंगी। तो अब अगर आप डर को जीतना चाहते हैं और आपके अंदर हिम्मत तो खासी हिल्स में मौजूद इन गुफाओं की सैर पर आ जाइये।

यहां खून भी जम जाता है

यहां खून भी जम जाता है

जी हां बिल्कुल सही सुना आपने, लद्दाख में एक झील है जिसका नाम है जंसकार झील, ये झील और इसके आस पास का एरिया इतना ठंडा है कि ये आपके शरीर के अंदर का खून और आपको जमा देगा।

क्या कंकालों से डरते हैं आप

क्या कंकालों से डरते हैं आप

सिर्फ कंकाल शब्द की अनुभूति ही आपको डराने के लिए काफी है। अब आप एक ऐसी झील की कल्पना करिये जहां चरों तरफ बस कंकाल ही कंकाल पड़े हो। जी हां उत्तराखंड में मौजूद रुपखंड झील एक ऐसी ही जगह है जहां आपको अपने आस पास कंकाल दिखेंगे। ये कंकाल यहां कैसे आये इस विषय में यहां के स्थानीय लोगों के बीच कई कहानियां मौजूद हैं।

जलते हुए शवों की गंध

जलते हुए शवों की गंध

मणिकर्णिका घाट, वाराणसी का सबसे पुराना घाट है, जो इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यहां साल के 12 महीने 24ओं घंटे दाह संस्कार होता है। अब जाहिर है जब दाह संस्कार हो तो गंध का आना तो लाज़मी है। वैसे भी हममें से कम ही लोग होते हैं जो लाशों को देख पाते हैं।