जब भी कोई हाथी सड़क से गुज़रता है, तो हर किसी की नज़र एक टक उसे ही देखने लगती है। तमाम लोगों का मुंह बिचक जाता है, जब वही हाथी सड़क पर गोबर कर देता है। कुछ नाक-मुंह सिकोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं तो कुछ गंदगी का हवाला देने लगते हैं। यही आलम लगभग उन पर्यटक स्थलों पर भी होता है, जहॉं हाथी की सवारी का चलन है। लेकिन क्या आपको हाथी के गोबर को वैज्ञानिक दृष्टि से देखा है? देखा भी क्यों होगा, हमें उसके अंदर का विज्ञान पढ़ाया ही कहॉं गया! खैर चलिये आज विज्ञान और वन्यजीव विभाग के हवाले से हम आपको हाथी के गोबर के बारे में कुछ चौंकाने वाली बातें बताते हैं।

हाथी के गोबर पर लिखने का आईडिया तब आया, जब तमिलनाडु के मोहम्मद सातिक, जो पेशे से पब्लिक प्रॉसीक्यूटर हैं, ने मदुमलई के जंगलों में बिताये गये तीन दिनों का अनुभव हमें भेजा। वैसे आप भी अपनी किसी भी यात्रा का अनुभव हमारे ईमेल ([email protected]) पर भेज सकते हैं। मई 2024 में उन्होंने तीन दिन घने जंगलों में बिताये। दरअसल वे निकले थे हाथियों की जनगणना के मिशन पर।

मोहम्मद सातिक ने बताया कि जब वो जंगल के अंदर हाथियों की खोज करने निकले तो पहले दिन उन्हें कुछ भी हाथ नहीं लगा। न कोई हाथी मिला न किसी हाथी का सुराग। थक हार के वो जंगल में ही कैम्प लगाकर सो गये। सुबह उठते ही महज 2 किलोमीटर ही आगे बढ़े थे कि हाथियों का गोबर मिला। गोबर थोड़ा पुराना था, लेकिन यह बताने के लिए काफी था कि कुछ दिन पहले उस जगह पर हाथियों का बसेरा रहा होगा। सातिक बताते हैं कि गोबर का पहला ढेर मिलते ही उन्होंने केवल वही दिशा चुनीं जहॉं-जहॉं गोबर था। वो गोबर एकत्र करते गये और आगे बढ़ते गये। 15 किलोमीटर पैदल यात्रा के बाद उन्हें इस बात की खुशी हुई कि वो जिस मकसद से आये हैं वो पूरा होता दिख रहा है।

उन्होंने बताया कि गोबर के द्वारा दिखाये गये रास्ते पर ही उन्हें सफलता मिली, वो भी तीसरे दिन। तीसरे दिन वे एक बड़े तालाब के पास पहुंचे तो देखा हाथियों का एक बड़ा झंड पानी में खेल रहा है। यही नहीं गोबर से ही उन्हें हाथियें की सामाजिक गतिविधियों का अध्ययन करने में भी मदद मिलती है।
और क्या-क्या पता चलता है हाथी के गोबर से:
वन्यजीवों की निगरानी: वन्यजीवों की निगरानी के दौरान जब वन्यकर्मी जंगलों में निकलते हैं तो हाथी के गोबर पर उनकी खास नज़र रहती है। इससे वे हाथियों की गतिविधियों का पता लागते हैं। इससे यह भी पता चलता है कि हाथी किस दिशा में गये हैं। और तो और गोबर का विश्लेषण करके, वे यह पता लगाते हैं कि झुंड में लगभग कितने हाथी हो सकते हैं।
हाथियों का स्वासथ्य: वन्यकर्मी अपने साथ अलग-अलग खाली पैकेट लेकर चलते हैं। जहॉं-जहॉं हाथी का गोबर मिलता है, वो उठा कर अलग-अलग पैकेटों में रखते जाते हैं। लौट कर वे सारे पैकेट लैब में जमा कर देते हैं, जहां पर गोबर की जांच की जाती है। जॉंच से पता लगाया जाता है कि जंगल में रह रहे हाथियों का स्वासथ्य कैसा है। यही नहीं अलग-अलग गोबर में से अगर एक ही बीमारी के लक्षण होने का पता चलता है, तो वन्य अधिकारी तुरंत डॉक्टरों की टीम जंगल में भेजते हैं, ताकि उनका सही समय पर इलाज हो सके।

क्या खा रहे हैं हाथी: हाथी के गोबर का विश्लेषण कर हाथियों की आहार और सेहत का तो पता चलता ही है, साथ ही यह भी पता चलता है कि वे क्या खा रहे हैं। अगर हाथी के आहार में परिवर्तन होता है, तो वन्य अधिकारी तुरंत अलर्ट हो जाते हैं। इसके अलावा हाथियों के भोजन की आदतें और उनके आवास का उपयोग समझने में भी मदद मिलती है।
शिकारी का पता लगाना: गोबर की निगरानी से अधिकारी अवैध गतिविधियों जैसे शिकार के संकेत प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर उन्हें ऐसी जगहों पर गोबर मिलता है जहॉं आम तौर पर हाथी नहीं जाते हैं, तो यह संकेत हो सकता है कि हाथियों को शिकार के कारण अपनी जगह से भागना पड़ा हो।
पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन: हाथी की गोबर बीजों के फैलाव और मिट्टी की उर्वरता में बड़ा योगदान करता है। गोबर का अध्ययन करके, अधिकारी यह आकलन कर करते हैं कि पूरे जंगल में कौन से पेड़ आने वाले मॉनसून के बाद फले-फूलेंगे। यही नहीं कम घरे इलाकों में अगर हाथी का गोबर पाया जाता है, तो इसका मतलब आने वाले समय में वहां हरियाली होगी। यानि कि हाथी का गोबर पूरी तरह पर्यावरण की सेहत में अच्छा खासा योगदान देता है।

हाथियों की जनगणना: जैसा कि ऊपर आपको बता चुके हैं कि गोबर से यह पता लगाया जाता है कि जंगल में हाथियों की जनसंख्या कितनी है। दरअसल लैब में ले जरकर जब सैम्पलिंग की जाती है तो जितने भिन्न सैम्पल मिलते हैं, उन्हीं के आधार पर उनकी संख्या का अनुमान लगाया जाता है।
गोबर का कार्डबोर्ड: हाथी के गोबर से कार्डबोर्ड, पेपर, आदि भी बनाया जाता है। इन वस्तुओं को हम ईकोफ्रेंडली का दर्जा देते हैं। बाज़ार में मिले न मिले लेकिन एमेजॉन, फ्लिपकार्ड आदि पर ये चीजें आराम से मिल जाती हैं।
हाथी के गोबर से बनी कॉफी: चलते-चलते आपको एक बात और बताना चाहेंगे कि थाईलैंड में हाथी के गोबर से बीज निकाल कर ब्लैक आइवरी कॉफी बनायी जाती है। अलग-अलग जगहों से बटोरे गये गोबर से कॉफी के बीज निकाले जाते हैं और उसे सुखा कर कॉफी बनायी जाती है। थाईलैंड में इस एक कप कॉफी की कीमत 50 डॉलर होती है, यानि कि भारतीय करंसी में करीब 4000 रुपए।



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