मिर्ज़ापुर जिसे हम मीरजापुर भी कहते हैं एक बार फिर सुर्खियों में है। हो भी क्यों न...एक बार फिर से ओटीटी पर भौकाल मचाने कालिन भैया और बाकी मिर्जापुर वासी सीजन 3 के साथ जो लौट रहे हैं। वेबसीरिज का टिजर रिलीज किया जा चुका है और मात्र 3 दिन में ही इसे 6 मिलियन से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं। पर आपको एक मजेदार बात बताएं, वेबसीरिज में मिर्जापुर के बारे में जो चीजें दिखायी जाती हैं, असलियत में...
मिर्जापुर इससे कहीं अलग है। मिर्जापुर या मीरजापुर के प्राचीन इतिहास के बारे में प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। लेकिन यह सर्वमान्य तथ्य है कि आदिवासियों तथा वनवासियों के अस्तित्व के प्रमाण मीरजापुर से अधिक अन्यत्र कहीं नहीं मिलते। चलिए हम आपको असली वाले मिर्जापुर के भौकाल से थोड़ा परिचय करवा देते हैं और हां, इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ना...खासतौर पर बनारस वाले।

बनारस के मिर्जापुर से जुड़े तार की बड़ी दिलचस्प जानकारी आपको मिलेगी।
तो चलिए आपको वीबीएस पूर्वांचल विश्वविद्यालय के डॉ. कल्याण कुमार श्रीवास्तव द्वारा किए गए रिसर्च के अनुसार मीरजापुर से जुड़ी कुछ हैरान करने वाली जानकारियां देते हैं :
ग्रेनाइट से मजबूत उपकरण
कैमूर के घने जंगलों एवं सोन घाटी में पुरातन मानव द्वारा निर्मित ऐसी गुफाएं देखने को मिलती हैं जो उनकी पाषाण कालीन सभ्यता की ओर संकेत करती है। इन गुफाओं में भित्ति चित्र एवं पत्थर के उपकरण भी पाए गए हैं। ये उपकरण ग्रेनाइट से भी कठोर और मजबूत पाए गए हैं।
ऐसे उपकरण भी प्राप्त हुए हैं जो लकड़ी, हड्डी और कोनेलियन आदि पत्थरों के हैं, ये नुकीले और तेज धार वाले उपकरण संभवतः शिकार करने या जानवरों का चमड़ा उतारने में इस्तेमाल किये जाते रहे होंगे। ऐसी मान्यता है कि पेड़ एवं लकड़ी आदि काटने के लिए पत्थर की ही कुल्हाड़ी का प्रयोग किया जाता रहा होगा । यह प्रस्तर सामग्री 'पिगोफिलंट' नाम से जानी जाती है।
प्रमुख आदिम जाति पेरू
इस जनपद में रहने वाली प्रमुख आदिम जाति 'पेरू' थी, जिसका शासन चुनार के पूर्व से शाहाबाद तक था। शाहाबाद में वे शेरशाह और अकबर के शासन काल तक रहे। 1612 ई0 से 1800 ई० तक पलामू में शासन करते रहे और अंग्रेजों से ही पराजित हुए।

मीरजापुर या गिरिजापुर?
इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो पायेंगे कि यहां के राजा बन्नार ने इस शहर को 'गिरिजापुर' नाम से बसाया था। वर्षों तक यहां प्राकृतिक संपदा अटखेलियां करती रहीं। पहाड़ों और जंगलों से घिरा हुआ यह नगर एक व्यवसायिक गढ़ बन गया और मध्य एशियाई आक्रमणकारियों के आने के बाद लोग इस शहर को 'मीरजापुर' के नाम से पुकारने लगे।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस शहर को मंचित करने में यूरोपीय यात्री टीफेन्थालार का बड़ा हाथ रहा। टीफेन्थालार ने अपने संस्मरणों में (जो 1760-1770 के मध्य लिखे गये) इस शहर को 'मीरजापुर' के नाम से लिखा। उसके बाद ही इसे यूरोपीय भूगोलविद् जेम्स रैनेल ने अपने एटलस में इस शहर को मीरजापुर के नाम से दर्शाया था।
पूर्व का लीवरपूल
ब्रिटिश शासन काल में मीरजापुर जनपद भौगोलिक विविधताओं का केन्द्र था। यह व्यापार का बड़ा केंद्र था जहां पर दक्षिण और पश्चिम से बड़ी संख्या में व्यापरी आते थे। यहां से सरकार को राजस्व के रूप में भारी रकम मिलती थी। मीरजापुर नगर में पीतल का कार्य, चपड़ा दरी, तसर सिल्क तथा नील का व्यापार प्रमुख व्यवसाय था। यहाँ से पत्थर, ब्रास, कारपेट, लोहे की वस्तुएं, अनाज, घी, मसाले, कच्ची-चीनी, लोहा, ताँबा, नमक, अनाज, सूत तथा सूती कपड़ों का निर्यात किया जाता था। यही कारण है उन दिनों इस शहर को पूर्व का 'लिवरपूल' कहा जाता था।
ब्रिटिश शासन के दौरान मिर्जापुर उत्तर भारत में व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र था। यहाँ बड़ी मात्रा में राजस्व वसूली होती थी।
ये आठ प्रमुख कस्टम हाउस थे :
- विन्ध्याचल
- शाहपुर
- भदोही
- गज भटौली
- नौदोहा
- बिसुन्दरपुर
- हलिया
- लालगंज
इसके आलवा चुनार के मिट्टी के बर्तन, पत्थर तथा चीनी व्यापार का प्रमुख अंग था। अहरौरा में चीनी का उत्पादन, लाख के खिलौने बनाना, सिल्क के कपड़े बुनना तथा सिल्क का धागा बनाना प्रमुख व्यवसाय था । भदोही चीनी, सूत, नील तथा कालीन, चमड़ा, बर्तन, चीनी तथा कालीन व्यवसाय दक्षिण भारत, पंजाब, मुल्तान और नेपाल तक फैला हुआ था ।

व्यापार का था प्रमुख केन्द्र
मीरजापुर व्यापार का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। व्यापारियों के अतिरिक्त बंजारे भी व्यापार करते थे। बंजारों के दूर-दूर तक आने-जाने के कारण इस नगर के व्यापारी बंगाल, दक्षिण, कश्मीर तथा तिब्बत तक व्यापार करने लगे थे। यहाँ के व्यापारियों का सर्वाधिक व्यापार बंगाल, बिहार और आगरा के व्यापारियों के साथ होता था।
इतिहास के पन्नों में कैसे आये मिर्जापुर के गोपीगंज, टिकवा से लेकर हुसैनी सराय
यात्रियों तथा व्यापारियों के मार्ग में ठहरने तथा उनके माल असबाब की सुरक्षा के लिए मुगल काल में ही जनपद के विभिन्न मार्गों पर सरायों का निर्माण कराया गया था। ब्रिटिश काल में भी कुछ और सरांय निर्मित कराई गई थीं। क्षेत्रीय अभिलेखागार, इलाहाबाद में सुरक्षित 'बनारस डिवीजन' के सराय रजिस्टर से पता चलता है कि अठारहवीं एवं उन्नीसवीं सदी तक लगभग 20 सरांय (सराय) उपयोग में बनी रहीं।
ये सरायें थीं -
1. गोपीगंज सरांय
2. भैरोसिंह सरांय
3. सलरूस सरांय
4. शथरूही सरांय
5. रहिमानी सरांय
6. बचुना सरांय
7. टिकवा सरांय
8. अवध नरायन राजा की सरांय
9. जंगीगंज सरांय
10. माधोसिंह सरांय
11. महाराजगंज सरांय
12. कछवां सरांय
13. शीतल चौधरी सरांय
14. लालगंज सरांय
15. नारघाट सरांय
16. बाई साव की सरांय
17. चेतसिंह सरांय
18. गनेशगंज सरांय
19. कटरा बाजीराव सरांय
20. हुसैनी सरांय
तब और अब
सन् 1814 ई० में जनपद मीरजापुर की कुल जनसंख्या लगभग 90,000 थी, जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार अब यहां 24 लाख 96 हजार से अधिक लोग रहते हैं।
मिर्जापुर की वजह से पड़ा बनारस के दशाश्वमेध घाट का नाम
चलते-चलते एक बात और बताना चाहेंगे कि मिर्जापुर के प्रथम भर राजा वीरसेन था जिसने भारशिव की उपाधि धारण कर रखी थी। मालवा वनारान एवं मगध जीतने के पश्चात उसने अपनी राजधानी कंतित (कान्तिपुरम् ) मीरजापुर को बना रखी थी। इसी जीत के उपलक्ष्य में भर राजा वीरसेन ने दश घोड़ों का बनारस में यज्ञ कराया था। इसी आधार पर बनारस के उस घाट का नाम दशाश्वमेध घाट पड़ा।



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