इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में स्थित ओम् पर्वत पर 'ऊँ' की आकृति नजर नहीं आ रही है। दिखाई दे रहा है तो बस काला पहाड़। पर्वत की बिना बर्फ वाली काले पत्थरों के पहाड़ की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर खूब शेयर की जा रही हैं। पर्यटक जहां इसे देखकर हैरत में हैं वहीं मौसम विशेषज्ञ इसे गंभीर समस्या बता रहे हैं।
अधिकारियों का कहना है कि अगर लंबे समय तक पर्वत पर बर्फ दिखाई नहीं दिया तो इसका असर पर्यटन उद्योग पर भी पड़ेगा। पर सभी के मन में एक सवाल जो बार-बार आ रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों ओम् पर्वत से बर्फ ही गायब हो गयी?
बर्फ से बनी आकृति से ही मिला था नाम
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में व्यास घाटी में मौजूद ओम् पर्वत एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। लगभग 14,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित ओम् पर्वत की लोकप्रियता उस समय और भी बढ़ गयी थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस स्थान का दौरा किया था और अपनी तस्वीरें भी साझा की थी।
पर्वत की चोटी पर प्राकृतिक रूप से बर्फबारी होती है तो वह ओम् की आकृति बनाती है, जो दूर से देखने पर स्पष्ट नजर आती है। इस वजह से ही इस पर्वत को ओम् पर्वत का नाम मिला था। यूं तो साल भर यह पर्वत बर्फ से ढका रहता है लेकिन इस बार अचानक यहां से बर्फ गायब होने की जानकारी मिली है।
क्या कहना है अधिकारियों का?
आदि कैलाश यात्रा के बेसकैंप धारचुला के इनचार्ज धन सिंह बिष्ट ने NDTV से बात करते हुए कहा कि कुमाऊं मंडल विकास निगम में काम करने के मेरे पिछले 22 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है जब मैंने ओम् पर्वत को पूरी तरह से बर्फहीन देखा है। उन्होंने बताया कि आमतौर पर हर यहां वार्षिक तौर पर 95-99 प्रतिशत बर्फ पिघल जाती थी, लेकिन इस साल शत-प्रतिशत बर्फ पिघल गयी है।
16 अगस्त को यहां घूमने आए एक पर्यटक ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि ओम् पर्वत पर पूरी तरह से बर्फ को पिघला हुआ देखकर मैं काफी निराश हुआ। वहीं पास में मौजूद गुंजी गांव की निवासी उर्मिला सांवल ने बताया कि बिना बर्फ के ओम् पर्वत पर बनने वाले 'ऊँ' के निशान को बहुत ही मुश्किल से पहचाना जा पा रहा है।
क्यों हुआ ऐसा?
मीडिया से बात करते हुए जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, अल्मोड़ा के निदेशक सुनील नौटियाल ने कहा कि ओम् पर्वत से बर्फ के गायब होने के लिए ग्लोबल वार्मिंग के अलावा ईंधन चालित गाड़ियों की बढ़ती संख्या के कारण हिमालयी क्षेत्र के संवेदनशील क्षेत्रों में बढ़ते तापमान जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि इसे रोकने के लिए हमें उच्च हिमालयी क्षेत्र के सभी संवेदनशील स्थानों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर होने वाली दावानल की वहन क्षमता का भी पता लगाना होगा, क्योंकि दावानल से उत्पन्न कार्बन भी हिमालयी क्षेत्र के संवेदनशील स्थानों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
इसके साथ ही मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले साल अक्तूबर में प्रधानमंत्री के दौरे के बाद से यहां बड़ी संख्या में आने वाले पर्यटकों की संख्या को भी जिम्मेदार ठहराया गया है। बताया जाता है कि पीएम मोदी के आदि कैलाश पर्वत शिखर दर्शन के लिए जोलिंगकोंग दौरे के बाद यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगभग 10 गुना वृद्धि हुई है।
लौटी 'ऊँ' की आकृति पर चिंता बढ़ी
हालांकि धन सिंह बिष्ट ने बताया कि पिछले सोमवार की रात को हुई बर्फबारी के बाद ओम् पर्वत पर फिर से बर्फ नजर आ रहा है। इसके साथ ही 'ऊँ' की आकृति एक बार फिर से स्पष्ट हो गयी है। लेकिन स्थानीय पर्यावरणिदों का मानना है कि ओम् पर्वत से बर्फ का पिघल जाना गंभीर घटना है। यह भविष्य की चेतावनी है। पर्यवरणविदों का मानना है कि वैज्ञानिकों को इसके लिए विस्तृत शोध करनी चाहिए ताकि भविष्य में हिमालय की बर्फ को पिघलने से बचाया जा सकें।
बता दें, स्थानीय लोग और पर्यावरणविदों का मानना है कि अत्यधिक पर्यटकों की संख्या की वजह से यहां का जलवायु बदल रहा है। पिथौरागढ़ में लंबे समय से निर्माण कार्य भी चल रहा है। इसका विपरित असर हिमालयी क्षेत्रों पर पड़ने का दावा किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्ष 2019 में सड़क का निर्माण के बाद से हर दिन लगभग 100 गाड़ियां ओम् पर्वत तक जा रही हैं। इस वजह से कार्बन बढ़ रहा है जिससे संवेदनशील पहाड़ बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं।
इसके साथ ही कुमाऊं मंडल विकास निगम द्वारा शुरू की गयी हेलीकॉप्टर दर्शन सेवा को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जा रहा है, जिससे हिमालय क्षेत्र में प्रदूषण बढ़ रहा है। स्थानीय लोगों ने इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया था। स्थानीय लोगों की मांग थी कि हेलिकॉप्टर को अगर आदि कैलाश और ओम् पर्वत कर न ले जाया जाए और ओम् पर्वत से 16 किमी पहले गूंजी में रोक दिया जाए तो इससे पर्यावरण भी बचता और स्थानीय लोगों को भी रोजगार के मौके मिलते।



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