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पहली बार बाबा विश्वनाथ सजेंगे बंगाल के खास 'टोपोर' में, बदला 400 साल पुराना इतिहास

इस साल रंगभरी एकादशी में बदलने वाला है बनारस का पिछले 400 सालों का इतिहास। जी हां, पिछले 400 सालों में पहली बार माता गौरा का गौना के समय बाबा विश्वनाथ को कई तरह के मुकुट धारण करवाए जाते हैं। हर बार उनके मुकुट को देखकर उनके भक्त निहाल हो जाते हैं। लेकिन इस बार बाबा विश्वनाथ नए अवतार में नजर आएंगे।

इस साल पहली बार रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ को पहनाया जाएगा देवकिरिट (जिसे बंगाल में टोपोर कहा जाता है)। इसे खासतौर पर बाबा विश्वनाथ के लिए बंगाल के कारीगरों द्वारा तैयार किया गया है।

Rangbhari ekadashi varanasi

क्या होता है देवकिरिट या टोपोर

देवकिरिट या टोपोर-मुकुट एक खास प्रकार का मुकुट होता है, जिसे केले के पेड़ के रेशों और शील की लकड़ी से बनाया जाता है। टोपोर-मुकुट बंगाली शादियों की पहचान होता है। इसे बेहद शुभ माना जाता है। शादी के वक्त हर दुल्हे-दुल्हन को इसे पहनना पड़ता है। टोपोर दुल्हों और मुकूट दुल्हनों को पहनाने का रिवाज होता है। शादी के अलावा बंगाली ब्राह्मण परिवार में जब भी किसी बच्चे का जनेऊ संस्कार होता है, उसे टोपोर पहनाया जाता है।

mahant of maa annapurna temple

नए अवतार में नजर आएंगे बाबा विश्वनाथ

शिवरात्रि को विवाह के बाद रंगभरी एकादशी के दिन माता गौरा का गौना करवाते समय बाबा विश्वनाथ को इस साल खास देवकिरिट धारण करवाया जाएगा। ऐसा पिछले 400 साल में पहले बार होने वाला है। बनारस के अन्नपूर्णा मंदिर के महंत शंकर पुरी ने इसे खासतौर पर बनवाया है, जिसे काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत को सौंप दिया गया है।

मिली जानकारी के अनुसार हर साल बाबा विश्वनाथ रंगभरी एकादशी के दिन शाही पगड़ी पहनते हैं, जिसे काशी के मुस्लिम कारिगरों द्वारा तैयार किया जाता है। लेकिन इस साल वह देवकिरिट धारण करेंगे। वहीं संभावना है कि गौना के समय माता गौरा को मुकुट पहनाया जाएगा।


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अनोखी होती है शाही सवारी

रंगभरी एकादशी के दिन से ही काशी में होली के उत्सव की शुरुआत हो जाती है। मान्यता है कि माता गौरा का गौना करवाकर काशी लाकर बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों के साथ रंग-गुलाल की होली खेलते हैं। इस दिन बाबा विश्वनाथ की बड़ी अनोखी सवारी निकाली जाती है। चांदी के राज सिंहासन पर बाबा विश्वनाथ माता गौरा का गौना करवाने निकलते हैं।

यह सवारी विश्वनाथ मंदिर के महंत के आवास से काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर तक निकाली जाती है। उस समय पूरे रास्ते में भक्त बाबा विश्वनाथ और माता गौरा का न सिर्फ दर्शन करते हैं, बल्कि उन पर अबीर-गुलाल भी खूब उड़ाते हैं। इस साल बाबा विश्वनाथ-माता गौरा बंगाल के कारिगरों द्वारा तैयार किया गया खास देवकिरिट (टोपोर-मुकुट) धारण करेंगे।

Savari of baba vishwanath kashi

बता दें, इस साल रंगभरी एकादशी 20 मार्च को है, जिस दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा का गौना करवाते हैं। इस दिन से काशी में होली की शुरुआत मानी जाती है। इसके अगले दिन यानी 21 मार्च को काशी की लोकप्रिय मसान होली खेली जाएगी।

मान्यतानुसार रंगभरी एकादशी के दिन महादेव के जो गण भूत-पिशाच बाबा विश्वनाथ के साथ होली नहीं खेल पाए थे, उनके साथ काशी के मणिकर्णिका घाट पर बाबा चिता भस्म की होली खेलने आते हैं। यह काशी में खेली जाने वाली एक बेहद लोकप्रिय होली होती है, जिसे देखने और जिसमें शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक इस समय वाराणसी पहुंचने लगे हैं।

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