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अरुणाचल प्रदेश में ट्रेकर्स को मिली द्वितीय विश्व युद्ध में इस्तेमाल हुई गुफा

हाल ही में अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार की सीमा के पास पर्वतारोहियों के एक समूह ने बेहद खास खोज की है। पर्वतारोहियों के इस समूह का नेतृत्व तैगित सोरांग कर रहे थे और समूह में कुल 27 पर्वतारोही थे। तिराप जिले में पहाड़ियों पर चढ़ते हुए यह समूह 2,119 मीटर की ऊंचाई पर 'लोंगपोंगका' बिंदु पर ठिठक कर रुक जाता है। यहां उन्हें एक गुफा दिखायी देती है।

arunachal pradesh cave

यह गुफा कोई आम गुफा नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक गुफा है जिसका इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किया जाता था। पर्वतारोहियों के समूह ने गुफा के फोटोग्राफिक सबूत और विवरण इकट्ठा किये हैं।

पर्वतारोहियों का यह समुह नशीले पदार्थों के खिलाफ एक मिशन पर निकला था, जब इन्हें सीमांत जिले में पहाड़ियों की चढ़ाई के समय यह गुफा मिली। यह गुफा काफी पुरानी थी। जांच पड़ताल के समय स्थानीय निवासियों ने गुफा के पास गोलाकार प्रतिक चिन्हों, अंग्रेजी में लिखे कुछ शब्दों और पत्थरों पर उकेरी गयी कुछ नंबरों की ओर संकेत किया। जांच के समय पता चला कि इस गुफा का इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध के समय मित्र देश की सेनाओं के लिए एक ट्रांजिट शिविर के रूप किया जाता है। यह युद्ध के समय रणनीतिक रूप से जापानी सेवा को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बनायी गयी थी।

cave used in 2nd world war

स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार मित्र देश की सेनाएं जापानी सैनिकों को रोकने और उनके खिलाफ रणनीति बनाने के लिए बर्मा (अब म्यांमार) से सटे इस विशाल क्षेत्र का इस्तेमाल करती थी। यह जगह वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश का हिस्सा है। युद्ध के बाद इस जगह को छोड़ दिया गया और यह अब तक बाहरी दुनिया से छिपी रही।

इस ट्रेकिंग समूह के सदस्य और थिंसा गांव के निवासी खुनवांग खुसिया का कहना है कि पहाड़ी की चोटी जिसे स्थानीय भाषा में 'सिलोम्बू' कहा जाता है, का इस्तेमाल मित्र देश की सेनाएं अपने राशन का स्टॉक और असम से भेजे गये उपकरणों को रखने के लिए करती थी।

second world war cave discovered in arunachal pradesh

हालांकि काफी कोशिशों के बावजूद पर्वतारोही गुफा के अंत तक पहुंचने में सफल नहीं हो पाएं, क्योंकि गुफा का द्वार ही काफी संकरा और छोटा है। रिपोर्ट्स की मानें तो पड़ोसी गांव के वो जासूस जो हथियारों को यहां से वहां पहुंचाने का काम करते थे, वे भी इस जगह से पहले गुजर चुके हैं। पर्वतारोहियों को यह गुफा थिंसा गांव से ट्रेकिंग शुरू करने के करीब 3 घंटे बाद यानी लगभग 7 किमी का सफर तय करने के बाद मिली।

बता दें, इससे पहले भी अरुणाचल प्रदेश के इन पहाड़ी और जंगली इलाकों में द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुए कई विमान दुर्घटनाओं के मलबे मिल चुके हैं। इन मलबों में इंसानों की हड्डियां, ब्रेसलेट, घड़ी आदि सामान भी बरामद हुए थे।

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