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महा शक्तिशाली बाबा गोरखनाथ की महिमा!

'नाथ परंपरा' का हिंदुओं में बहुत सारे लोग पालन करते हैं। देश के कई सारे मंदिरों में, उड़ीसा के गाँव जगतसिंघपुर में बाबा गोरखनाथ के मंदिर की एक अलग ही महत्ता है। जगतसिंघपुर गाँव उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से लगभग 65 किलोमीटर की दूरी पर है।

बाबा गोरखनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ के अनुयायी थे जिन्होंने नाथ परंपरा की खोज की थी। बाबा गोरखनाथ ने ही इस परंपरा को प्रसिद्ध किया। उनके उपदेश का मुख्य सिद्धांत था,'सारी मानव जाती को शिक्षा के प्रति ही कार्य करना चाहिए'।

Baba Gorakhnath Temple

बाबा गोरखनाथ की प्रतिमा
Image Courtesy:
Anandanath

बाबा गोरखनाथ दर्शनशास्त्र के कट्टर अनुयायी थे और एक बहुत ही शक्तिशाली योगी भी। बाबा गोरखनाथ योगशिक्षा में भी काफ़ी माहिर थे। आज इनके शिष्यों को गोरखनाथी या योगियों के नाम से जाना जाता है। उत्तरप्रदेश का गोरखपुर क्षेत्र नाथ परंपरा का मुख्य केंद्र है।

नाथ परंपरा को आप उड़ीसा, असम और नेपाल में भी पाएँगे। दिलचस्प बात यह है कि मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ की, तिबत्तन बौद्धिक धर्म में भी एक अलग और खास महत्ता है। उन्हें आध्यात्मिक उपलब्धि के महान स्वामियों के तौर पर देखा जाता है।

Baba Gorakhnath Temple

बाबा गोरखनाथ मंदिर
Image Courtesy: Kamalakanta777

जगतसिंघपुर के बाबा गोरखनाथ के इस मंदिर को इस क्षेत्र का सबसे शक्तिशाली मंदिर माना जाता है। ऐसा कहा जाता है की बाबा गोरखनाथ यहाँ पर ध्यान लगा अब भी विराजमान हैं।

गोरखनाथ मंदिर से जुड़ी कथा
कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि बाबा गोरखनाथ का ध्यान तब भी भंग नहीं हुआ था जब चीटीयों की पूरी सेना ही उनपर सवार हो गयी थी। अंततः उनके इस ध्यान ने उन्हें महान शक्तियाँ प्राप्त करने में मदद की। इसलिए इस मंदिर को सबसे शक्तिशाली मंदिर माना जाता है। माना जाता है कि जो भी भक्त यहाँ बाबा नाथ की सच्चे मन से श्रद्धा भक्ति करता है, बाबा गोरखनाथ उसकी हर इच्छा पूरी करते हैं। यह भी कहा जाता है कि वे मंदिर के समीप ही बरगद के बड़े से पेड़ के नीचे ध्यानमग्न हुए थे। अब उस बरगद के पेड़ पर लोग चढ़ावे के रूप में पवित्र धागा बाँधते हैं।

Baba Gorakhnath Temple

बरगद के पेड़ में बँधे पवित्र धागे
Image Courtesy: Kamalakanta777

बाबा गोरखनाथ के मंदिर पहुँचें कैसे?

यह मंदिर जगतसिंघपुर के जैपुर चौक से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ रघुपुर के कटक-प्रदीप मार्ग से भी पहुँचा जा सकता है। भक्तगण जो यहाँ आते हैं उन्हें बंदरों से सावधान रहना चाहिए जो पूरे दिन मंदिर परिसर में यहाँ से वहाँ छलाँग लगाते फिरते हैं। हालाँकि वे लोगों को कोई नुकसान नहीं पहुँचते, बस उनके खाने-पीने के सामानों को छीनते हैं।

Sarla Devi Temple

सरला देवी मंदिर
Image Courtesy: Sujit Kumar

आप जब भी इस मंदिर की यात्रा करें, इसके पास ही स्थित सरला देवी मंदिर के भी दर्शन ज़रूर करें। सरला देवी, माँ दुर्गा और माँ सरस्वती का मिला जुला रूप है। माँ सरला देवी शैव, वैष्णव और तांत्रिक विचारधारा वाले परंपरा की प्रसिद्ध प्रतिमा हैं।

अपने महत्वपूर्ण सुझाव व अनुभव नीचे व्यक्त करें।

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