भारत में ट्राम कहां चलती है? सवाल थोड़ा बचकाना है न...कोई भी बड़ी आसानी से बता देगा इसका जवाब। अरे भई, भारत में ट्राम सिर्फ कोलकाता में चलती है। लेकिन क्या भारत में सिर्फ कोलकाता में ही ट्राम चलती थी? सोच में पड़ गये न...जवाब है नहीं। ट्राम कोलकाता के अलावा कई और शहरों में भी चला करती थी जिसमें बिहार की राजधानी पटना भी शामिल है।
जी हां, किसी जमाने में पटना की सड़कों पर भी सरपट दौड़ा करती थी ट्राम। लेकिन वह ट्राम आज की आधुनिक ट्राम से कहीं अलग थी। कैसी हुआ करती थी गुजरे जमाने में पटना में चलने वाली ट्राम? अचानक क्यों पटना में बंद कर देना पड़ा था यातायात के इस मजेदार से साधन को?

भारत के किन शहरों में चलती थी ट्राम
इतिहासकारों की मानें तो भारत में ट्राम की शुरुआत 19वीं सदी के अंत में हुई थी। पटना के अलावा देश के कई प्रमुख शहरों में भी ट्राम चला करती थी। ये ट्राम सड़कों पर पटरियां बिछाकर उनपर ही चलती थी। जिन शहरों में ट्राम की शुरुआत हुई थी उनमें कोलकाता (तत्कालिन कलकत्ता, 1873), मुंबई (1874), नासिक (1889), चेन्नई (तत्कालिन मद्रास, 1895), कानपुर और दिल्ली थी। वर्ष 1933 से 1964 वह दौर था, जिसमें कोलकाता के अलावा देश के बाकी सभी शहरों में धीरे-धीरे ट्राम का संचालन बंद कर दिया गया।

कैसी होती थी तब ट्राम
आज देश के एकमात्र शहर कोलकाता में ट्राम चलती है, जिसे यहां धरोहर के रूप में चलाया जाता है। कोलकाता में आज अत्याधुनिक एसी कोच वाली इलेक्ट्रिक ट्राम चलायी जाती है। लेकिन जिस समय ट्राम की शुरुआत हुई थी, तब यह ऐसी नहीं थी। पहले ट्राम को खींचने का काम घोड़ा किया करते थे, लेकिन यह घोड़ा गाड़ी वाली बग्घी नहीं बल्कि पटरी पर दौड़ने वाली ट्राम होती थी। पटना में भी सड़कों पर बिछी पटरियों पर ट्राम को खींचने का काम घोड़ा ही किया करते थे।
पटना में चलने वाली ट्राम

जिस समय देश में अंग्रेजी शासन कायम था, उस जमाने में कोलकाता की तरह पटना की सड़कों पर ट्राम चला करती थी। इतिहासकारों के अनुसार वर्ष 1886-87 के दौरान एक यूरोपीय कंपनी ने पटना में ट्राम सेवा शुरू की थी। यह ट्राम घोड़ा ही खींचते थे। उस समय ट्राम पटना सिटी से बांकीपुर तक यानी वर्तमान पटना सिटी से गांधी मैदान तक चला करती थी।
अशोक राजपथ होकर यह ट्राम आधे घंटे में इन दोनों (पटना सिटी-गांधी मैदान) जगहों के बीच की दूरी को तय करती थी। बताया जाता है कि व्यापार के सिलसिले में पटना आने वाले व्यापारियों के घूमने और परिवहन के साधन के तौर पर ट्राम का इस्तेमाल किया जाता था। कंपनी की योजना ट्राम लाइन का विस्तार गंगा और सोन नदी के किनारे दानापुर तक करने की थी जिससे इन इलाकों के भी लोग ट्राम का इस्तेमाल कर सकें।
क्यों बंद हो गयी ट्राम
ऐसे में सवाल उठता है कि पटना में जब ट्राम के विस्तार की योजना यूरोपीय कंपनी बना रही थी, तो फिर अचानक इसे बंद क्यों करना पड़ा? इसे लेकर इतिहासकारों के दो तरह के विचार सामने आते हैं। एक विचार यह कहता है कि उस समय घोड़ा द्वारा खींची जाने वाली गाड़ियों जिसे तांगा या टमटम कहा जाता है, को लोग अधिक पसंद करने लगे थे। इसलिए ट्राम की आमदनी घटने लगी थी।

वहीं दूसरा विचार यह कहता है कि उन दिनों कोलकाता (कलकत्ता) में बिजली से चलने वाली ट्राम को विस्तार और प्रोत्साहन मिल रहा था। इसका बुरा असर पटना की ट्राम पर पड़ने लगा और आखिरकार घोड़ाचालित ट्राम को बंद करने का फैसला लिया गया। साल 1903 में पटना में ट्राम को पूरी तरह से बंद कर दिया गया। प्रशासनिक अर्काइव के एक दस्तावेज के मुताबिक साल 1898-99 के दौरान पटनासिटी ट्रामवे से आय 31,639 रुपए हुआ था जबकि उस पर खर्च 27,242 रुपए करना पड़ा था। इससे साबित होता है पटना में ट्राम से मामूली फायदा ही हो रहा था। इस दौरान 3 दुर्घटनाएं भी घटी थी।
बिहार के पहले साप्ताहिक समाचार पत्र 'बिहार बंधु' की 1 नवंबर 1903 के अंक में लिखा गया था, "पटना से ट्रामवे तो उठ गया है पर उसकी लाइन अभी तक बिछी है। सुनने में आया है कि अब यह उखाड़ की जाएगी। उसका उखड़ जाना ही ठीक है, क्योंकि इक्का गाड़ियां में अक्सर ठोकर लगकर लोगों को चोट लगती है। लोहा उखड़ जाने से सड़क भी साफ निकल आएगी।"
और कुछ यूं थम गया पटना में ट्राम का 16 सालों का सफर।



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