आप भगवान श्री कृष्ण को कई नामों से जानते हैं, नन्द के लाल,गोपियों के कन्हैया, मुरली मुरारी आदि। हिन्दू धर्म में उनकी भक्तों की भी संख्या खूब है। खास कर कि मथुरा और द्वारका उन्हीं के नाम से जाना जाने वाला स्थान है जहाँ आप भगवान श्रीकृष्ण के कई मंदिर एक साथ देखेंगे। यहाँ के निवासियों के लिए भगवान श्रीकृष्ण जी उनके सबसे प्रमुख देवता हैं। इसी तरह उत्तराखंड राज्य में भी एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण जी को एक अद्वितीय रूप में पूजा जाता है, डांडा नागराजा के रूप में।
उत्तराखंड राज्य के पौड़ी जिले में स्थित डांडा नागराजा मंदिर अपनी अद्वितीय कथाओं और मान्यताओं के लिए भक्तगणों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी प्रसिद्द है। बनेलस्युहं पट्टी में स्थित यह मंदिर पौड़ी से लगभग 37 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण जी के इस अद्वितीय अवतार नागराजा की बहुत मान्यता है। पूरे पौड़ी जिले और गढ़वाल क्षेत्र में कृष्ण जी का यह मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है।

डांडा नागराजा मंदिर
Image Courtesy: Harvinder Singh
पौड़ी शहर से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर अदवानी-बगानीखाल मार्ग पर यह मंदिर पड़ता है। गढ़वाल क्षेत्र में भगवान कृष्ण जी के अवतारों में से एक नागराजा, देवशक्ति की सबसे ज़्यादा मान्यता है। वैसे तो देव नागराजा का मुख्य धाम उत्तरकाशी के सेममुखेम में है पर कहा जाता है कि सेममुखेम और यह मंदिर दोनों एक समान ही हैं।
मंदिर के नाम की उत्पत्ति
पौराणिक कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण को यह जगह खूब भा गई थी, जिससे उन्होंने यहाँ नाग का रूप धारण करके लेट-लेट कर यहाँ की परिक्रमा की ,तभी से मंदिर का नाम डांडा नागराजा पड़ गया। नाग और साँपों को महाभारत में महर्षि कश्यप और दक्ष प्रजाति पूरी कद्रू का संतान बताया गया था। मध्य हिमालय में नागराजा, लौकिक देवता के रूप में पुराकाल से ही परिचित हैं।

पहाड़ की ऊंचाई पर स्थित डांडा नागराजा मंदिर
Image Courtesy: Harvinder Singh
काफल, बांज और बुरांस के घने पेड़ों से घिरा यह मंदिर पौड़ी जिले के प्रमुख आकर्षणों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ी की ऊँचाई पर स्थित है, जहाँ से माँ चन्द्रबदनी(टिहरी), भैरवगढ़ी(कीर्तिखाल), महाबगढ़(यमकेश्वर),कंडोलिया(पूरी) की पहाड़ियों का सुन्दर दृश्य साफ़ नज़र आता है। यहाँ के मूल निवासियों का कहना है कि, मंदिर की स्थापना लगभग 140 साल पहले हुई थी।
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
डांडा नागराजा, कोट विकास क्षेत्र के चार गाँव- नौड,रीई, सिल्सू एव लसेरा का प्रसिद्द धाम है जिसका इतिहास 140 साल पुराना है। यहाँ की मान्यता के अनुसार 140 साल पहले लसेरा में गुमाल जाति के पास एक दुधारू गाय थी जो डांडा में स्थित एक पत्थर को हर रोज़ अपने दूध से निलहाती थी जिसकी वजह से घर के लोगों को उसका दूध नहीं मिल पाता था इसलिए गुस्से में आकर गाय के मालिक ने गाय के ऊपर कुल्हाड़ी से वार किया। जिसका वार गाय को कुछ नहीं कर पाया और सीधा जाकर उस पत्थर पर लगा, जिसकी वजह से वह पत्थर दो भागों में टूट गया और इसका एक भाग आज भी डांडा नागराजा में मौजूद है। इस क्रूर घटना के बाद गुमाल जाती पूरी तरह से समाप्त हो गई।

मंदिर के गर्भगृह की छत पर नाग देवता का बना हुआ छत्र
मंदिर में लगने वाला मेला
यहाँ हर साल अप्रैल के महीने में बैशाखी के अगले दिन 13 और 14 तारीख को भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। मंदिर की भव्यता इस मेले के दौरान देखने लायक होती है। इस भव्यता के दर्शन करने दूर-दूर से हज़ारों की संख्या में भक्तों का हुजूम उमड़ता है। इस मेले के दौरान हर साल मंदिर के पुजारी बदलते हैं। लोग नागराजा देवता को ध्वज और घंटी अर्पित करते हैं। महिलाएं शोभायात्रा निकाल इस मंदिर में पहुँचती हैं।
यहाँ लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर घंटी बांधते हैं। आज आप यहाँ हज़ारों की संख्या में घंटियों को बंधे हुए पाएंगे जो मंदिर की खूबसूरती के महत्वपूर्ण आकर्षण हैं। यह अद्भुत मंदिर विदेशी पर्यटकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। हर साल यहाँ विदेशी पर्यटक मंदिर की अद्भुत्ता और महत्ता को जानने आते हैं और मंदिर की परंपरा के अनुसार घंटी पर अपना नाम लिखकर मंदिर के परिसर में बांधते हैं। मंदिर में पूजा करने के बाद पेड़ों की ठंडी छांव में बैठना एक अद्भुत अनुभव का एहसास कराता है।

मंदिर का गर्भगृह
डांडा नागराजा पहुँचें कैसे?
सड़क यात्रा द्वारा: डांडा नागराजा पौड़ी से लगभग 34 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और देवप्रयाग से लगभग 49 किलोमीटर की दूरी पर। पौड़ी से आप कोई भी निजी टैक्सी बुक करके या बस द्वारा यहाँ पहुँच सकते हैं। पर देवप्रयाग से आपको यहाँ तक पहुँचने के लिए निजी टैक्सी ही बुक करनी होगी क्योंकि यहाँ से डांडा नागराजा तक के लिए बस सुविधा उपलब्ध नहीं है।
रेल यात्रा द्वारा: यहाँ का नज़दीकी रेलवे स्टेशन कोटद्वारा है जो यहाँ से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
हवाई यात्रा द्वारा: यहाँ का नज़दीक हवाई अड्डा जॉली ग्रांट हवाई अड्डा है जो यहाँ से लगभग 131 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

डांडा नागराजा मंदिर
मंदिर के दर्शन का सही समय:
वैसे तो आप यहाँ साल भर नागराजा देवता के दर्शन करने को आ सकते हैं पर मार्च से जून के महीनों में यहाँ का नज़ारा बुरांश के फूलों के सौन्दर्य से भर जाता है। आप यहाँ ठण्डी-ठण्डी मन्द हवा के साथ बांज बुरांश के छायादार वृक्षों का प्राकृतिक आनन्द लेते हुए आराम से मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
पौड़ी के अन्य आकर्षक स्थल
आप अपनी डांडा नागराजा की इस धार्मिक यात्रा के बाद पौड़ी के अन्य दर्शनीय स्थलों की भी सैर कर सकते हैं। यहाँ के अन्य आकर्षक केंद्र हैं, चौखम्बा पर्वत, कंडोलिया मंदिर, खिरसू, तारा कुंड और क्यूंकलेश्वर महादेव मंदिर।
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चौखम्बा पर्वत
Image Courtesy: Sumita Roy Dutta
तो क्यों न अगली यात्रा की योजना कृष्ण भगवान जी के इस अद्वितीय अवतार के दर्शन के लिए बनाई जाये। डांडा नागराजा के अद्भुत दर्शन कर पौड़ी गढ़वाल की मनोरम खूबसूरती को निहारिये और यहाँ के लोकगीतों में झूमना मत भूलियेगा।
"आपकी डांडा नागराजा की यात्रा मंगलमय हो!"
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