वाराणसी के बारे में अक्सर जन्म और मृत्यु और मोक्ष से जुड़ी बातें ही कही जाती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं, वाराणसी में सिर्फ किसी के जन्म या मोक्ष का ही नहीं बल्कि त्योहारों के खत्म होने का जश्न भी बड़ी ही धुमधाम से मनाया जाता है। जी हां, कार्तिक महीने के सबसे आखिरी दिन, जब सूरज ढलते ही गंगा के सभी घाटों पर एक साथ जगमगा उठते हैं लाखों दीपक।

कार्तिक के महीने में त्योहारों की लड़ी लगी रहती है। धनतेरस से त्योहारों का सिलसिला शुरू होता है, जिसमें दिवाली, भाई दूज, छठ पूजा और आखिर में कार्तिक पूर्णिमा। कार्तिक पूर्णिमा के बाद हिंदू कैलेंडर अनुसार त्योहारों का मौसम खत्म होने लगता है। इसी दिन वाराणसी में देव दीपावली मनायी जाती है। इस साल देव दीपावली 27 नवंबर को मनायी जाएगी। लेकिन देव दीपावली का क्या इतिहास है? कब से यह त्योहार वाराणसी की पहचान का अभिन्न हिस्सा बन गया है?
रिकॉर्ड दीयों से बनारस होगा रोशन
इस साल 27 को बनारस में देव दीपावली मनायी जाएगी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन स्वर्ग से देवता धरती पर दीपावली मनाने के लिए उतरते हैं। इस दिन बनारस के गंगा के सभी 84 घाटों के अलावा हर एक तालाब, कुंड और कुएं के किनारों को भी मिट्टी के दीयों से जगमगा दिया जाता है। इस साल देव दीपावली के मौके पर 13.5 लाख दीये जलाए जाएंगे, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड ही होगा।

सबसे पहले किस घाट पर मनायी गयी देव दिवाली?
वाराणसी में आज गंगा के सभी 84 घाटों पर देव दिवाली के मौके पर दीये जलाएं जाते हैं। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। सबसे पहले देव दीपावली का आयोजन बनारस के सिर्फ एक घाट पर किया गया। समय के साथ धीरे-धीरे देव दिवाली की लोकप्रियता बढ़ती गयी और उसके साथ यह हर साल पहले की तुलना में अधिक भव्य तरीके से मनाया जाने लगा।
आज देव दिवाली की लोकप्रियता काशी की गलियों से बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच चुकी है। क्या आप बता सकते हैं, काशी के किस घाट पर सबसे पहले देव दिवाली मनायी गयी थी? चलिए हम आपको एक Hint भी बता देते हैं। देव दिवाली सबसे पहले उस घाट पर मनायी गयी थी, जहां एक से अधिक नदियों का संगम होता है।
अहिल्याबाई होल्कर ने की थी शुरुआत
स्थानीय लोगों की मानें तो बनारस में देव दिपावली की शुरुआत करने का श्रेय अहिल्याबाई होल्कर को जाता है। कहा जाता है कि जब 17वीं शताब्दी में काशी में भगवान विश्वेश्वर शिवलिंग की स्थापना हुई थी, उसके बाद अहिल्याबाई होल्कर ने पंचगंगा घाट पर स्नान करने के बाद यहां 1000 स्तंभ दीपक बनवाया था। इसमें एक बार में 1000 दीये जलाये जा सकते थे।

वह दीपक स्तंभ आज भी पंचगंगा घाट पर मौजूद है। अब तक तो आप समझ ही गये होंगे कि देव दीपावली की सबसे पहले शुरुआत बनारस के पंचगंगा घाट से हुई थी। पंचगंगा घाट पर 5 नदियों का संगम होता है, जिसमें गंगा, यमुना, सरस्वती, किरण और धुतपापा शामिल हैं। कहा जाता है कि यहां सभी नदियां गुप्त रूप से मिलती हैं, इसलिए इसे बहुत पवित्र स्थान माना जाता है।
देव दिवाली पर एक नहीं कई हैं मान्यताएं
- देव दिवाली के दिन भगवान शिव ने काशी में त्रिपुरासुर का संहार किया था, जिसके बाद वो त्रिपुरारी कहलाएं।
- इसी दिन (कार्तिक पूर्णिमा) भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ था।
- भगवान श्रीकृष्ण को इस दिन आत्मबोध हुआ था।
- इसी दिन देवी तुलसी प्रकट हुई थीं, इसलिए तुलसी के पेड़ों के नीचे दीया जलाया जाता है।
- देवउठनी एकादशी के दिन देवता जागृत होते और कार्तिक पूर्णिमा के दिन यमुना में स्नान करते हैं।
- इस दिन गुरुनानक देवजी का जन्म हुआ था।



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