टी.वी. हमारा मनोरंजन करने के साथ साथ हमें आराम भी पहुँचाता है। फिर भी सोचने की बात है की कुछ लोगों को मनोरंजन के लिए जानवरों की लड़ाई करवाना क्युं ज़रूरी होता है जब हमारे पास मनोरंजन के और भी आसान तरीके हैं। हो सकता है कि वे अपनी पुरानी परंपराओं को बचा रहे हैं जो समय के साथ ख़त्म होती जा रही हैं, फिर भी प्रश्न यह उठता है की क्या अपने मनोरंजन के लिए जानवरों को नुकसान पहुँचाना ज़रूरी है। लोग अपने हर ज़रूरी काम में जहाँ उन्हें जानवरों की ज़रूरत पड़ती है, उनका इस्तेमाल करते हैं, तो फिर भी अपने मनोरंजन के लिए भी उनका इस्तेमाल करना ज़रूरी है क्या? यह सिर्फ़ भारत का नहीं पूरी दुनिया का ही एक अहम मुद्दा है।
तो चलिए, इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हम आपको भारत के कुछ विवादित जानवरों के खेल के बारे में बताते हैं।

जल्लिकटटू
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जल्लिकटटू:
जल्लिकटटू स्पेन में होने वाले सांड़ों की लड़ाई के समान ही है, सिर्फ़ जल्लिकटटू के खेल में अलग यह है कि इसमें बहुत सारे लोग एक सांड़ को एक ही समय में काबू करने में लगे होते हैं।
जल्लिकटटू में लोगों के साथ साथ सांड़ों को भी ख़तरा होता है। तमिल नाडु के पोंगल पर्व में जल्लिकटटू के खेल की वजह से हर साल आज तक कई लोग मारे भी गये हैं और यह भारत का सबसे विवादित जानवरों का खेल है।

मुर्गालड़ाई
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मुर्गों की लड़ाई:
मुर्गों की लड़ाई या मुर्गालड़ाई भारत का स्वदेशी खेल नहीं है। इसे पूरे दुनिया में ही खेला जाता है। भारत में यह सिर्फ़ एक खेल ही नहीं एक जुआ भी है।
तमिलनाडु के तिरुप्पुर और कोयंबटुर क्षेत्रों में तो इसे और भी क्रूर तरीके से खेला जाता है, जिसमें मुर्गों के पंजों मे कील बाँध कर उन्हे लड़ाया जाता है। मुर्गा लड़ाई पूरे भारत में जानवरों का एक प्रसिद्ध खेल है। झारखंड के टूसू मेले में यह खेल लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र होता है। दक्षिण भारत के आंध्रा प्रदेश राज्य के करेमपुडी गाँव, कर्नाटका के उडुपी गाँव और केरला के कासरगोड़ गाँव में भी इस खेल को खेला जाता है। इस खेल पर बहुत सारे विवाद हुए हैं।
कंबाला
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कंबाला:
कंबाला, हल्के धान उगे हुए खेतों में भैंसों की दौड़ का एक खेल है। यह कर्नाटका के तटीय क्षेत्रों में खेला जाने वाला एक प्रसिद्ध खेल है। इस वार्षिक आयोजन में सामान्यतः खेतों के मालिक एक दूसरे के विरुद्ध प्रतिस्पर्धा में भाग लेते हैं। दुख की बात यह है की इस खेल में भैंसों को जीतने के लिए ज़बरदस्ती तेज़ दौड़ने को उकसाया जाता है। हालाँकि इस 300 साल पुराने खेल को रोकने के लिए जानवर प्रेमियों द्वारा कई आपत्तियाँ जताई गई हैं।

भालू नाच
भालू नृत्य:
अपने आप को 10 या 20 साल पुराने ज़माने में ले जाइए, आपको धुँधला सा कुछ याद आएगा जिसमें कुछ आदमी भालुओं को ला उनसे नृत्य कराते थे। यह आज भी कुछ जगहों में आपको मिल जाएगा जहाँ भालुओं के चिह्न आपको मिलेंगे। अब भालू नाच अस्तित्व में उतना नहीं है और अगर है भी तो बहुत ही दूरस्थ इलाक़ों में।
बंदर नाच:
बंदर का नाच या फिर मदारी का करतब भारत में बहुत ही जाना पहचाना खेल है। एक आदमी जिसे मदारी कहते हैं बंदर को नाचता है और लोगों का मनोरंजन करता है। मदारी का यह पैसे कमाने का एक ज़रिया है। आज के समय में बंदर का नाच आपको कम ही देखने को मिलेगा।

मदारी का करतब
लोमड़ी दर्शन:
लोमड़ी दर्शन, खेल से ज़्यादा एक धार्मिक अनुष्ठान है। पेरियाकृष्णपुरम के गाँव में हर साल पोंगल के त्योहार पर लोमड़ी की एक परंपरा है। गाँववाले एक लोमड़ी ढूँढते हैं, उसे गाँव में लाते हैं और नाचते गाते आशीर्वाद लेते हैं। हालाँकि यह अनुष्ठान कुछ सालों पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया है।
धन्यवाद उन सभी जानवरों के लिए बनाए गये संगठनों का जिनकी वजह से अब इनमें से कुछ खेलों पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया है। हालाँकि, भारत के पारंपरिक खेलों के बारे में जानना मज़ेदार होता है।



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