राजस्थान का चित्तौड़गढ़ किला, जहां आज भी रानी पद्मावती के जौहर की आग धधकती महसूस होती है। अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नजरों से बचने के लिए चित्तौड़ की रानी पद्मावती ने आग में महल की दूसरी महिलाओं समेत कुदकर अपनी जान देते समय बिल्कुल नहीं हिचकिचायी। लेकिन अलाउद्दीन के कारण सिर्फ रानी पद्मावती ही नहीं बल्कि गुजरात के रोहा किले में भी 120 राजकुमारियों ने जौहर करना पड़ा था। हालांकि आज के समय में यह किला पूरी तरह से जीर्ण हो चुका है।
रोहा किला गुजरात में मांडवी से लगभग 47 किमी, भुज जिले से 51 किमी और रन ऑफ कच्छ से लगभग 127 किमी की दूरी पर मौजूद रोहा किला एक ऑफबीच टूरिस्ट डेस्टिनेशन है। इस जगह को खासतौर पर वो लोग काफी पसंद करते हैं जिन्हें इतिहास से विशेष लगाव होता है।

रोहा किला नखत्राना तालुका में मौजूद है। गांव के बाहरी हिस्से में 16 एकड़ के क्षेत्र में बना यह एक छोटा सा किला है, जिसके ऐतिहासिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। इतिहासकारों का मानना है कि वर्ष 1550 में इस किले का निर्माण करवाया गया था। इस किले को कई स्तरों में तैयार किया गया था और बनने में लंबा वक्त लगा था।

शानदार वास्तुकला
इस किले का निर्माण राव खेंगारजी-1 (1510-1585) ने करवाया था और अपने भाई साहेबजी को सौंप दिया था। इस किले के आसपास रोहा गांव बसाया गया था जो रोहा जाहीर का हिस्सा हुआ करता था। इस जागिर के अंतर्गत कुल 52 गांव आते थे। किले की वास्तुकला इतनी शानदार थी कि आज के समय में कोई भी इसे देखता है तो बस देखता ही रह जाता है।
किले में राजा के महल से रानियों के महल तक जाने वाला गलियारा लकड़ी के झरोखे से ढका होता था। यह झरोखा इस तरीके से तैयार होता था कि अंदर से बाहर साफ-साफ दिखाई दे लेकिन बाहर से कोई भी व्यक्ति झरोखे के अंदर नहीं देख पाता था। यह ऐसा समय था जब गुजरात के रोहा जागिर को काफी समृद्ध माना जाता था। ब्रिटिशकाल में भी रोहा जागिर की अपने कानून हुआ करते थे। किले के अंदर भगवान कृष्ण को समर्पित एक मंदिर भी है।
अलाउद्दीन से बचने के लिए भागी राजकुमारियां

इतिहासकारों का कहना है कि उमरकोट शाही परिवार के वंशज ने अपने भाई, जो उस वक्त इस किले के मालिक थे, को उखाड़ फेंकने के लिए अलाउद्दीन खिलजी से मदद मांगी। अलाउद्दीन खिलजी भी उनकी मदद करके उमरकोट शाही परिवार के वंशज को राजा बनाने के लिए सहमत हो गया लेकिन बदले में उसने उमरकोट की राजकुमारी मांग ली। इस वजह से उमरकोट की सभी राजकुमारियां कच्छ के अब्दासा में भाग गईं।
वे बहुत कठिनाई से रोहा पहुँची और अब्दा के संदेश की प्रतीक्षा करने लगी। अब्दा रोहा में किले का प्रभारी था। अब्दा ने तुरंत सभी राजकुमारियों को किले में लाने के लिए अपने विश्वसनीय लोगों को उनके पास भेजा। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि दुर्भाग्य से, थकी हुई राजकुमारियों ने उन्हें अलाउद्दीन खिलजी की सेना समझ लिया और अपनी जान दे दी।
वहीं दूसरी ओर कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि अब्दासा के जागिरदार रोहा में उन 120 राजकुमारियों की मदद के लिए पहुंच भी गये थे और उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध भी किया। लेकिन युद्ध में जागिरदार की मौत हो गयी और इसके बाद ही सभी 120 राजकुमारियों ने रोहा किले में ही जौहर कर अपनी जान दे दी। उनकी पवित्रता और साहस का सम्मान करने के लिए किले में समाधियां बनाई गईं और तब से इस स्थान को सुमारी रोहा कहा जाने लगा।
500 साल पुराना यह किला आज के समय में गुजरात का एक ऑफबीट टूरिस्ट डेस्टिनेशन है। कहा जाता है कि वर्ष 1965 से यह किला विरान पड़ा है, जिसकी वजह से धीरे-धीरे किला पूरी तरह से नष्ट होता जा रहा है। लेकिन रोहा किला को सबसे अधिक नुकसान साल 2001 में भुज में आए तेज भूकम्प की वजह से पहुंचा। इस भूकम्प में किले का अधिकांश हिस्सा पूरी तरह से बर्बाद हो गया है।



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