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Kullu Dussehra : जब देश में खत्म तब कुल्लु में शुरू होता है दशहरा, क्यों है यह इतना खास!

कुल्लू का दशहरा कुछ ऐसा होता है जो देश में मनायी जाने वाली नवरात्रि से काफी अलग होता है। हिमाचल प्रदेश के इस पहाड़ी शहर में मनाए जाने वाले दशहरा को देखने के लिए सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी हजारों सैलानी इस समय कुल्लू पहुंचते हैं। लेकिन कुल्लू का दशहरा देश के दूसरे शहरों में मनायी जाने वाली नवरात्रि से काफी अलग होता है।

kullu dussehra 2023

देशभर में जब दशहरा के दिन त्योहार का समापन माना जाता है वहीं कुल्लू में दशहरा के दिन से त्योहार की शुरुआत होती है। जो अगले 7 दिनों तक चलने वाली होती है। हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी संस्कृति देश के दूसरे हिस्सों से काफी अलग होती है जिसके प्रति लोगों में काफी आकर्षण रहता है। लेकिन कुल्लू शहर में मनाया जाने वाला दशहरा कुछ ऐसा होता है जिसे अनुभव करने के लिए हर साल लाखों लोग वहां पहुंचते हैं। दशहरे के दिन से शुरू होने वाले उत्सव के बारे में मान्यता है कि इसमें शामिल होने के लिए खुद देवी-देवता धरती पर आते हैं।

क्या है कुल्लू के दशहरे का इतिहास

कुल्लू में दशहरे का भव्य आयोजन शहर के धौलपुर मैदान में किया जाता है। यह उगते चंद्रमा के 10वें दिन से शुरू होता है जब पूरे देश में दशहरा मनाया जाता है। उस दिन से लेकर अगले 7 दिनों तक इसे मनाया जाता है। जानकारी के अनुसार कुल्लू में दशहरे की शुरुआत 16वीं शताब्दी में हुई थी।

सबसे पहले वर्ष 1662 में हिमाचल प्रदेश के बेहद सुन्दर पहाड़ी शहर कुल्लू में दशहरा का आयोजन किया गया था। इस दशहरे के पहले दिन मनाली की हिडिंबा देवी, जो दशहरे की भी देवी हैं, मनाली से कुल्लू आती हैं। इस दिन राज परिवार के सभी सदस्य देवी-देवताओं का आर्शीवाद लेने कुल्लू पहुंचते हैं।

kullu himachal pradesh

देव मिलन का प्रतीक कुल्लू का दशहरा

कुल्लू में दशहरे के शुरुआत के बारे में प्रचलित कहानी के अनुसार वर्ष 1650 के आसपास कुल्लू के राजा जगत सिंह बुरी तरह से बीमार पड़ गये थे। काफी इलाज के बावजूद जब उनकी बीमारी ठीक नहीं हुई तो एक बाबा पयहारी ने उन्हें बताया कि अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से भगवान रघुनाथ की मूर्ति कुल्लू लाकर उनके चरणमृत से ही राजा जगत सिंह ठीक हो सकेंगे।

रघुनाथ जी की मूर्ति को अयोध्या से कुल्लू लाने में काफी संघर्ष करना पड़ा और जब उन्हें कुल्लू में स्थापित किया गया तो सभी देवी-देवताओं को भी आमंत्रित किया गया। मान्यता के अनुसार सभी देवी-देवताओं ने रघुनाथ जी को तब सबसे बड़ा देवता मान लिया और तभी से देवताओं के मिलन के प्रतीक के रूप में दशहरा मनाने की शुरुआत हुई जो आज भी जारी है।

kullu

निकाली जाती है रथ-यात्रा

कुल्लू के दशहरा में निकाली जाने वाली विशाल रथ-यात्रा का ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। बहुत ही सुन्दर तरीके से सजाए हुए रथ में बैठाकर भगवान रघुनाथ जी का जुलूस निकाला जाता है। रथ को सभी भक्त पूरी भक्ति-भाव के साथ खींचते हैं। यह एक ऐसा दृश्य होता है जो किसी भी पर्यटक को सालों तक याद रहेगा। इस साल 25 अक्टूबर को सांस्कृतिक परेड और 30 अक्टूबर को कुल्लू कार्निवल का आयोजन किया जाएगा।

इसके अलावा कुल्लू दशहरा के मौके पर खास मेला भी लगाया जाएगा। मिली जानकारी के अनुसार इस मेले में रूस, इजरायल, रोमानिया, कजाकिस्तान, क्रोएशिया, वियतनाम, ताइवान, थाईलैंड, पनामा, ईरान, मालदीव, मलेशिया, दक्षिण सूडान, केन्या समेत कई अन्य देशों के कलाकार भी हिस्सा लेंगे।

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