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कोलकाता के काली घाट मंदिर तक Skywalk तैयार : जाने सुविधाएं, विशेषताएं और कब से खुलेगा?

पिछले लंबे समय से कोलकाता के काली घाट मंदिर के पास बन रहे स्काईवाक (Skywalk) का निर्माण पूरा होने का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था। सड़क पर ट्रैफिक और भीड़-भाड़ से दूर स्काईवाक के रास्ते श्रद्धालु काली घाट मंदिर तक आसानी से आवाजाही कर सकेंगे। इस दावे के साथ पिछले लंबे समय से 51 शक्तिपीठों में से एक काली घाट मंदिर को जोड़ने वाले स्काईवाक का निर्माण किया जा रहा था।

आखिरकार इंतजार खत्म हुआ और कोलकाता का दूसरा स्काईवाक काली घाट में बनकर तैयार हो गया है। बांग्ला नववर्ष से ठीक एक दिन पहले चैत्र संक्रांति की संध्या को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने काली घाट स्काईवाक का उद्घाटन किया। लेकिन क्या इसे आम जनता के लिए अभी से ही खोल दिया गया है? स्काईवाक की विशेषताएं क्या है और इसे बनाने में कितनी लागत आयी है? सामान्य किसी फ्लाईओवर या फुट ओवरब्रिज से कितना अलग होता है स्काईवाक?

kolkata kalighat skywalk

₹125 करोड़ की लागत से हुआ निर्माण

कोलकाता में तैयार हुआ यह दूसरा स्काईवाक है। काली घाट स्काईवाक कोलकाता का सबसे लंबा स्काईवाक है। मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार इस स्काईवाक की लागत करीब ₹125 करोड़ आयी है, जिसका खर्च राज्य सरकार ने उठाया है। कोलकाता में पहला स्काईवाक दक्षिणेश्वर मंदिर के पास बनाया गया था। वर्ष 2018 में दक्षिणेश्वर स्काईवाक का उद्घाटन करते समय ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने काली घाट मंदिर तक आने-जाने के लिए भी एक स्काईवाक बनाने की घोषणा की थी।

हालांकि शुरुआत में इस स्काईवाक के निर्माण में काफी बाधाएं भी आयी थी। काली मंदिर तक जाने वाली काली टेम्पल रोड के दोनों तरफ रिफ्यूजी हॉकर्स कॉर्नर मौजूद था। स्काईवाक के निर्माण के लिए इन दुकानदारों और हॉकर्स कॉर्नर को खाली करवाना जरूरी था लेकिन इन दुकानदारों ने अपनी जगह छोड़ने से शुरुआत में इंकार कर दिया था। हालांकि बातचीत और पुनर्वास के लिए दूसरी जगह देने के बाद इन दुकानदारों ने वर्ष 2021 के अंत में इस जगह को खाली करने पर अपनी सहमती जतायी। इसके बाद ही स्काईवाक का काम शुरू हो सका।

kalighat skywalk

स्काईवाक की विशेषताएं और सुविधाएं

काली घाट स्काईवाक की कुल लंबाई करीब 440 मीटर है। यह स्काईवाक एसपी मुखर्जी रोड से शुरू होता है, जो काली टेम्पल रोड तक जाता है। बताया जाता है कि दक्षिणेश्वर स्काईवाक के तर्ज पर ही काली घाट स्काईवाक से नीचे उतरकर थोड़ा आगे बढ़ने पर ही काली घाट मंदिर का मुख्य द्वार मिल जाएगा। श्रद्धालुओं को स्काईवाक में चढ़ने-उतरने के लिए 3 जोड़ी एस्केलेटर लगाई गयी है।

इसके अलावा सामान्य सीढ़ियां भी यहां मौजूद है। अब बस से एसपी मुखर्जी रोड पर उतरने वाले श्रद्धालु सीधे स्काईवाक की मदद से काली घाट मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंच जाएंगे। यहां रास्ते में न तो उन्हें तेज और कड़ी धूप या बारिश का सामना करना पड़ेगा और न ही ट्रैफिक या दुकानों पर लगने वाली अनावश्यक भीड़ में फंसने की परेशानी होगी। वहीं दूसरी ओर स्काईवाक के बन जाने से सड़क पर आम श्रद्धालुओं की भीड़ नहीं होगी, जिससे इस रास्ते से होकर आने-जाने वाली गाड़ियां भी आसानी से आवाजाही कर सकेंगी।

कब से खुलेगा?

काली घाट स्काईवाक का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया एक वीडियो पोस्ट कर इसकी जानकारी दी है। सोमवार (14 अप्रैल) को बांग्ला नववर्ष से ठीक एक दिन पहले मुख्यमंत्री ने इसका उद्घाटन कर दिया। लेकिन 14 अप्रैल से ही इसे आम जनता के लिए खोला नहीं जाएगा। काली घाट स्काईवाक बांग्ला नववर्ष के दिन यानी 15 अप्रैल से आम जनता के लिए खुल जाएगा। यानी साल के पहले दिन जो श्रद्धालु 51 शक्तिपीठों में से एक मां काली के दर्शन करने के लिए मंदिर जाना चाहेंगे, वे इस स्काईवाक का इस्तेमाल कर सकेंगे।

स्काईवाक होता क्या है?

अब आपको बता दें, किसी भी फुट ओवरब्रिज या फ्लाईओवर से स्काईवाक कितना अलग होता है। दरअसल, फ्लाईओवर से होकर गाड़ियां आवाजाही करती हैं और फुट ओवरब्रिज को आमतौर पर किसी सड़क या रेलवे लाइन के ऊपर तैयार किया जाता है। लेकिन स्काईवाक पैदल पथ होता है। यह किसी एक निर्धारित स्थान से शुरू होता है और अपने गंतव्य पर जाकर खत्म होता है।

यहां न तो गाड़ियां चलती है और न ही इसके नीचे से होकर रेलवे लाइन या कोई सड़क या नदी गुजरती है। स्काईवाक का निर्माण सिर्फ लोगों को बिना भीड़-भाड़ का सामना किये आसानी से पैदल चलते हुए अपने गंतव्यों तक पहुंचाने के लिए ही किया जाता है।

गौरतलब है कि काली घाट मंदिर का भी जीर्णोद्धार कार्य हाल ही में पूरा किया गया है और मंदिर के तीन शिखरों को सोने से मढ़ा गया है। सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार 24 कैरेट सोने की परत से मंदिर के तीनों शिखरों को ढंका गया है। बताया जाता है कि इसमें लगभग 50 किलो सोना का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि दावा किया गया है कि मंदिर के शिखर को भले से सोने की परत से ढंक दिया गया है लेकिन मंदिर की बनावट या संरचना में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

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