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15 नहीं 18 अगस्त को इस गांव में मनाया जाता है आजादी का जश्न, जानिए क्यों और कौन सा है वह गांव!

15 अगस्त 1947, जब पूरा देश 200 सालों की गुलामी की बेड़ियों से आजाद होकर पहली बार खुली हवा में सांस ले रहा था। कहीं महिलाएं खुशी से झुम रही थी, कोई मंदिर में भगवान को धन्यवाद करने पहुंचा, कोई गर्व से सीना ताने खुद को आजाद भारत का नागरिक होने का अहसास दिला रहा था। पर भारत के बॉर्डर पर मौजूद एक गांव ऐसा भी था, जो गम के सागर में गोते लगा रहा था।

15th august

ऐसा नहीं था कि यह गांव अंग्रेजों की गुलामी से आजाद नहीं हुआ था। बल्कि इस गांव के लोग भारत का हिस्सा नहीं होने का गम मना रहे थे। क्योंकि बंटवारे के समय पश्चिम बंगाल के बॉर्डर से सटे इस गांव को पूर्वी पाकिस्तान में दे दिया गया था। जो यहां रहने वाले लोगों को मंजूर नहीं था। जरा सोचिए, एक गांव के लोग जो रात को आजाद भारत में सांस लेने का सपना लेकर सोये हो, सुबह जागने पर उन्हें कितना बड़ा झटका उस समय लगा होगा, जब उन्हें पता चला कि वे भारत नहीं बल्कि पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बन चुके हैं। उनके सारे अरमान कांच की तरह चकनाचुर हुए होंगे...हैं ना!

कौन सा है वह गांव

शिवनिवास गांव, भारत-बांग्लादेश बॉर्डर के पास मौजूद यह गांव आज भले ही भारत का अभिन्न अंग है लेकिन विभाजन के समय यह गांव पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) का हिस्सा बन गया था। इस गांव का नाम यहां मौजूद भगवान शिव के मंदिरों की वजह से है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में किया गया था। चुर्नी नदी के किनारे स्थित शिवनिवास गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आज यहां स्वतंत्रता दिवस 18 अगस्त को मनायी जाती है। जी हां, पूरा देश जहां 15 अगस्त को आजादी के जश्न में डूबा रहता है, वहीं शिवनिवास गांव के लोग अपना स्वतंत्रता दिवस 18 अगस्त को मनाते हैं।

क्यों मनाया जाता है अलग स्वतंत्रता दिवस

शिवनिवास गांव में अलग स्वतंत्रता दिवस मनाने के पीछे की वजह बंटवारा थी। दरअसल, जब लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत और पाकिस्तान का बंटवारा किया, तो भारत के वर्तमान पश्चिम बंगाल राज्य के दो जिले नदिया व मुर्शिदाबाद का एक बड़ा हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में चला गया। एक बार जब दोनों देशों की सीमा तय हो गयी तो नदिया जिले में मौजूद इस हिंदू बहुल गांव के लोग जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन करने लगे। वे भारत का हिस्सा बने रहना चाहते थे।

village image

उनका विरोध को देखते हुए तत्कालिन वॉयसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने तुरंत अपने आदेश को सुधारा और 17 अगस्त 1947 की शाम को ऑल इंडिया रेडियो (AIR) पर घोषणा की गयी कि दोनों जिले भारत का हिस्सा होंगे। इस तरह भारत-बांग्लादेश (तत्कालिन पूर्वी पाकिस्तान) की सीमा फिर से निर्धारित हुई जो आज तक कायम है।
18 अगस्त की सुबह शिवनिवास गांव के लोगों ने अपनी आजादी का जश्न जिला मुख्यालय कृष्णनगर में पाकिस्तान का झंडा हटाकर भारत का तिरंगा फहराकर मनाया।

1991 से मनाया जाता है 18 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस

18 अगस्त 1947 को शिवनिवास गांव आजाद तो हो गया लेकिन लोग इस बात को भूल गये। पर वर्ष 1991 को अचानक शिवनिवास गांव के रहने वाले अंजन सुकुल ने फैसला लिया कि वह 18 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे। लेकिन मुश्किल यह थी कि उस समय 15 अगस्त और 26 जनवरी के अलावा किसी और दिन आम लोगों को झंडा फहराने की अनुमति नहीं थी। 18 अगस्त को आजादी का जश्न मनाने की जिद्द पर अड़े अंजन सुकुल ने केंद्रीय सुचना व प्रसारण मंत्रालय के पास आवेदन किया और मंजूरी मिलने के बाद उन्होंने 18 अगस्त 1991 को अपने गांव का स्वतंत्रता दिवस भी मनाया।

shibnibas village

धीरे-धीरे उनके पड़ोसी और दोस्त इस अनोखे स्वतंत्रता दिवस समारोह का हिस्सा बनने लगे। 18 अगस्त कमेटी, एक रजिस्टर्ड संस्थान जिसका गठन 1998 को हुआ था और कुछ स्थानीय लोगों ने इस दिन को बड़े पैमाने पर मनाना शुरू कर दिया। पास में ही बॉर्डर होने के कारण BSF के अधिकारी व जवान भी इसमें हिस्सा लेने लगे। कोई भांगड़ा डांस करता तो कोई कुत्तों का डॉग शो आयोजित करता। चुर्नी नदी में बोट रेस भी आयोजित होने लगा जिसमें अब महिलाएं भी हिस्सा लेती हैं।

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