भारतीय रेल का इतिहास तो आपने जरूर पढ़ा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं जितनी विशाल भारतीय रेल है उससे कहीं बड़ा उसका इतिहास। यह सब जानते हैं कि मुंबई और ठाणे के बीच पहली ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को चली थी, लेकिन क्या आप जानते हैं उस ट्रेन को चलाने वाले ड्राइवर की सैलरी इंग्लैड में ट्रेन ड्राइवरों की सैलरी से तीन गुनी ज्यादा थी?

भारत उन टॉप-10 देशों में है, जहां सबसे पहले ट्रेन चली और क्या आप जानते हैं कि बंटवारे के दौरान कितनी रेलवे लाइन पाकिस्तान चली गई?
जी हां, रेलवे से जुड़े जो तथ्य हम आपको बताने जा रहे हैं, वो इतने रोचक हैं कि जब-जब आप ट्रेन में सफर करेंगे, आपको हमारी यह स्टोरी जरूर याद आयेगी।
आगे बढ़ने से पहले हम आपको बताना चाहेंगे कि यहां अधिकांश तथ्य हमने सावित्री बाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के एक शोध से एकत्र किए हैं, जो डॉ. पी. सी शेवाल्कर ने 1958 में किया था। पुरानी बाइंडिंग और पीले पड़ते कागज़ों के इस शोध में ऐसी तमाम बातें कैद हैं, जो आपको बार-बार सोचने पर मजबूर करेंगी। खैर आइये शुरुआत करते हैं भारतीय रेल की पहली ट्रेन से।
रेल लाइन बिछाने का पहला ठेका 1848 को
भारतीय रेल की शुरुआत 8 मई 1845 को की गयी थी। लेकिन रेल लाइन बिछाने का काम 1848 में शुरू हो पाया। यानी 3 साल का समय रेलवे को लेकर विभिन्न योजना, भूमि अधिग्रहण जैसे कामों में लगा। 1853 में सबसे पहले मुंबई (तत्कालिन बम्बई) और ठाणे के बीच 21 मील का ट्रैक बनाया गया, जिसे Great Indian Peninsula भी कहा जाता है। इसी ट्रैक पर 16 अप्रैल 1953 को पहली ट्रेन चली।
रोचक तथ्य- इस ट्रेन को चलाने वाले ड्राइवर की सैलरी इंग्लैंड में ट्रेन ड्राइवर से कई गुनी अधिक थी। ट्रेन ड्राइवरों को हाई पैकेज कई दशकों तक मिलता रहा। शोध के अनुसार 1870 में इंग्लैंड के एक ट्रेन ड्राइवर का वेतन अगर साल में 150 पाउंड होता था तो भारत में ड्राइवर को 460 पाउंड प्रति वर्ष वेतन दिया जाता था।
टॉप पोज़ीशन पर ब्रिटिश अधिकारी

शोध के अनुसार 1870 में भारतीय रेलवे के कुल कर्मियों का लगभग 90% सिर्फ भारतीय ही हुआ करते थे। लेकिन रेलवे में जो 19 उच्च पद होते थे, उन पर ब्रिटिश अधिकारियों की नियुक्ति मोटे वेतन के साथ की जाती थी। उस समय यूरोप की तुलना में भारत में काम करने वाले अधिकारियों का वेतन भी कहीं ज्यादा होता था।
एक साल के अंदर कल्याण पहुंची ट्रेन
रेलवे ने महज़ एक साल के भीतर ट्रैक को कल्याण तक बढ़ाया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रैक बिछाने की गति बहुत अधिक थी। दरअसल तमाम राजनीति और आर्थिक संकट की वजह से यह काम धीमा ही चल रहा था। 1853 से लेकर 1900 के बीच भारत में 24,752 मील का ट्रैक बिछाने का काम पूरा हो गया था जिसके लिए 329.53 करोड़ रुपये खर्च हुए थे।
रोचक तथ्य- उस दौरान ट्रैक बनाने पर 1 लाख रुपए प्रति मील का खर्च आता था, आज यानी 2023 में हाईस्पीड ट्रेनों के लिए प्रति एक किलोमीटर ट्रैक बनाने मे 100 से 140 करोड़ रुपए खर्च होते हैं।
रूस से ज्यादा कठिन था भारत में ट्रैक बनाना
भारत में ट्रेन चलाना कोई बच्चों का खेल नहीं था। यहां की भौगोलिक परिस्थितियां सबसे रेलवे ट्रैक को बिछाने के मामले में सबसे बड़ी बाधक बनी थी। भारत रुस की तरह कोई सीधी भूमि वाला देश नहीं है। रूस में 1837 में जो पहली ट्रेन चली उसने मात्र 27 किलोमीटर की दूरी तय की और भारत की ट्रेन ने मुंबई-ठाणे के बीच 22 किमी की दूरी तय की, लेकिन दोनों में फर्क यह था कि रूस में जमीन सपाट थी और ट्रैक तेज़ी से बनता गया, यहां पर मुंबई से ठाणे के बीच ही ट्रैक बनाने के लिए कई सारी पहाड़ियों को चीरना पड़ा।
रेलवे बना औद्योगिक विकास की नींव
1869 में जब स्वेज कैनल खुला और रेलवे को गति मिली, उसके बाद ही भारत के औद्योगिक विकास को भी नई गति मिली। लेकिन 1877 में भारत में अकाल पड़ने की वजह से अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई और रेलवे का काम लगभग थम सा गया। रोचक तथ्य- रेलवे ट्रैक की जगह नहरें बनाने पर जोर : भारत में जब रेलवे का विस्तार किया जा रहा था उस समय कई अर्थशास्त्री नहरों का विकास करने पर जोर दे रहे थे। आर. सी. दत्ता नामक एक अर्थशास्त्री ने तो भारत में रेलवे के विकास को समय और परिश्रम की बर्बादी तक करार दिया था। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत इन बातों को अनसुना कर भारत में रेलवे लाइनों का विस्तार करती रही। अकाल से उबरने के बाद यह गति और तेज़ हो गई।
सबसे पहले ट्रेन चलाने वाले टॉप-10 देशों में भारत
क्या आपको पता है, भारत दुनिया के उन चुनिंदा कुछ देशों में से है जहां पहली बार ट्रेन चली। दुनिया की पहली ट्रेन इंग्लैंड में स्टॉकटन और डार्लिंग्टन के बीच 27 सिंतबर 1825 को चली थी। एक नज़र उन देशों पर जिन्होंने सबसे पहले रेल सेवा की शुरुआत की।
| वर्ष | देश | |
| 1. | 1825 | इंग्लैंड |
| 2. | 1829 | फ्रांस |
| 3. | 1830 | अमेरिका |
| 4. | 1835 | जर्मनी |
| 5. | 1836 | कनाडा |
| 6. | 1839 | इटली |
| 7. | 1839 | हॉलैंड |
| 8. | 1847 | डेनमार्क |
| 9. | 1848 | स्पेन |
| 10. | 1848 | रूस |
| 11. | 1853 | भारत |
आज के दौर के विकसित देशों की बात करें तो चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे तमाम देश ऐसे हैं जो पहली ट्रेन चलाने के मामले में भारत से कहीं पीछे रहे।
कैसे हुआ भारतीय रेल का बंटवारा
स्वतंत्रता के बाद जब बंटवारा हुआ तो भारतीय रेल ही थी जो रिफ्यूजियों का सहारा बनी। 15 अगस्त 1947 से लेकर 8 सितंबर 1947 तक 7 लाख से अधिक लोग ट्रेन से भारत से पाकिस्तान या पाकिस्तान से भारत आये। उस दौरान ट्रेनों में एक इंच भी जगह नहीं बचती थी। लोग ट्रेनों की छतों पर चढ़ कर यात्रा करते थे।

बंटवारे के दौरान दो देशों के बीच लिंक बनी रेलवे का भी बंटवारा हुआ। 1930 में तक जब रेलवे मार्गों की कुल लंबाई बढ़कर 41,700 मील हो गयी थी तब रेलवे में विनियोजित वित्त की मात्रा भी 857 करोड़ रुपये पर पहुंच गयी। लेकिन 1937 में जब बर्मा भारत से अलग हुआ तो करीब 2000 मील की रेलवे लाइन बर्मा में चली गयी। उसी तरह 1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो उस समय भी 7000 मील लंबी रेल लाइन पाकिस्तान में चली गयी। इस वजह से रेलवे की लगभग 150 करोड़ रुपये की विनियोग पूंजी भी पाकिस्तान के हिस्से में आ गयी।
लोगों को अपनी पसंद के देश पहुंचाने के बाद रेलवे के कर्मचारियों को भी शिफ्ट किया गया। नवंबर 1947 में 1 लाख 26 हजार रेलकर्मियों ने पाकिस्तान से भारत आने का फैसला किया, जिनमें से करीब 1 लाख 4 हजार ने ही भारत में अपनी नौकरी को जारी रखा या ज्वाइन किया।
रेडक्लिफ लाइन बनी चुनौती
बंटवारे के दौरान जब रेडक्लिफ लाइन खींची गई तब रेलवे डिवीजन की वर्कशॉप पड़ोसी देश में चली गई। ऐसे में दोनों देशों ने निर्णय लिया कि रेलवे वर्कशॉप का इस्तेमाल दोनों देश करेंगे। उस दौरान लाहौर की मुगलपुरा वर्कशॉप से उपकरण बनकर भारत आते थे और भारत में स्थित कांचरापारा वर्कशॉप में बनने वाले डिब्बे पाकिस्तान भेजे जाते थे। यह सिलसिला कुछ ही वर्षों तक चला और फिर भारतीय रेल ने अपनी गति इतनी तेज़ कर दी कि आज 2023 में हम बुलेट ट्रेन बना रहे हैं। कुछ ही वर्षों में अहमदाबाद और मुंबई के बीच बुलेट ट्रेन ठीक उसी तरह इतिहास रचेगी, जिस तरह बम्बई-ठाणे के बीच ट्रेन ने 1853 में रचा था।



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