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काली पूजा के दौरान जंजीरों से बांध दी जाती है माँ काली की मूर्ति, जानिए क्यों?

पश्चिम बंगाल समेत देश के कई राज्यों में दीवाली की रात को काली पूजा की जाती है। अमावस्या की इस काली रात में माँ काली की मूर्ति को सजाया जाता है और मध्‍य रात्रि में पूजा शुरू की जाती है जो सुबह तक चलती है। इस दिन माँ काली को गहनों से सजाया जाता है और उनकी आराधना की जाती है। लेकिन पश्चिम बंगाल में कुछ जगहें ऐसी हैं, जहां पर पूजा के एक विशेष कार्य के दौरान मॉं काली को जंजीरों से बांध दिया जाता है,और तो और कुछ जगहों पर तो माँ की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है।

fatakeshto kali

दरअसल हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल के मालदह, बर्दवान और बांकुड़ा जिलों में होने वाली काली पूजा की। इन शहरों के उन स्थानों की हम बात करेंगे, जहां पर बलि के दौरान माँ काली को बांध दिया जाता है।

जैसा कि हम जानते हैं कि माँ काली की पूजा का एक अभिन्न अंग बली होता है। माँ काली की पूजा को बली के बिना अधुरा माना जाता है। पश्चिम बंगाल में ऐसे कई काली पूजा पंडाल या मंदिर हैं, जिनमें से कहीं बली चढ़ाते समय माँ काली की मूर्ति को जंजीरों से बांध दिया जाता है तो कहीं इस डर से माँ काली के पैरों में बेड़ियां डाल दी जाती हैं कि वह नाराज होकर भाग ना जाएं।

कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल में दिवाली की रात को बड़े ही भक्तिभाव से शक्ति की आराधना यानी मॉं काली की पूजा की जाती है। देशभर के दूसरे राज्यों के मुकाबले पश्चिम बंगाल में माँ काली के सर्वाधिक मंदिर और पूजा पंडाल होते हैं जहां दिवाली की रात को उनकी पूजा की जाती है। यहां दुर्गा पूजा के साथ-साथ कई काली पूजा पंडाल भी हैं, जिनका इतिहास 500 सालों से भी अधिक पुराना है। ऐसे ही पूजा पंडालों के साथ कई मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं, जिनकी कहानियां आज भी स्थानीय लोगों के बीच काफी प्रचलित है।

1. चटर्जी परिवार की बूढ़ी माँ

goddess kali

पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्दवान जिले में अम्बिका कालना में 'चटर्जी परिवार की बुढ़ी मां' नाम से प्रसिद्ध धात्रीग्राम की मॉं काली को एक समय डाकात काली (डकैत काली) के नाम से जाना जाता था। कहा जाता है कि करीब 300 साल पहले घने जंगल में मौजूद मॉं काली की पूजा करने के बाद ही इलाके के डाकु रात को डाका डालने के लिए निकलते थे। उस समय यहां माँ काली को भैंस की बली चढ़ाने का रिवाज था।

धीरे-धीरे इलाके का विकास हुआ लेकिन मंदिर से सटे इलाके में गहरा जंगल बना हुआ था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार सालों पहले इसी जंगल में चटर्जी परिवार के पूर्वज त्रिलोचन चटर्जी को माँ काली की यह प्रतिमा मिली। तब से उन्हें चटर्जी परिवार की बुढ़ी माँ के नाम से पुकारा जाने लगा।

बली के समय चंचल हो जाती हैं माँ काली

चटर्जी परिवार में माँ काली को पूजा के समय खास तौर पर बनाया गया अन्नभोग चढ़ाया जाता है। माँ काली को मांसाहार भोजन का भोग लगाया जाता है। इसलिए यहां माँ काली के लिए विशेष रूप से 5 तरह की मछली, 5 तरह की सब्जी, 5 प्रकार का भुजिया चढ़ाया जाता है। यहां भोग में चढ़ायी जाने वाली मछली को बाजार से खरीदी नहीं जाती है बल्कि माँ काली के नाम पर एक तालाब बनाया हुआ है, जहां मछलियां पाली जाती हैं।

पहले माँ काली को भैंसे की बली चढ़ायी जाती है लेकिन अब बकरे की बली चढ़ाने का ही प्रचलन है। कहा जाता है कि जिस समय माँ काली को बली चढ़ाने की तैयारी की जाती है, तब वह अचानक से काफी ज्यादा चंचल हो जाती हैं। उनकी प्रतिमा अचानक हिलने लगती है। कहीं प्रतिमा गिर ना जाए और माँ काली को कोई चोट ना लग जाए, इस डर से बली चढ़ाते समय प्रतिमा को जंजीरों से बांधने का प्रचलन आज भी जारी है।

2. मालदह की मणिकोड़ा काली

राज्य के मालदह जिले में हबीबपुर थाना में जाजइल थाना ग्राम पंचायत स्थित मणिकोड़ा इलाके में भी माँ काली पहले डाकात काली के नाम से ही पूजी जाती थी, जो बाद में मणिकोड़ा काली के नाम से प्रसिद्ध हुई। स्थानीय लोगों के अनुसार करीब 300 साल पहले पुनर्भरा नदी को पार कर दूसरी तरफ से (वर्तमान बांग्लादेश) से डाकुओं का समुह यहां माँ काली की पूजा करने आता था। भोर की पहली किरण से पहले डाकु फिर से नदी पार कर वापस लौट जाते थे। इस मंदिर में माँ काली को काफी जाग्रत माना जाता है।

kali maa

ब्रिटिश काल में स्थानीय एक जमींदार को जंगलों से घिरा यह मंदिर मिला था। इसके बाद से इस स्थान पर माँ काली की पूजा उसी जमींदार परिवार के सदस्य ही करते आ रहे थे। लेकिन जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद माँ काली की पूजा करने की जिम्मेदारी स्थानीय ग्रामिणों ने अपने कंधे पर उठा ली थी। आज भी यहां डाकुओं की प्रथा के अनुसार ही पूजा के समय मसाल जलाया जाता है।

माँ काली की आंखों पर बांधी जाती है पट्टी

मणिकोड़ा काली के बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार एक बार एक चूड़ी (पारंपरिक बंगाली चूड़ी शंखा) बेचने वाला गांव की पगडंडी से होकर कहीं जा रहा थी। बीच रास्ते में उसे एक छोटी बच्ची मिली जो शंखा पहनने की जिद्द करने लगी। चूड़ीवाले ने उसे शंखा पहना दिया और जब उसके पैसे मांगे तो उसने मंदिर में माँ काली के पुजारी का नाम अपने पिता के तौर पर बताया। जब चूड़ीवाले ने पुजारी से शंखा के रूपये मांगे तो पुजारी पहले तो चौंक उठा क्योंकि उसकी कोई बेटी ही नहीं थी।

kali puja

थोड़ी देर बाद ही पुजारी को तालाब में अपने दोनों हाथों में शंखा पहने एक छोटी बच्ची खड़ी दिखी। पुजारी तुरंत समझ गया कि वह माँ काली ही है और उसने चूड़ीवाले को पैसे दे दिये। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार काली पूजा को देर रात जब माँ काली का चक्षुदान के समय जब बली चढ़ाई जाती है, तब माँ काली की मूर्ति अचानक हिल उठती है। पहले मूर्ति को लोहे की जंजीरों से जकड़ दिया जाता था लेकिन अब बली चढ़ाते समय माँ काली की आंखों पर पट्टी बांधी जाती है।

3. 500 साल पुरानी है माँ पागला काली की पूजा

राज्य के बांकुड़ा जिले का सोनामुखी गांव माँ काली के शहर के तौर पर ही लोकप्रिय है। लगभग 300 साल पहले तक यहां घना जंगल हुआ करता था। लेकिन धीरे-धीरे जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ इस जगह का विकास हुआ। सोनामुखी शहर में खैपा काली या पागला काली के नाम से माँ काली की पूजा होती है। स्थानीय लोगों के अनुसार 500 साल पहले जब सोनामुखी जनपद का विकास भी नहीं हुआ था, उस समय से ही माँ काली की यहां पूजा हो रही है।

kali puja in kolkata

कहा जाता है कि पुराने जमाने में इस जनपद में गरीब कुम्हारों की संख्या सबसे अधिक थी। एक बार जब इस इलाके में भयावह आग लग गयी तब कुम्हारों ने माँ काली से उनकी रक्षा करने का अनुरोध किया। मान्यता है कि तेज धधक रही आग अचानक से नियंत्रण में आ गयी और उसके बाद ही लोगों ने देखा माँ काली के 4 हाथों में से ऊपर वाले दो हाथ धीरे-धीरे काले पड़ गये। गांव वालों को तब समझ में आया कि इस आग को माँ काली ने अपने हाथों से नियंत्रित किया है। तब से यहां माँ काली की अधिक पूजा होने लगी।

मंदिर छोड़कर चली जा सकती हैं माँ काली

इस पूजा पंडाल को लेकर मान्यता है कि अगर माँ काली की पूजा में कोई भी त्रुटि होती है तो माँ काली एक छोटी बच्ची का रूप धारण कर चली जाएंगी। इसलिए काली पूजा के दिन माँ काली के पैरों में बेड़ियां बांधने का रिवाज है, ताकि माँ काली पूजा छोड़कर कहीं न जा सकें। जब प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है, तब देवी माँ के पैरों से बेड़ियां खोलकर उन्हें विसर्जित किया जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार एक बार एक महिला ने अपनी बेटी के स्वस्थ होने की मन्नत मांगते हुए माँ काली को सोने का मांगटिका चढ़ाने का वादा किया था। उक्त महिला की बेटी तो स्वस्थ हो गयी लेकिन वह अपनी मन्नत पूरी करना भूल गयी।

अचानक एक दिन जब उस महिला की बेटी गायब हो गयी तो उसे अपनी मन्नत याद आयी। कहा जाता है कि विसर्जन के बाद बचे देवी माँ की प्रतिमा के हिस्से पर उस बच्ची का मांगटिका और पायल लटकता हुआ पाया गया था। इसके बाद महिला ने अपनी मन्नत पूरी की और तुरंत उसे अपनी बेटी वापस मिल गयी। कहा जाता है कि उसके बाद से ही इस परिवार में कोई भी कुंवारी लड़की मांगटिका और पायल नहीं पहनती है।

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