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कुछ ऐसे नाम पड़ा हिमाचल के मैकलोडगंज का, जानिए इतिहास के पन्नों से निकले इस शहर के बारे में...

हिमाचल की खूबसूरती किसी से छिपी हुई नहीं है, आज भी यहां कई ऐसे स्थान देखने को मिल जाएंगे, जो अंग्रेजों के नाम पर है। इनमें से ही एक है मैकलोडगंज। यह स्थान धर्मशाला के पास में स्थित है।

हिमाचल के धर्मशाला का नाम तो सभी ने सुना होगा लेकिन क्या आप मैकलोडगंज के बारे में जानते हैं? क्या आपको यहां के इतिहास के बारे में पता है? क्या आप जानते हैं कि इस स्थान का नाम मैकलोडगंज कैसे पड़ा? इन सभी सवालों से पर्दा उठेगा, बने रहिए इस लेख के अंत तक...

धर्मशाला के पास में ही स्थित है मैकलोडगंज, जो हिमाचल का एक प्रमुख हिल स्टेशन माना जाता है। अगर आप ट्रेकिंग करने के शौकिन हैं तो ये स्थान आपके लिए सर्वश्रेष्ठ डेस्टिनेशन बन सकता है। तिब्बती संस्कृति की छाप लिए हिमाचल का ये शहर छोटे ल्हासा के रूप में भी जाना जाता है। यहां आपको कई तिब्बतियों की बस्ती भी देखने को मिल जाएगी। इसके अलावा तिब्बती गुरू दलाई लामा का घर भी यही है। यहां आपको तिब्बती मठ भी देखने को मिल जाएगा, जो दुनिया के हर पर्यटक को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां आपको तिब्बती के साथ-साथ बौद्ध संस्कृति की भी झलक देखने को मिलेगी।

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क्या है मैकलोडगंज (कांगड़ा) का इतिहास?

मैकलोडगंज, कांगड़ा जिले में आता है और इस जिले को लेकर कहा जाता है कि इस स्थान को महाभारत के युद्ध के बाद राजा सुसर्माचंद द्वारा बसाया गया था। कांगड़ा कभी चंद्र वंश की राजधानी हुआ करती थी। इस शहर का उल्लेख साढे 3 हजार साल पहले वैदिक युग में मिलता है। इसके अलावा पुराण, महाभारत और राजतरंगिणी में भी इसका जिक्र मिलता है। इतिहास पर नजर डाले तो राजा हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान 629 से 644 ईस्वी के बीच हून त्सांग (एक चीनी यात्री) ने यहां का दौरा किया था, जिसके बाद उसने अपनी खतों में कई शासकों के बारे में उल्लेख भी किया था।

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उसकी खतों के अनुसार, राजा हर्षवर्धन ने नगरकोट (कांगड़ा जिले का पुराना नाम) पर कब्जा कर लिया था, जो उस समय त्रिगर्त या जालंधर राज्य की राजधानी हुआ करती थी। फिर 1009 ईस्वी में नगरकोट के धार्मिक खजाने पर महमूद गजनवी की नजर पड़ी, जिसके बाद कांगड़ा के राजाओं को पराजित कर उसने कांगड़ा किले पर अपना कब्जा जमाया और यहां जमकर लूटपाट भी मचाया, जो 1360 ईस्वी तक चलता रहा। 1556 ईस्वी में अकबर ने भी इस शहर की ओर रूख किया और कांगड़ा किले पर कब्जा जमाया। इसके अलावा भी कई शासकों का कांगड़ा पर कब्जा रहा।

ब्रिटिश काल और मैकलियोड का सम्बन्ध

ब्रिटिश काल के दौरान 1885 ईस्वी इस स्थान का नाम पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर (1849 ईस्वी - दूसरे आंग्ल-सिक्ख युद्ध के दौरान) रहे डेविड मैकलियोड के नाम पर रखा गया। दरअसल, 1862 से 1863 ईस्वी तक लॉर्ड एल्गिन भारत के ब्रिटिश वायसराय थे। उन्होंने जब इस स्थान की सैर की तो उन्हें यह स्थान स्कॉटलैंड में स्थित अपने गृहनगर की याद दिलाता था, जिससे इस स्थान का नाम मैकलोडगंज रखा गया। फिर लॉर्ड एल्गिन की मृत्यु के बाद उनके पार्थिव शरीर को सेंट जॉन्स चर्च इन वाइल्डरनेस में दफनाया गया, जो वर्तमान समय में फोर्सिथगंज में स्थित है। 1905 ईस्वी में एक बहुत भयानक भूकम्प इस पहाड़ी क्षेत्र में आया था, जिसने मैकलोडगंज के साथ-साथ पूरे कांगड़ा को उजाड़ कर रख दिया। लेकिन बाद में दलाई लामा ने फिर से इस शहर से पुनर्जीवित किया।

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बौद्ध व तिब्बतियों के अलावा हिंदुओं का भी खास स्थान

बौद्ध व तिब्बती सभ्यता के अलावा आपको यहां हिंदू संस्कृति भी देखने को मिलेगी। यहां देश के प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ मौजूद है, जिसे ज्वाला देवी के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर में जलती हुई ज्वाला को मुगल सम्राट ने कई बार बुझाने की कोशिश की लेकिन वो इसमें विफल रहा और फिर बाद में मंदिर क्षमा याचना भी की थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर की मान्यता माता वैष्णो देवी के बराबर की है।

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