आधुनिक दुनिया के साथ कदमताल मिलाकर चल रही कोलकाता में आज भी जमींदार और व्यवसायिक परिवारों की छाप मिलती है। दुर्गा पूजा और काली पूजा (दिवाली) कुछ ऐसे मौके होते हैं जब लोग पुरानी और परंपरागत कोलकाता का आधुनिकता के साथ स्वागत करते हैं। कोलकाता के कई परिवार और इलाके ऐसे हैं जहां दुर्गा पूजा का आयोजन 40-50 नहीं बल्कि 100-200 सालों से किया जाता है।

इसी कड़ी में हम आपको कोलकाता के एक ऐसे ही परिवार और 'जगतजननी मंदिर' की कहानी बता रहे हैं जहां देवी मां पिछले 152 सालों से पूजी जाती हैं। साथ ही हम यह भी बताएंगे कि क्यों साल में दो बार नवरात्रि मनायी जाती है जिसकी कहानी भगवान श्रीराम से जुड़ी हुई है।
अंग्रेजों ने दी थी संपत्ति
अविभाजित भारत में जब अंग्रेजों का शासनकाल था तब व्यवसायी जनार्दन साहा ने पान के पत्तों का व्यापार कर भारी मात्रा में संपत्ति अर्जित की थी। एक प्रकार से कहा जा सकता है कि अंग्रेज सैनिकों को पान का शौकिन बनाने का श्रेय उक्त व्यापारी को ही जाता है। व्यापारी से खुश होकर अंग्रेज अफसर अक्सर उन्हें सोने-चांदी के जेवर उपहार में दिया करते थे।

लेकिन इस संपत्ति को अपने पास मेरठ में ना रखकर जनार्दन उसे कोलकाता में रहने वाले अपने भाई मुकुन्द मुरारी साहा के पास भेज देते थे। उस समय यह परिवार 126 नंबर माणिकतल्ला स्ट्रीट में रहता था। चुंकि पुराने कोलकाता में अधिकांश परिवार ही संयुक्त परिवार हुआ करते थे, इसलिए यह परिवार भी एक ही छत के नीचे संयुक्त रूप से रहता था।
152 सालों से पूजी जाती हैं मां दुर्गा
अंग्रेजों से मिली अकुत संपत्ति से पान व्यवसायी जनार्दन साहा ने वर्ष 1871 में कोलकाता में अपने घर से थोड़ी दूरी पर ही माणिकतल्ला मेन रोड इलाके में एक मकान का निर्माण करवाया, जिसमें उन्होंने अष्टधातु की देवी दुर्गा की प्रतिमा को स्थापित किया। इस मंदिर का नाम 'जगतजननी मंदिर' रखा। वर्तमान में यह मंदिर करीब 152 वर्ष पुराना है।

वर्तमान कोलकाता के विधान सरणी से कुछ दूरी पर ही माणिकतल्ला और डफ स्ट्रीट की क्रॉसिंग पर यह मंदिर आज भी स्थित है। पुराने जमाने के जमींदारों या विक्टोरियन युग की किसी हवेली के तर्ज पर बने इस घर की सीढ़ियां संगमरमर से बनी हुई है। दूर से देखने पर यह मकान कोई मंदिर नहीं बल्कि किसी का घर जैसा दिखता है। लेकिन मंदिर में स्थापित देवी मां को काफी अधिक जागृत माना जाता है।
देवी दुर्गा के साथ स्थापित हैं श्रीकृष्ण भी
मंदिर के गर्भगृह में देवी मां की अष्टधातु से बनी मूर्ति स्थापित है। लगातार अच्छी देखरेख होने के कारण आज भी अष्टधातु की यह मूर्ति सोने की तरह चमकती रहती है। यह परिवार कृष्णभक्त था। इसलिए देवी मां की मूर्ति के साथ गर्भगृह में साहा परिवार का पारिवारिक नारायण शिला भी स्थापित है। इसके अलावा गर्भगृह के बाहर तीन तरफ से लोगों के खड़े होने और आरती-पूजा करने का स्थान है, जहां भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं, रास, होली, कालियामर्दन की बड़ी ही आकर्षक पेंटिंग बनायी हुई है।

लेकिन इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां सितंबर-अक्टूबर में होने वाली दुर्गापूजा नहीं बल्कि चैत्र माह में होने वाली नवरात्रि के समय विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। चैत्र नवरात्रि में षष्टी से दशमी तक देवी दुर्गा की प्रतिमा को जेवरों और महंगे परिधानों से काफी सुन्दर तरीके से सजाया जाता है। उस समय पूजा की पूरी जिम्मेदारी इस परिवार के कुल पुरोहित की होती है। गौरतलब है कि पिछले 150 सालों से पुरोहित का परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस मंदिर में देवी मां की सेवा में लगा हुआ है।

यहां तक कि मंदिर में पुजारी के परिवार के सबसे छोटे सदस्य को भी देवी मां की पूजा के सभी मंत्र व पूजा के तौर-तरीके सीखा दिये गये हैं। चैत्र नवरात्रि में दशमी के दिन सुखे पुआल से रावण की प्रतिकृति तैयार कर उसका दहन भी किया जाता है, ठीक उसी प्रकार जैसे सितंबर-अक्टूबर में होने वाली दुर्गापूजा के समय दशमी के दिन किया जाता है।
क्यों मनायी जाती है दो नवरात्रि?
अब आपके मन में यह सवाल जरूर आया होगा कि हमारे देश में दो नवरात्रि क्यों मनायी जाती है। दरअसल, चैत्र नवरात्रि ही वह समय है जब देवी दुर्गा ने असुर महिषासुर का वध किया था। जबकि सितंबर-अक्टूबर में मनायी जाने वाली नवरात्रि की कहानी भगवान श्रीराम से जुड़ी हुई है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रावण का वध करने जाने से पहले श्रीराम ने देवी दुर्गा का आह्वान कर उनसे आर्शिवाद प्राप्त किया था।
जिसके बाद दशमी के दिन उन्होंने लंकेश रावण का वध किया। इसके प्रतिक के रूप में ही आज भी रावण का पुतला पूरे देश में जलाया जाता है। बंगाल में सितंबर-अक्टूबर में होने वाली दुर्गापूजा को 'अकाल बोधन' कहा जाता है। बांग्ला में बोधन यानी देवी दुर्गा का पट खुलना।



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