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राजस्थान की इस मजार पर हर साल मन्‍नतें मांगने आते है हजारों आशिक

राजस्थान के श्रीगंगा नगर जिले अनूपगढ़ में लैला मजनू की मजार है,कहा जाता है कि, दोनों ने अपने जिन्दगी के कुछ आखिरी लम्हे पाकिस्तान बॉर्डर से दो किमी दूर राजस्थान की जमीन पर गुजारे थे।

By Goldi

जब भी बात प्यार के दीवानों की आती है, तो जहन में सबसे पहला जिक्र आता है लैला मजनू का। लैला मजनू की बेपनाह मोहब्बत के किस्से हम अक्सर सुनते हैं, कहा जाता है दुनिया को इनकी मोहब्बत पसंद नहीं थी, इन्हें जीतेजी तो एक दूसरे की मोहब्बत दुनिया वालों ने नसीब नही होने दी लेकिन मौत के बाद इन्हें एक दूसरे से कोई जुदा नहीं सका।

आप सोच रहे होंगे कि , आज ट्रेवल की साईट पर ट्रेवल गाइड की जगह लैला मजनू की प्रेम कहानी का बखान क्यों तो बता दें, लैला मजनू का नाता भारत से हैं। कहा जाता है कि, दोनों ने अपने जिन्दगी के कुछ आखिरी लम्हे पाकिस्तान बॉर्डर से दो किमी दूर राजस्थान की जमीन पर गुजारे थे।

दोनों की मौत के बाद उनकी याद में राजस्थान के श्रीगंगा नगर जिले 'लैला-मजनूं' की मजार का निर्माण किया गया । जहां हर वर्ष 15 जून महीने में मेला लगता है। हिंदुस्तान और पाकिस्तान से हर मजहब के लोग अनूपगढ़ तहसील के गांव बिंजोर में बनी इस मजार पर मन्नत मांगने आते हैं।

राजस्थान के इस प्रान्त में हुई थी मौत

राजस्थान के इस प्रान्त में हुई थी मौत

कहा जाता है कि, लैला-मजनूं सिंध प्रान्त के निवासी थे। उन दोनों की मौत यहीं पाकिस्तान बॉर्डर से महज 2 किमी की दूर राजस्थान के गंगानगर जिले अनूपगढ़ में हुई थी।

नहीं पता कैसे हुई मृत्यु

नहीं पता कैसे हुई मृत्यु

लैला मजनू की मौत कैसे हुई ये किसी कोई नहीं पता, लेकिन कहा जाता है कि, जब लैला के भाई को दोनों की मोहब्बत की खबर लगी तो उसने क्रूरता पूर्वक मजनूं को मौत के घाट उतार दिया। जैसे ही मजनूं की मौत की खबर लैला को हुई तो वह दौड़ती हुई मजनूं के शव के पास पहुंची और उसने भी वहीं अपनी जान दे दी।

एक और कहानी

एक और कहानी

लैला मजनू को लेकर एक और कहानी यह है कि, कहा जाता है कि, लैला मजनू को अलग करने के लिए लैला की शादी किसी और से करा दी गयी थी, शादी के बाद वह अपने पति के साथ ईराक चली गयी। मजनू इस गम में पागल हो गया और उसने पागलपन में कई कविताएं लिख डाली। इराक में ही लैला की तबियत खराब हो गयी और फिर उसकी मौत की खबर आई जिसे बाद लैला की कब्र के पास ही मजनू की लाश बरामद हुई। मरते हुए मजनू ने अपनी कविता के तीन चरण यहीं एक चट्टान पर लिख रखे थे। जो उसका लैला के नाम आखिरी पैगाम था।

15 जून को लगता है मेला

15 जून को लगता है मेला

हर साल 15 जून को लैला-मजनू की मज़ार पर दो दिवसयी मेला आयोजित होता है, जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के प्रेमी और नवविवाहित जोड़े आते हैं और अपने सफल वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं।

पवित्र मज़ार प्रेम

पवित्र मज़ार प्रेम

खास बात यह है कि मेले में सिर्फ़ हिंदू या मुस्लिम ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में सिख और ईसाई भी शरीक होते हैं। यह पवित्र मज़ार प्रेम करने वालों के लिए बेहद ख़ास है।

बॉर्डर पर भी बनाई है 'मजनू पोस्ट'

बॉर्डर पर भी बनाई है 'मजनू पोस्ट'

इन महान प्रेमियों को भारतीय सेना ने भी सम्मान देते हुए भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित एक पोस्ट को बीएसएफ की ‘मजनू पोस्ट' नाम दिया है। कारगिल युद्ध से पहले मज़ार पर आने के लिए पाकिस्तान से खुला रास्ता था, लेकिन इसके बाद आतंकी घुसपैठ के चलते अब इसे बंद कर दिया गया है।

 कौन थे लैला-मजनूं

कौन थे लैला-मजनूं

अगर आप लैला मजनूं के नाम से वाकिफ नहीं है तो बता दें, लैला-मजनूं की प्रेम कहानी उस दौर की है, जब प्रेम को एक सामाजिक बुराई की तरह देखा जाता था। अरबपति शाह अमारी के बेटे कैस (मजनूं) और लैला नाम की लड़की के बीच मरते दम तक प्यार चला और आखिर इसका अंत दुखद हुआ। दोनों के अम्र प्रेम के चलते दोनों को हमेशा के लिए 'लैला-मजनूं' के रूप में ही पुकारे गए।

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