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इस मां को देते हैं धोनी अपनी सफलता का श्रेय, हर मुश्किल में मां दिउड़ी देती हैं धोनी का साथ!

By Goldi

भारत मन्दिरों का देश कहा जाता है, यहां आप हर दो कदम पर मंदिर को देख सकते हैं। हर मंदिर की अपनी कहानी, प्राथमिकता और इतिहास है, जो श्रधालुयों को अपनी ओर आकर्षित करता है। रंक हो या राजा हर कोई भगवान के शरण में अपने शीश नवाता है, और उनका आशीर्वाद लेता है।

आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां खुद कैप्टन कूल यानी महेंद्र सिंह धोनी अपना सिर झुकाते हैं, उनका मानना है कि, अगर वह आज जो कुछ भी हैं, तो मां दिउड़ी के आशीर्वाद से ही हैं। इस मंदिर में सिर्फ धोनी का परिवार ही नहीं बल्कि भारतीय टीम के गब्बर यानी शिखर धवन भी अपनी पत्नी के साथ देवी का आशीर्वाद लेने पहुंचते रहते हैं।

कहां स्थित है मां दिउड़ी का मंदिर?

कहां स्थित है मां दिउड़ी का मंदिर?

मां दिउड़ी का मंदिर रांची से करीब 60 किलोमीटर दूर रांची-टाटा हाइवे पर तमाड़ में स्थित है, जो आज देश विदेशों में प्रसिद्ध है। हालंकि यह मंदिर पहले खासा प्रसिद्ध नहीं था, लेकिन जब बार बार कैप्टन धोनी बार बार माता दिउड़ी में अपनी हाजरी लगाने पहुंचे तो तह मंदिर स्थानीय लोगों के बीच ही नहीं बल्कि विश्व विख्यात हो गया।

वर्ल्ड कप से पहले धोनी ने मांगी थी जीत की दुआ

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ऐसा माना जाता है कि धोनी किसी सीरीज के शुरू होने से पहले यहां जाते हैं। जीवन का अच्छा दौर हो या बुरा, धोनी कभी भी अपनी 'सोलहभुजी देवी' मां के दर्शन करना नहीं भूलते हैं। बताया जाता है कि, साल 2011 में वल्र्ड कप में जीत की दुआ मांगने और जीत मिलने के बाद आभार जताने के लिए धोनी अपनी पत्नी साक्षी के साथ मां दिउड़ी को धन्यवाद करने पहुंचे थे। इसके अलावा दिसंबर 2009 में अपने कॅरियर के शानदार पांच साल पूरे होने पर धौनी ने यहां विशेष पूजा भी की थी।

मां दिउड़ी का मंदिर

मां दिउड़ी का मंदिर

Pc: TribhuwanKumar

मां दिउड़ी के मंदिर में देवी काली की मूर्ति करीबन करीब साढ़े तीन फुट ऊंची देवी 16 भुजाओं वाली हैं। इस मंदिर में स्थापित देवी मां की मूर्ति ओडिसा की मूर्ति शैली जैसी है। इस मंदिर की स्थापना के बारे में बताया जाता है कि, इस मंदिर की स्थापना पूर्व मध्यकाल में तकरीबन 1300 ई. में सिंहभूम के मुंडा राजा केरा ने युद्ध में परास्त होकर लौटते समय की थी। कहा जाता है कि, देवी ने सपने में आकर राजा केरा को मंदिर स्थापना करने का आदेश दिया था, मंदिर की स्थापना होते ही राजा को उनका राज्य दोबारा प्राप्त हो गया था।

 आदिवासी और हिन्दू संस्कृति का संगम

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इस मंदिर को आदिवासी और हिन्दू संस्कृति का संगम कहा जाता है, क्योंकि इस मंदिर के पुजारी पाहन होते हैं, जो हफ्ते में छ: दिन माता की पूजा अर्चना करते हैं, सिर्फ मंगलवार को ब्राहमण देवी मां की पूजा अर्चा करते हैं।

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कोई नहीं बदल सका मंदिर की सरंचना

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नवरात्री में उमड़ता है भक्तों का सैलाब

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इस मंदिर में हिंदुयों के प्रमुख त्यौहार मनाये जाते हैं, नवरात्री के ख़ास पर्व पर इस मंदिर में श्रधालुयों का हुजूम उमड़ता है, बताया जाता है कि, नवरात्री के मौके पर इस मंदिर में करीबन 20-30 हजार भक्त माता का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं।

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