Search
  • Follow NativePlanet
Share
» »रावण की चाहत रह गयी अधुरी और देवघर में बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग बन स्थापित हुए महादेव

रावण की चाहत रह गयी अधुरी और देवघर में बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग बन स्थापित हुए महादेव

जल्द ही पवित्र श्रावण का महीना शुरू होने वाला है। इसके साथ देशभर में भगवान भोलेनाथ के विभिन्न मंदिरों के बाहर भक्तों की लंबी कतारें लग जाएंगी। सड़कों पर हर तरफ महादेव का जयघोष करते कांवड़िये नजर आने लगेंगे। बिहार और झारखंड में श्रावण के महीने में कांवड़ लेकर भक्त देवघर जाते हैं, जिसे बाबा धाम के नाम से भी जाना जाता है।

baidyanath dham

झारखंड में स्थित देवघर में भगवान शिव माता पार्वती के साथ बाबा बैद्यनाथ के रूप में स्थापित हैं, जो 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। क्या आप जानते हैं, बैद्यनाथ धाम में महादेव की स्थापना के साथ लंकापति रावण का गहरा संबंध है? रावण की कौन सी इच्छा अधूरी रह गयी जिसके कारण देवघर में भगवान शिव सदा के लिए ज्योतिर्लिंग रूप में स्थापित हो गये? क्या होता अगर रावण की इच्छा पूरी हो जाती? और आखिर क्यों दशानन रावण की इच्छा अधूरी रह गयी?

आइए आपके इन्हीं सवालों का आसान शब्दों में जवाब ढूंढते हैं :

श्रावण का है विशेष महत्व

इस साल 4 जुलाई से श्रावण का महीना शुरू हो रहा है जो 11 सितंबर के आसपास तक चलेगा। इस साल मलमास या अधिमास होने के कारण शिवभक्तों को भगवान शिव की पूजा करने के लिए पूरे 2 महीने का समय मिलेगा। बैद्यनाथ धाम आने वाले भक्तों के लिए तो साल के 12 महीने ही खास होते हैं, लेकिन भगवान शिव के भक्तों के लिए श्रावण का महीना काफी विशेष महत्व रखता है।

Baidyanath Dham

श्रावण माह में कंधे पर कांवड़ रखकर भगवान शिव का नाम लेते हुए भक्त पहले सुल्तानगंज पहुंते हैं। वहां उत्तरमुखी गंगा से अपने-अपने कलश में गंगाजल भरने के बाद 105 किमी दूर बैद्यनाथ धाम की तरफ निकल पड़ते हैं। सुल्तानगंज से बैद्यनाथ या बाबा धाम के 105 किमी का यह सफर कांवड़िए पैदल ही तय करते हैं। इस दौरान कांवड़िए खास तौर पर गेरुआ रंग के वस्त्र धारण करते हैं।

दो तरह के होते हैं कांवड़िए

सुल्तानगंज से बाबा धाम जाने वाले कांवड़िए दो प्रकार के होते हैं। पहले आम कांवड़िए और दूसरे प्रकार के कावंड़ियों को डाक बम कहा जाता है। आम कांवड़िए 105 किमी का यह रास्ता धीरे-धीरे और थोड़ी-थोड़ी दूर पर आराम करते हुए आगे बढ़ते हैं। चुंकि गंगा से जल भर लेने के बाद कावड़िए अपना कांवड़ कहीं उतार नहीं सकते, इसलिए पूरे रास्ते में उनके कांवड़ों को रखने के लिए लकड़ी और बांस से बने विशेष स्टैंड का इंतजाम स्थानीय लोगों द्वारा ही किया जाता है।

kanwariya

डाक बम उन कांवड़ियों को कहा जाता है जिन्हें यह दूरी बिना रुके, बिना अपना कांवड़ कंधे से कहीं उतारे 24 घंटों के अंदर पूरी करनी होती है। इसलिए रास्ते भर में डाक बम को विशेष सुविधाएं और प्राथमिकताएं प्रदान की जाती है।

रावण की अधुरी चाहत

रावण ने दी अपने सिरों की आहूति
लंकापति रावण भगवान शिव का परम भक्त था। इसलिए एक बार उन्हें अपने साथ लंका ले जाने के उद्देश्य से वह कैलाश पर गया। वहां रावण ने भगवान की कठोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न करने के लिए यज्ञ में एक-एक कर अपने 9 सिरों की आहूति दे दी। जब वह अपना 10वां सिर काटने ही वाला था, तभी भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने रावण से उसकी इच्छा पूछी।

ravan

रावण ने अपने मन की इच्छा उन्हें बतायी। भगवान शिव ने भी रावण के साथ जाने के लिए हामी भरते हुए अपना ज्योतिर्लिंग स्वरूप रावण को दिया और एक शर्त रखी। भगवान शिव ने रावण से कहा कि वह इस शिवलिंग को जमीन पर जहां भी रखेगा भगवान शिव वहीं स्थापित हो जाएंगे। रावण भी खुशी-खुशी भगवान शिव की शर्त मानकर उनका ज्योतिर्लिंग स्वरूप लेकर लंका की ओर चल पड़ा।

रावण की लघुशंका
रावण को इस प्रकार भगवान शिव को अपने साथ ले जाता देख देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उसे रोकने की विनती की। तब मां गंगा रावण के उदर (पेट) में प्रवेश कर गयी और रावण को लघुशंका जाने की तीव्र इच्छा हुई। लेकिन भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग स्वरूप लेकर वह लघुशंका के लिए नहीं जा सकता था, क्योंकि यह भगवान का अपमान होता। रावण इसी पशोपेश में था ही कि वहां भगवान विष्णु एक छोटे बालक के रूप में पहुंचे।

ravan

रावण भगवान विष्णु को शिवलिंग पकड़ा कर लघुशंका का निदान करने चला गया। काफी देर तक जब रावण वापस नहीं लौटा तो भगवान विष्णु ने कई बार उसे आवाज लगायी और गुस्सा होकर शिवलिंग को वहीं जमीन पर रख कर चले गये। उनके जाते ही मां गंगा भी रावण के पेट से बाहर आ गयी। रावण जब वापस लौटा तो उसने शिवलिंग को उठाने की काफी कोशिशें की लेकिन महादेव के शर्त के अनुसार वह वहीं स्थापित हो गया।

रावण के मूत्र का तालाब
शिवलिंग को उठाने में नाकाम होने पर रावण को तेज गुस्सा आया और उसने शिवलिंग पर जोर से मारा। इससे शिवलिंग जमीन में और भी नीचे धंस गया। वहीं शिवलिंग आज देवघर में बाबा बैद्यनाथ के नाम से स्थापित है। रावण अपनी लघुशंका का निवारण करने जहां गया था, वहां उसके मूत्र से एक तालाब का निर्माण हो गया। देवघर के पास ही वह तालाब भी स्थित है।

बाबा धाम की खासियत है कि यहां भगवान शिव को प्रसाद में कागज से भी पतला चिवड़ा, चीनी से बना दाना और खास पेड़ा चढ़ाया जाता है। भगवान शिव के मंदिर के बगल में ही मां पार्वती का भी मंदिर है। दोनों मंदिरों के शिखर को गठबंधन से बांध कर रखा जाता है।

FAQs
बाबा धाम कब जाना चाहिए?

बाबा धाम में साल के 12 महीने जा सकते हैं लेकिन श्रावण महीना यहां जाने के लिए काफी खास होता है। बैद्यनाथ धाम में हर साल श्रावण महीने में विशाल श्रावणी मेला लगता है। यह मेला जुलाई-अगस्त में शुरू होता है।

क्या बाबा धाम और बैद्यनाथ धाम एक है?

हां, बाबा धाम और बैद्यनाथ धाम एक ही है। यह झारखंड राज्य के देवघर में स्थित है। यह स्थान 12 ज्योतिर्लिंगों में एक है, जहां श्रावण महीने में लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना करने पहुंचते हैं।

बैद्यनाथ धाम से होकर कौन सी नदी बहती है?

बैद्यनाथ धाम झारखंड के देवघर में स्थित है। बैद्यनाथ धाम से होकर गंगा नदी बहती है। कांवड़िए पवित्र गंगाजल अपने कांवड़ में भरकर 100 किमी दूर बैद्यनाथ धाम की तरफ पैदल बढ़ते हैं।

NativePlanet Travel

More News

    Read more about: jharkhand bihar deoghar tourism
    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+