मुगल शासकों के बारे में अक्सर लोग यहीं सोचते हैं कि वे हमेशा शराब के नशे में चूर रहते थे। दिनभर जमकर माँसाहार का सेवन कर रात को हरम में बांदियों के बीच अपना जीवन बड़े ही शानदार तरीके से बिताते थे। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मुगलकाल में सिर्फ हिंदू धर्म को मानने वाले ही नहीं बल्कि कई मुगल शासकों ने भी सप्ताह में कई दिन माँसाहार खाना बंद कर दिया था।

कुछ शासकों ने तो शराब की सोने-चांदी से बने प्यालों को तुड़वाकर उन्हें प्रजा में बंटवा भी दिया था। अगर खाने-पीने की आदतों पर ध्यान दिया जाए तो इतना लंबा समय बीतने के बावजूद मुगलकाल और आज के समय में खाने-पीने की हमारी आदतों में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है।
पूर्वांचल विश्वविद्यालय में डॉ. हितेंद्र प्रताप सिंह के सानिध्य में शोध करने वाले इतिहास के स्कॉलर मितेंद्र यादव ने मुगलकाल में बादशाह से लेकर उसकी प्रजा तक के खान-पान की आदतों का वर्णन कुछ यूं किया है :-
मुगल शासक जो सप्ताह के खास दिन नहीं खाते थे माँस
फिल्मों में जब भी मुगल शासकों के खाने-पीने के सीन होते हैं उनकी बड़ी सी थाली में माँसाहारी खाने के कई आइटम नजर आते हैं। लेकिन असलियत इससे थोड़ी अलग थी। शोध के मुताबिक मुगलकाल में कुछ शासकों ने मांसाहार पर रोक लगा दिया था। हुमायूँ ने कुछ समय के लिये मांस खाना छोड़ दिया था। वहीं सम्राट अकबर, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनपर हिंदू धर्म का गहरा प्रभाव था, ने रविवार को पशु-वध पर रोक लगा दिया था। अकबर प्रत्येक शुक्रवार तथा रविवार को स्वयं भी माँस का सेवन नहीं किया करता था।

इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूँनी तो लिखते हैं कि अकबर ने सिर्फ मांस खाना ही नहीं, वरन् लहसुन और प्याज खाना छोड़ दिया था। अकबर के पश्चात् उनके बेटे जहाँगीर (सलीम) ने उन दिनों में बृहस्पतिवार को भी जोड़ दिया था। यानी अकबर से लेकर जहांगीर तक के शासनकाल में लोग बृहस्पतिवार, शुक्रवार और रविवार को माँस का सेवन नहीं करते थे।
कैसा खाना खाती थी जनता
मुगलकाल में आमतौर पर मुसलमान और हिंदू जनता के खान-पान की आदतें लगभग एक जैसी ही थी। उनमें सिर्फ माँस खाने का फर्क होता था। मुसलमान भोजन में गेहूँ तथा जौ की बनी हुई 'चपातियों' खाया करते थे। इसके अतिरिक्त 'रोशनी' (एक प्रकार की रोटी जो घी द्वारा बनाई जाती थी) का भी सेवन किया जाता था। बंगाल तथा गुजरात में लोग चावल खाना अधिक पसंद करते थे।

मुसलमान विभिन्न पशु एवं पक्षियों के माँस को विभिन्न प्रकार से पकाते थे। मुसलमानों के भोजन में कबाब, जुबिरयान, कीमा पुलाव तथा मीठे में हलवा और फालूदा मुख्य हुआ करता था। इनके रसोईघर में कोई छुआछूत नहीं थी। सभी लोग एक ही 'दस्तरख्वान' यानी वह कपड़ा जिसपर भोजन लगाया जाता है, पर बैठकर भोजन किया करते थे। वहीं बात अगर हिन्दूओं के खाने-पीने की आदतों की करें तो वे सामान्यतः शाकाहारी ही हुआ करते थे। सिर्फ पंजाब, बंगाल के लोग और राजपूत माँस का सेवन किया करते थे।
उच्च तथा मध्यम वर्ग के लोग गेहूँ और चावल खाते थे। ये लोग विशेष अवसरों पर पूड़ी, कचौड़ी तथा लूची पकाकर बड़े ही चाव से उनका सेवन किया करते थे। आम लोगों में खिचड़ी खाने का प्रचलन काफी ज्यादा था। आज के समय की तरह ही मुगलकाल में भी लोग तश्तरियों (प्लेट) तथा चम्मच का इस्तेमाल किया करते थे।
कोई शराब में डूबा रहा तो किसी ने पानी की तरह बहा दिया

मध्यकालीन भारतीय समाज में मादक वस्तुओं के सेवन का भी प्रचलन था। शराब विभिन्न वस्तुओं (अंगूर, ताड़ी, खजूर तथा महुआ) से तैयार की जाती थी। हिन्दू और मुस्लिम सभी इसका सेवन किया करते थे। एक बार सुल्तान अलाउद्दीन खलजी ने दिल्ली की सभी दुकानों से शराब फेंकवा दिया था। एक समकालीन इतिहासकार ने इस वाक्ये के बारे में लिखा है कि दिल्ली की सड़कों पर शराब इस प्रकार बह रही थी जैसे कि बारिश का पानी बह रहा हो।
अकबर ने भी शराबखोरी रोकने का प्रयास किया था। उसने शराबखोरी के कारण बहुत से लोगों को दण्डित भी किया था। लेकिन अकबर के पिता बाबर और उसका बेटा जहाँगीर शराब में डूबा रहता था। बादशाह बाबर तो शराब को 'अर्क' (पूजा करने योग्य) कहा करता था। वहीं जहाँगीर ने शराब में ही अपना दम (सांस) तोड़ दिया था। अपनी आत्मकथा में जहाँगीर लिखता है, "पहले मैं पैंतालिस (45) तोला पीता था, किन्तु अब मैं साढ़े सैंतिस (37.5) तोला ही पीता हूँ।"
लेकिन जहाँगीर के बेटे शाहजहाँ ने जब अपने परदादा बाबर की तरह दक्षिण पर चढ़ाई की तो उसने चम्बल में शराब फेंकवा कर सोने तथा चाँदी से बने शराब के प्यालों को तुड़वाकर दीन-दुखियों में बंटवा दिया था। औरंगज़ेब, जिसकी बुरी आदतों से हमारे इतिहास की किताबें भरी हुई हैं। लेकिन इस शोध के मुताबिक औरंगज़ेब ने आलमगीर ने भी मद्य निषेध घोषित कर दिया था। किन्तु आलमगीर का प्रधानमंत्री उम्दत-उल-मुल्क जाफर खाँ शराब का सेवन किया करता था और उसका विचार था कि शराब के द्वारा ही उसको प्रधानमंत्री के पद पर कार्य करने की शक्ति एवं क्षमता प्राप्त होती है। औरंगज़ेब ने उसको इसके लिये चेतावनी भी दी थी।
क्या आपको अनारकली के बारे में पता है। जी हां, वहीं अनारकली जिसे इतिहास में अकबर के बेटे शहजादा सलीम की माशुका के तौर पर पहचान मिली हुई है। लेकिन क्या आप जानते हैं, अनारकली का असली नाम क्या था या वह किस देश से आयी थी? कैसे वह शहज़ादा सलीम के संपर्क में आयी थी? शहज़ादा सलीम या फिर बुढ़े बादशाह अकबर, किसका दिल बहलाती थी अनारकली? इन सभी सवालों का जवाब पाने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लीक करें।
क्या आपने कभी सोचा है कि मुगलकाल में कौन से खेलों का सबसे अधिक प्रचलन था? अगर आप शतरंज के बारे में सोच रहे हैं तो आप गलत हैं। हां, मुगलकाल के सबसे अधिक लोकप्रिय खेलों में शतरंज जरूर शामिल था लेकिन मुगल बादशाह को शतरंज की बिसात पर घोड़े की टेढ़ी चाल के बजाए ताश के पत्तों में खो जाना अधिक पसंद होता था। अगली बार हम आपको बताएंगे कि भारत में ताश के खेल का प्रचलन का श्रेय सबसे अधिक किस मुगल बादशाह को जाता है।



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