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कौन थी वह हुस्न की मलिका जिसका नाम था 'अनारकली', क्या सच थी फिल्म 'मुगल-ए-आज़म' की कहानी?

लाहौर में इरावती नदी के किनारे अनारकली बाजार से थोड़ी ही दूरी पर आठ दीवारों से घिरा एक उदास मकबरा है। उसके संगमरमर की दीवार पर अरबी लिपि में दो पंक्तियां लिखी हुई हैं- "अगर मैं और एक बार अपनी माशूका को देख पाता तो मेरे खुदा, मैं अपनी मौत के दिन तक तुम्हारा अहसानमन्द रहता।" उसके नीचे एक नाम लिखा है- 'प्रेमपुजारी सलीम'। जी हां, हिंदूस्तान के तख्त पर एक समय राज करने वाले बादशाह अकबर और महारानी जोधाबाई का बेटा शहजादा सलीम!

history of anarkali

यहां जो कब्र है, उसमें उस लड़की की लाश दफन है, जिसे अकबर के हुक्म से जिंदा ही चुनवा दिया गया था। बादशाह के हुक्म की परवाह न करके उसने शहजादे सलीम से प्यार जो किया था। इतिहास में इस लड़की का नाम बतौर अनारकली दर्ज है। लेकिन अनारकली थी कौन? कहां से आयी थी वह? खुद आयी थी, लायी गयी थी या फिर तोहफे में भेजी गयी थी? क्या था उसका असली नाम?

अनारकली पर पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय में डॉ. हितेंद्र प्रताप सिंह के सानिध्‍य में शोध करने वाले इतिहास के स्कॉलर मितेंद्र यादव ने उस हुस्न की मलिका के इतिहास के बारे में कुछ यूं वर्णन किया है :-

क्या सलीम की बीवी थी वह सुन्दरी

कुछ लोगों का कहना था, उस सुन्दरी का नाम 'शरीफुन्निसा' था। वह अफगान सुल्तान घराने की लड़की थी। बादशाह अकबर एक बार वहाँ घूमने गये थे। उनके साथ उनका पुत्र सलीम भी था। शरीफुन्निसा की हुस्न पर दीवाने होकर सलीम ने उसका हाथ मांगा था। बादशाह ने भी इजाजत दे दी थीं। सहमति मिलते ही बड़े ताम-झाम से दोनों की शादी हो गयी थी। सलीम अपनी नयी दुल्हन के साथ लाहौर लौट आया था। शरीफुन्निसा के हुस्न ने उसे शायर बना दिया था। सलीम ने बड़े ही प्यार से अपनी बीवी का नाम रखा था 'अनारकली', लेकिन नूरजहाँ की तरह वह कली पूर्ण रूप में खिल नहीं पायी थी। असमय मुर्झा गयी थी। उसके जाने के गम में शहजादा बहुत रोये भी थे। उसके बाद यह मकबरा बनवाया गया था।

किसी ने कहा कहानी सच लेकिन परिचय गलत

अनारकली की कहानी के बारे में कई लोगों का कहना है कि कहानी तो सच है, मगर शहजादी का परिचय सच नहीं है। उनका कहना है कि वह मकबरा जिस सुन्दरी को अपनी कब्र में दफनाये हुए है वह अफगानिस्तान की रहने वाली नहीं थी। उसका नाम 'साहिब जमाल' था। वह आगरा के किसी दरबारी की बेटी थी। उस सुन्दरी ने किसी मीना बाजार में शहज़ादे सलीम का दिल जीत लिया था। मेला ख़त्म होते ही सलीम ने उसके पिता से उसका हाथ मांगा था। अब भला किसी उमराव में इतनी हिम्मत कहाँ थी कि बादशाह के बेटे की मांग को वो ठुकरा दे। लेकिन वे यह भी जानते थे कि बादशाह को राजी करना सहज नहीं होगा।

she was anarkali

इसलिए उन्होंने सबसे छिपकर शहजादे सलीम को अपनी बेटी सौंप दी। वहीं किशोरी उस कब्र में लेटी हुई है। उसका नाम अनारकली नहीं बल्कि 'मलका-ए-औलिया-साहब-ए-ज़माल' था। लेकिन उस जमाने के एक विदेशी पर्यटक विलियम फिंक का कहना है, "इस कहानी में सच्चाई नहीं है।" फिंक का दावा था कि जिन 12 मजदूरों ने इस कब्र की खुदाई की थी, उन्हीं लोगों से मुझे उस लड़की के बारे में जानकारी मिली है। अनारकली अफगानिस्तान की ही रहने वाली थी। लेकिन वह किसी सुल्तान के घराने से नहीं बल्कि एक गरीब घर की थी। उसका नाम नादिरा था।

क्या वह तोहफे में आयी अफगानी महल की मामूली बांदी थी

बकौल विदेशी पर्यटक विलियम फिंक, अनारकली कोई शहजादी नहीं थी। वह तो अफगानी महल में एक मामूली बांदी और दरबार की नर्तकी थी। अकबर जब अफगानिस्तान गये थे, वह लड़की बादशाह को भा गयी थी। बादशाह ने उसके नृत्य की तारीफ की थी और उसके हुस्न की भी। बादशाह के पास ही बैठे थे अफगान शासक और नादिरा के मालिक। हिन्दुस्तान के बादशाह की लोभी नजरें उनसे कहां छुपी रहीं। वापसी के दिन अकबर यह देखकर चकित हो गये थे उनको दिये गये तोहफों में दूसरे बहुमूल्य उपहारों के साथ वह लड़की भी शामिल थी। स्वदेश लौटकर बादशाह ने प्यार से उस नर्तकी का नाम अनारकली रखा था।

बूढ़ा बादशाह अनारकली का दीवाना हो गया था। वह अपने नृत्य-संगीत से बादशाह की थकान मिटाती थी। इससे राज्य को चलाने में बादशाह को ऊर्जा मिलती रहती थी। लेकिन अनारकली के दीवानों की लाइन में एक नाम बुढ़े बादशाह के जवान बेटे का भी था। अनारकली की जिन्दगी में एक और प्रेमी आया। शहजादा सलीम- हिन्दुस्तान के होने वाले बादशाह। उस दिन भी बादशाह के कक्ष की नृत्य सभा में अनारकली जमकर नाची थी। अपने नखरों से बुढ़े बादशाह को रिझायी भी थी। नृत्य सभा खत्म होने के बाद लौटते समय उस नर्तकी ने अपने पांव से घुँघरू खोलकर हाथ में ले लिया था। उसके बाद खामोशी से बगीचे के एकान्त कोने में चली गयी थी।

बादशाह ने शहजादे के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया

शहजादा सलीम बगीचे में जहां अपनी प्रेमिका अनारकली का इंतजार कर रहा था, वहां काफी घने पेड़-पौधे थे। फिर तो बांदी और युवराज एक दूसरे से घुल मिल गये। धीरे-धीरे यह बात चारों तरफ फैल गयी। एक बार उस लड़की को बादशाह ने रंगे हाथो शहजादे के साथ पकड़ लिया। शीशमहल में नृत्य सभा के दौरान की दीवारों पर लगे आइने में बादशाह को उस नर्तकी की आंखों में वासना की आग नजर आयीं। उस वक्त आवेग से उसके होठ काँप रहे थे। बादशाह की नजर शीशे में एक और चेहरे पर पड़ी। यह था सलीम का मुस्कुराता चेहरा। उसकी आंखों में भी प्रेम की लौ थी। बादशाह को पता था कि जवानी क्या चीज होती है। उन्हें पता था कि यह सब किस चीज के लक्षण हैं। बादशाह ने इसे अपने साथ हुआ धोखा माना। इस बीच और भी कई घटनाएं घटी। अकबर उस धोखेबाज रक्कासा को माफ नहीं कर पाये। उन्होंने हुक्म दिया, इस कनीज को जिन्दा दफना दिया जाये। एक असहाय किशोरी के चारों तरफ आठ दीवारों का मकबरा खड़ा कर दिया गया। उस कनीज़ को, जो हिन्दुस्तान के हरम में भेंट के रूप में आयी थी, उसे उस मकबरे में जिंदा चुनवा दिया गया था।

हिंदुस्तान में दूसरे तरीकों से भी सुन्दरियाँ आती थीं, जैसे लखनऊ की बेगम मुगाछारी औलिया। हरम में पहुँचने की उनकी कहानी कम दिलचस्प नहीं है- बेगम औलिया हिन्दुस्तानी नहीं बल्कि एक अंग्रेज की बेटी थी। उसका असली नाम मिस वाल्टर्स था। वह जार्ज हॉपकिन वाल्टर नामक सैनिक की बेटी थीं। उसकी माँ लखनऊ के किसी अंग्रेज व्यापारी की विधवा थी। वह भी अंग्रेज थी। दो-दो बेटियों के साथ वह अपने नये पति वाल्टर के घर आ गयी थी। औलिया उनकी छोटी बेटी थी ।

इससे पहले हमने आपको दिल्ली के मीना बाज़ार की Origin के बारे में बताया था। उस आर्टिकल में हमने आपको मुगलों के कई कड़वे सच से रू-ब-रू तो करवाया ही था, साथ में यह भी बताया था कि मीना बाज़ार असल में क्या था? शाहजहाँ की बेगम मुमताज महल, जिसके लिए शाहजहाँ ने ताजमहल खड़ा कर दिया था, वह भी इसी मीना बाज़ार की ही देन थी। अगर आपने अभी तक नहीं पढ़ा है तो नीचे दिये गये लिंक पर क्लीक कर, उसे जल्दी पढ़ ले।

हमें पूरी उम्मीद है कि पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय में हुए शोध के आधार पर लिखे गये इन आर्टिकल को पढ़कर आपको समझ में जरूर आ गया होगा कि स्कूल और कॉलेज की किताबों में मुगलों का जो इतिहास हमें पढ़ाया और समझाया जाता है, उससे परे भी काफी कुछ है जो इतिहास के पन्नों में कहीं दफन है। जिस तरह मुमताज महल एक बांदी के तौर पर मुगल हरम में लायी गयी और मुगल बादशाह के 14वें बच्चे को जन्म देते समय प्रसव पीड़ा से तड़पकर महज 38 साल की उम्र में उसने अपनी जान दे दी, लेकिन उसकी कब्र को मोहब्बत की निशानी बना दिया गया। ठीक उसी तरह नुरजहाँ भी हरम में लायी गयी एक बांदी ही थी। क्या आप जानते हैं नुरजहाँ और अनारकली का आपस में क्या रिश्ता था? खैर नुहजहाँ के इतिहास और उसकी कहानी के बारे में हम फिर कभी आपको बताएंगे।

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