दिल्ली के मीना बाज़ार के बारे में आपने जरूर सुना होगा, लेकिन जो लोग गए होंगे उन्होंने वहां पर जमकर खरीददारी भी की होगी, लेकिन क्या आप जानते हैं मीना बाज़ार की उत्पत्ति कैसे हुई। आज के समय में यह एक आम बाज़ार की तरह है, लेकिन जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब यह अपने आप में एक खास बाज़ार हुआ करता था, जो केवल मुगल बादशाह के हरम में रहने वाली औरतों के लिए विशेष रूप से सजता था।

वर्तमान में देश के हर मीना बाज़ार में लेडीज़ ड्रेस, कुर्ती, लहंगा चुनरी, हार, बिंदी, चूड़ी, आदि सब मिलता है, जब इसकी शुरुआत हुई थी तब भी इसमें महिलाओं से जुड़े सामान मिलते थे। खरीददार महिलाएं होती थीं और सामान बेचने वाली भी महिलाएं। इस बाज़ार में केवल एक पुरुष को प्रवेश की इजाजत होती थी, वो मुगल बादशाह।
जी हां मीना बाज़ार की शुरुआत मुगल बादशाह अकबर ने की थी। इसका आयोजन उन पॉंच हज़ार महिलाओं के लिए किया जाता था, जो अकबर के हरम में रहती थीं। नौरोज के उपलक्ष्य में मुगल महल के आंगन में आठ दिनों तक चलने वला मीना बाजार लगता था। अकबर ने इसकी शुरूआत की थी। शाहजहाँ के समय भी सुन्दरता का हाट गर्म रहता था। उस मेले में एकमात्र सुन्दरियों को ही प्रवेश मिलता था और किसी को यहाँ आने का अधिकार नहीं था। पूरा हरम उस मेले में टूट पड़ता था, बांदी-बेगमें उस मेले में अपनी दुकान सजाकर बैठती थीं। बाहर की सुन्दरियां भी उस मेले में दुकान लगाती थीं।
नेटिवप्लैनेट की विशेष प्रस्तुति - ORIGIN
हरम से जुड़ी तमाम बातें हैं जो इतिहास में दफ्न हो गईं। उनमें से एक इतिहास मीना बाज़ार का भी है। नेटिव प्लैनेट की टीम ने जब देश के विश्वविद्यालयों में रखे रिसर्च खंगालने शुरू किए तब हरम से जुड़े इतिहास की कई सारी परतें खुलीं। वीबीएस पूर्वांचल विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में 2011 में हुए एक शोध के अनुसार हरम केवल महिलाओं के लिए कैदखाना नहीं था, जहां बादशाह आये और महिलाओं के साथ समय बिताते। सच पूछिए तो महिलाओं के लिए यह किसी जन्नत से कम नहीं थी।
एक और बात - जिस औरत पर बादशाह का दिल आ जाये तो समझ लीजिये उसकी किसमत चमक गई। इसका जीता जागता उदाहरण मुमताज़ महल थीं, जिन्हें तुर्की से लाकर हरम में रखा गया था। एक दिन मुगल बादशाह शाहजहॉं की नज़र उन पर पड़ी और वो उन पर फिदा हो गये। आगे चलकर उन्होंने मुमताज़ महल से शादी की और उनके निधन के बाद बीवी की याद में ताज महल बनवा डाला। लेकिन सच पूछिए तो मुमताज़ महल का जीवन कोई बहुत सारे सुखों से भरा नहीं था। 14 बच्चों को जन्म देने के बाद मात्र 38 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। चौदहवें बच्चे के जन्म के समय प्रसव पीड़ा को वो सहन नहीं कर सकीं और उनकी मृत्यु हो गई। खैर आइये वापस मीना बाज़ार पर लौटते हैं।

कुछ ऐसा होता था मीना बाज़ार का दृश्य
पूर्वांचल विश्वविद्यालय में डॉ. हितेंद्र प्रताप सिंह के सानिध्य में शोध करने वाले इतिहास के स्कॉलर मितेंद्र यादव ने कुछ इस प्रकार अपने शोध में मीना बाज़ार का वर्णन किया है-
नौरोज के उपलक्ष्य में मुगल महल के आंगन में आठ दिनों तक चलने वला मीना बाजार लगता था। अकबर ने इसकी शुरूआत की थी। शाहजहाँ के समय भी सुन्दरता का हाट गर्म रहता था । उस मेले में एकमात्र सुन्दरियों को ही प्रवेश मिलता था और किसी को यहाँ आने का अधिकार नहीं था। पूरा हरम उस मेले में टूट पड़ता था, बांदी-बेगमें उस मेले में अपनी दुकान सजाकर बैठती थीं। बाहर की सुन्दरियां भी उस मेले में दुकान लगाती थीं।
हरम की तरह इस मेले का मजा लेने वाला मुख्य पुरुष बादशाह ही होता था। तातारी औरतें उन्हें चारों तरफ से पहरेदार घेरे रहते थे। खरीददारी के बहाने बादशाह इशारों में अपनी इच्छा भी जता देते थे। शायद उसी रात को किसी खूबसूरत दुकानदारिद को बादशाह के आरामगाह से बुलावा मिल सकता था। किसी को अगले दिन भोर होते ही आंचल में मुहरें समेटकर लौटकर जाना पड़ता था। भाग्यशाली युवतियाँ स्वामी रूप से हरम की बासिन्दा बन जाती थीं और हसीनाओं के बीच चलने वाले मुकाबले में वे भी शामिल हो जातीं।
शुरुआत में पॉंच से सात हजार सुंदर महिलाओं को आमंत्रण मिलता था आगे चलकर उनकी संख्या तीस हजार तक पहुंच गई। जहां तीस हजार महिलाओं का शोर गूँजता था वहां का माहौल कैसा होता होगा, इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं।
तैयारी पूरी हो जाने के बाद सुल्तान वहां आते थे, वे छिपकर आते। उनके वहां आने की खबर मिलते ही लड़कियां उन्हें घेर लेतीं, जैसे मधुमक्खियों को फूलों का पता मिल गया हो। उस मेले के बारे में किसी ने लिखा है- "सबकी कोशिश रहती थी, दूसरों के मुकाबले वहीं सुल्तान की नजरों के सामने रहें। सभी सुल्तान से अपनी प्रशंसा सुनना चाहती थीं। अपनी आंखों से देखे बिना यकीन नहीं हो सकता कि मर्दों को भुलावे में डालने में वे सब कितनी चतुर थी।"

मेला खत्म होने के बाद गाना-बजाना, किस्सा, हंसी-मजाक का नाटक शुरू होता था। वह पूरी तरह से महिलाओं का ही त्यौहार होता था। सुल्तान अकेले दर्शक होते थे। वे अपने सिंहासन पर मजे से बैठे रहते थे। उनकी बगल में एक और सिंहासन होता था। वह खाली रहता था। उनकी नजर सभी के चेहरे पर घूमती रहती थी। अचानक किसी को देखकर वे एक खास अन्दाज की ताली बजाते थे। ताली बजते ही कनीज़ सुल्तान के पास जाती। सुल्तान उसके कान में कुछ कहते, फिर उसे रेशमी रुमाल थमा देते। कुछ भी क्षणों में वो लड़की सामने आकर खड़ी हो जाती, जिसकी ओर सुल्तान ने इशारा किया होता था। वही उस दिन की विजेता होती। सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार उसके हाथों में होता। सुल्तान को आदाब करके वह उस खाली सिंहासन पर बैठ जाती थी।
उस दौरान हर एक महिला उस हुस्न की परी को देखने के लिए सभी बेचैन रहती थी। सभी औरतें बारी-बारी से आकर उन दोनों के सामने सिर झुकातीं। फिर अपने कमरों में लौट जातीं। सभी कलाकारों को सुल्तान के हाथों से इनाम मिलता था। सबके चले जाने के बाद सुल्तान खड़े होकर प्रेम से हाथ विजेता लड़की को अपने साथ अपने महल में ले जाते। उन औरतों के बीच भले ही वो नाज़नीना विजेता होती हो, लेकिन सच पूछिए तो उसकी मजबूरी उसे वहां तक खींच कर लाती थी। क्योंकि विजेता बनने के बाद भी उन्हें बेगम का दर्जा नहीं मिलता था।
तुर्की से आया मीना बाज़ार
दरअसल मीना बाज़ार लगाने की शुरुआत भारत से पहले तुर्की में हुई थी। वहां इसका नाम था ट्यूलिप मेला। टयूलिप एक फूल होता है और एक मेला लगा कर सुल्तान के लिए पूरा औरत रूपी महिलाओं का पूरा बाग सजाया जाता था। जिस पर सुल्तान का दिल आ जाता बस उसी फूल को वो मेले से तोड़ लाता।

हर साल अप्रैल के महीने में महल के आंगन में यह मेला लगता था। 32 लड़कियाँ अपने हाथों से सालभर सुल्तान के लिए उपहार बनाती थीं । उत्सव के दिन अपनी डाली सजाकर मेले में ले आती थीं। रोशनी की चकाचौंध से वहां रात में भी दिन का उजाला रहता था। मेले के बीच में मंच पर सुल्तान को दिखाने के लिए सबके लाये हुए उपहार, उनकी ईजाद की हुई चीजें, उनकी कलाकारी सजाकर रखी जाती। सुल्तान को खुश 'करने के लिए वे सब इस मुकाबले में हिस्सा लेती थीं।

उम्मीद है इतिहास के पन्नों की इस छोटी सी झलक ने मुगलों के प्रति आपकी सोच में थोड़ा फर्क तो जरूर आया होगा। दरअसल हमारे देश की किताबों में मुगलों के केवल किलों और महलों के बारे में पढ़ाया गया। उनके निजि स्वार्थ और अत्याचार के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। अगर आपको इतिहास का यह पन्ना पसंद आया हो तो इसे शेयर करना मत भूलिएगा। अगली स्टोरी में हम आपको मिलवायेंगे अनारकली से। जी हां वही अनारकली के बारे में। वही अनारकली जिसके ऊपर बॉलीवुड फिल्म मुगल-ए-आज़म बनी। फिल्म में जो दिखाया गया वो कितना सच था, यह हम आपको बतायेंगे। और हां, यत तो पक्का है कि अगली बार जब आप मीना बाज़ार से सामान खरीदने जायेंगे तो मुगलों के मीना बाज़ार का यह दृश्य आपकी ऑंखों के सामने जरूर आयेगा।




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