हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में बसती हैं मिंधल माता, जिनके मंदिर पर पहुंचने का रास्ता बेहद दुर्गम होता है। लेकिन यहां की प्राकृतिक सुन्दरता ऐसी होती है कि पता ही नहीं यह रास्ता कब कट जाता है। मिंधल माता का मंदिर पंगी तहसिल में स्थित है जो मुख्यालय किल्लर से महज 25 किमी की दूरी पर है।

हिमाचल प्रदेश में सबसे कम घूमे जाने वाली जगहों में मिंधल माता का मंदिर आता है, इसलिए यहां लोगों की भीड़ भी काफी कम होती है।
आइए आपको मिंधल माता के मंदिर के बारे में विस्तार से बताते हैं :
सदियों पुराना है मिंधल माता का मंदिर

हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से गांव मिंधल में तंदी-किश्वर रोड पर स्थित मिंधल माता का मंदिर 5-10 साल नहीं बल्कि सदियों पुराना मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण कब और किसने करवाया था इस बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है लेकिन यह मंदिर इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को आज भी संभाले हुए है। स्थानीय लोगों में इस मंदिर के प्रति काफी आस्था है। मंदिर तक पहुंचने के लिए कोई पक्का रास्ता नहीं है, इसके बावजूद स्थानीय लोग यहां नियमित रूप से ना सिर्फ पूजा करने आते हैं बल्कि यहां वार्षिक मेला भी लगता है।
सिर्फ गर्मियों में खुलता है मंदिर

केदारनाथ, बद्रीनाथ की तरह ही मिंधल माता का मंदिर भी सिर्फ गर्मी के मौसम में ही खुलता है। सर्दियों में यह मंदिर बर्फ की मोटी चादर और पहाड़ों से नीचे आने वाले ग्लेसियरों की वजह से बंद रहता है। गर्मी के मौसम की शुरुआत में अगर आप इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं तो मंदिर के चारों तरफ आपको बर्फ नजर आएंगे। इस मंदिर की वास्तुकला ही आपको मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी है। मंदिर में उकेरी गयी जटिल नक्काशियां हिमाचल प्रदेश की समृद्ध कला का नेतृत्व करती है। मंदिर के द्वार और गर्भगृहों की भव्य साज-सज्जा मंदिर की सुन्दरता में चार चांद लगाते हैं।
मंदिर में है तीन गर्भगृह
मिंधल माता का मंदिर संपूर्ण रूप से लकड़ी का बना हुआ है। मंदिर परिसर तक पहुंचने के लिए लोगों को सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं जो सफेद रंग के मार्बल जैसे पत्थरों से निर्मित हैं। मंदिर में तीन गर्भगृह हैं, जिनमें से दो मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं और मुख्य मंदिर मिंधल देवी रानी का मंदिर है। इसके अलावा मंदिर के मुख्य द्वार के पास भी कई भगवानों की मूर्तियां बनायी हुई हैं।

मिंधल मंदिर का कलश मुख्य मंदिर के ऊपर स्थापित होता है। मिंधल माता मंदिर तक पहुंचने का रास्ता कच्चा होने की वजह से काफी मुश्किल भरा होता है। साथ ही मंदिर तक पहुंचने के रास्ते में कहीं भी प्रकाश की व्यवस्था नहीं होने की वजह से यह रास्ता और भी मुश्किलों भरा बन जाता है। मिंधल माता के मंदिर से लगभग 300 मीटर की दूरी तक गाड़ियां पहुंच सकती हैं। बाकी का रास्ता पैदल तय करना पड़ता है।
हर साल लगता है वार्षिक मेला
मिंधल माता मंदिर में हर साल मार्च-अप्रैल के समय 12 दिवसीय जुकारू उत्सव का आयोजन किया जाता है जिसके 9वें दिन नवालू मेले का आयोजन किया जाता है। इस वार्षिक मेले में मिंधल गांव के सभी लोग शामिल होते हैं। मंदिर में इस दिन विशेष पूजा अर्चना होती है जिसके बाद ढोल-नगारों के साथ मेले का आयोजन होता है। इस मेले की खासियत यह है कि इस दिन मिंधल गांव में 9 गृह की पूजा होती है।
जिन घरों में यह पूजा होती है, वे सभी लाल मिट्टी से अपने घरों की लिपाई-पुताई करने के लिए देवी मां के लिए भोग तैयार करते हैं। पहले इस मेले में बलि देने की प्रथा थी लेकिन सरकारी आदेश के बाद अब सिर्फ नारियल व अन्य फलों की सांकेतिक बलि चढ़ाई जाती है। इस मंदिर में हर जम्मु के कटरा व भद्रवाह से पवित्र छड़ी यात्रा भी आती है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।



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