हमारे देश में पहाड़-नदियों से लेकर वन देवी, वन्य जीव, सांप, कछुए यहां तक कि गधे जैसे प्राणी का भी अध्यात्मिक महत्व होता है। हिंदू धर्म को मानने वाले हर संप्रदाय का अपना अलग मंदिर और ईष्ट देव या देवी भी होती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सास-बहू मंदिर के बारे में सुना है?
जी हां, भारत में एक नहीं बल्कि दो-दो जुड़वा मंदिर हैं, जिन्हें सास-बहू मंदिर के नाम से जाना जाता है। इनमें से पहला मंदिर मध्य प्रदेश के ग्वालियर के पास और दूसरा मंदिर राजस्थान में उदयपुर के पास स्थित है। पर इन मंदिरों में किसकी पूजा होती है? सास की...या फिर बहू की?

क्यों है ऐसा अनोखा नाम
राजस्थान हो या मध्य प्रदेश दोनों ही सास-बहू मंदिर में न किसी सास की और न ही बहू की पूजा होती है। बल्कि दोनों जुड़वा मंदिर ही भगवान विष्णु और महादेव जैसे भगवानों को समर्पित है। अब आपके मन में जरूर यह सवाल आया होगा कि तो फिर इन मंदिरों का ऐसा नाम क्यों पड़ा?
दरअसल, दोनों ही मंदिरों में भगवान विष्णु के सहस्रबाहू (हजार हाथ वाला) स्वरूप की पूजा होती है। चुंकि इन मंदिरों में उन क्षेत्रों पर शासन करने वाले तत्कालिन राजपरिवार की सास-बहू की जोड़ी ही पूजा किया करती थी। इसलिए समय के साथ-साथ सहस्रबाहू नाम का अपभ्रंश होकर वह 'सास-बहू' मंदिर में परिवर्तित हो गया।

पहले आपको विस्तार से राजस्थान के सास-बहू मंदिर के बारे में बताते हैं -
राजस्थान के उदयपुर से करीब 23 किमी की दूरी पर स्थित नागदा गांव में मौजूद है सास-बहू मंदिर। नागदा मेवाड़ के शासकों का एक महत्वपूर्ण शहर रह चुका है। मिली जानकारी के अनुसार यह मंदिर 10वीं सदी के अंत या 11वीं सदी के शुरुआत में बनायी गयी थी। इतिहासकारों का दावा है कि यहां कच्छवाहा राजवंश के राजा महिपाल सिंह ने अपनी विष्णुभक्त रानी के लिए सबसे पहले भगवान विष्णु (सहस्रबाहू) का एक मंदिर बनवाया था।

कुछ समय बाद जब रानी के पुत्र की शादी हुई तो उसकी बहू भगवान शिव की भक्त निकली। तब राजा ने यहां अपनी बहू के लिए भगवान शिव (वीरभद्र) का मंदिर भी बनवा दिया। इन दोनों मंदिरों में भगवान विष्णु का मंदिर थोड़ा बड़ा है, इसलिए उसे सास और महादेव का मंदिर थोड़ा छोटा है। इसलिए उसे बहू मंदिर कहा जाने लगा। मंदिर के प्रवेश द्वार पर देवी सरस्वती, भगवान ब्रह्मा और विष्णु की मूर्तियां सजी हुई हैं। मंदिर की दीवारों पर रामायण, श्रीराम और परशुराम आदि की मुर्तियां खुदी हुई हैं।

कहा जाता है कि 1226 में जब दिल्ली का सुल्तान इल्तुतमिश ने नागदा को नष्ट किया, तब उसने इस मंदिर को चुना और बालू से चुनवा दिया था। मुगलों में भगवान विष्णु के साथ शिव की मूर्तियों को भी खंडित कर दिया था। बाद में भारत में जब अंग्रेज आएं तो उन्होंने इस मंदिर को फिर से खुलवाया था।
मध्य प्रदेश में भी एक सास-बहू मंदिर -

मध्य प्रदेश में ग्वालियर के पास भी एक सास-बहू मंदिर स्थित है जो 11वीं सदी में बना बताया जाता है। बताया जाता है कि इस मंदिर में भगवान विष्णु पद्मनाभ स्वरूप में विराजमान हैं। इस मंदिर का नाम भी सहस्रबाहू ही था लेकिन लोगों को यह नाम बोलना नहीं आता था और नतीजा हुआ कि इसे सास-बहू मंदिर के नाम से जाना जाने लगा। विदेशी आक्रमणकारियों के कारण इस मंदिर का शिखर और गर्भगृह पूरी तरह से नष्ट हो चुका है। लगभग 3 मंजीला ऊंची यह मंदिर 19 मीटर चौड़ा है।

मंदिर में तीन अलग-अलग दिशाओं से 3 प्रवेश द्वार हैं और चौथी दिशा में एक कमरा बना हुआ है। इस कमरे को अब बंद रखा जाता है। लंबा अर्सा बीत जाने की वजह से मंदिर को काफी नुकसान तो पहुंचा है लेकिन इसकी दिवारों पर आज भी नक्काशियां बनी हुईं हैं। इन्हें देखकर ही पता चलता है कि अपने समय में यह मंदिर काफी शानदार हुआ करता था। बता दें, राजस्थान के सास-बहू मंदिर की तरह ही मध्य प्रदेश का सास-बहू मंदिर भी जुड़वा मंदिर है।



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