देश के प्राचीनतम मंदिरों में गिना जाता है तमिलनाडू का बृहदेश्वर मंदिर। चोल राजवंश की शानदार वास्तुकला का उत्कृष्ठ उदाहरण है तमिलनाडु के तंजौर में स्थित यह मंदिर जिसका निर्माण 11वीं सदी शुरुआत में किया गया था। इस मंदिर के निर्माण से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो लोगों को चौंका देती हैं। UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल इस मंदिर का निर्माण कावेरी नदी के तट पर चोल शासक राजराज चोल प्रथम ने करवाया था।

इस वजह से ही भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर को राजराजेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
बिना किसी नींव के हजारों सालों से खड़ा है
कहा जाता है कि किसी भी इमारत की मजबुती उसकी नींव पर ही निर्भर करती है। नींव जितना मजबुत होगा, इमारत उतने ही लंबे समय तक टीका रहेगा। लेकिन तंजौर, तमिलनाडु का बृहदेश्वर मंदिर एक ऐसा मंदिर है जिसकी कोई नींव ही नहीं है। आश्चर्यजनक रूप से हजारों सालों से यह मंदिर टिका हुआ है।

मंदिर की ऊंचाई लगभग 13 मंजिला है, जिसकी ऊंचाई लगभग 66 मीटर है। इस पूरे मंदिर का निर्माण ग्रेनाइट से किया गया है। इस वजह से यह मंदिर दुनिया भर में अपने-आप में एकलौता भी है। संभवतः बृहदेश्वर मंदिर ही दुनिया में एकलौता मंदिर है, जो पूरी तरह से सिर्फ ग्रेनाइट से ही बनाया गया है।
मंत्रमुग्ध करती है मंदिर की भव्यता
बृहदेश्वर मंदिर की भव्यता लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है। इस मंदिर की वास्तुकला इतनी शानदार है कि इसे देखकर ही समझ में आता है कि चोल राजवंश के कलाकार कितने अधिक प्रतिभावान थे। इस मंदिर की वास्तुशिल्प और गुंबद बहुत शानदार है। मंदिर के शिखर पर एक स्वर्णकलश है।

यह स्वर्णकलश जिस पत्थर पर स्थित है, उसका वजन करीब 80 टन का है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि इतने भारी पत्थर को मंदिर के शिखर तक कैसे पहुंचाया गया होगा। क्योंकि हजारों साल पहले चोल राजवंश के समय क्रेन आदि की सुविधाएं तो नहीं होती थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर के गुंबद की परछाई जमीन पर नहीं पड़ती है।
3000 हाथियों ने किया था श्रमदान
बृहदेश्वर मंदिर में भगवान शिव और उनके वाहन नंदी महाराज की विशालाकार मूर्ति स्थापित है। नंदी की मूर्ति भी ग्रेनाइट पत्थर से ही बनी हुई है, जिसकी ऊंचाई 13 फीट है। इस विशालाकार मूर्ति का निर्माण एक ही पत्थर को काट कर किया गया है। मंदिर में स्थापित इतने विशाल शिवलिंग की वजह से ही इस मंदिर का नाम बृहदेश्वर मंदिर रखा गया था। इस मंदिर के निर्माण 130,000 टन ग्रेनाइट पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था।

खास बात यह है कि तमिलनाडू के तंजौर में जहां यह मंदिर स्थित है, उसके आसपास कहीं भी ग्रेनाइट पत्थरों का कोई पहाड़ मौजूद नहीं है। तो फिर इस मंदिर के निर्माण में इतने ग्रेनाइट पत्थर कहां से आएं? कहा जाता है कि इस स्थान तक ग्रेनाइट पत्थरों को दुनियाभर के कोने-कोने से लाया गया था। इन्हें यहां तक पहुंचाने में 3000 हाथियों की मदद ली गयी थी।
सीमेंट नहीं पज़ल से जोड़े गए पत्थर

बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण ग्रेनाइट पत्थरों से किया गया था, जिन्हें दुनिया का सबसे सख्त पत्थर कहा जाता है। इन पत्थरों को तराशकर ही मंदिर का निर्माण किया गया था। इन पत्थरों को जोड़ने के लिए सीमेंट, प्लास्टर या फिर सरिया का इस्तेमाल नहीं किया गया था। पूरे मंदिर के निर्माण में पत्थरों को जोड़ने के लिए पजल तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। जी हां, पत्थरों को पजल की तरह एक-दूसरे के साथ फंसाकर ही इस मंदिर का निर्माण किया गया था।
कब जाएं और कैसे पहुंचे बृहदेश्वर मंदिर

तमिलनाडु में पूरे साल ही उष्णकटिबंधिय जलवायु बनी रहती है। यहां गर्मियों में काफी चिलचिलाती धूप होती है। इस धूप में पत्थरों पर चलना मुश्किल हो सकता है। इसलिए कोशिश करें जब हल्की बारिश या मानसून के शुरुआती या आखिर का समय जब बारिश कम हो जाती है, तभी यहां आएं। इसके अलावा सर्दियों का मौसम बृहदेश्वर मंदिर जाने के लिए बेस्ट होता है।
कैसे पहुंचे
तंजौर का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट तिरुचिरापल्ली एयरपोर्ट है। जो यहां से 1 घंटे की दूरी पर मौजूद है। दोनों शहरों से नियमित रूप से टैक्सी और बस सेवाएं चलती हैं। चेन्नई, बैंगलोर, मदुरै, कोयंबटूर जैसे शहरों से तंजौर सड़क मार्ग से पूरी तरह से जुड़ा हुआ है। तंजौर का सबसे नजदीकी स्टेशन तिरुचिरापल्ली स्टेशन ही है। तंजौर का सबसे नजदीकी बंदरगाह चेन्नई बंदरगाह है। यदि कोई पर्यटक जलमार्ग से तंजौर जाना चाहे तो वह चेन्नई बंगरगाह पर उतरकर वहां से बृहदेश्वर मंदिर के लिए टैक्सी या गाड़ी बुक कर सकता है।



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