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महादेव के इस मंदिर में भगवान को चढ़ाया जाता है झाडू, क्यों होता है ऐसा और कहां है यह मंदिर?

मंदिरों में भगवान को फल, मिठाई, पुरी-पकवान और 56 भोग चढ़ाने के बारे में तो आपने अक्सर सुना ही होगा। लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है जहां भगवान को झाडू चढ़ाया जाता है। जी हां, पवित्र सावन के महीने में भगवान शिव के एक ऐसे ही मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जहां भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान को झाडू चढ़ाते हैं।

भगवान शिव की पूजा के लिए बेलपत्र, दुध, दही, गंगाजल, भांग-धतुरा आदि को अनिवार्य माना जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के पास महादेव का एक मंदिर ऐसा भी है, जहां झाडू चढ़ाने की मान्यता है।

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कहां है यह मंदिर?

यह मंदिर उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में बहजोई नगर से लगभग 7 किमी की दूरी पर मौजूद सादातबाड़ी गांव में है। इस मंदिर का नाम पातालेश्वर मंदिर है। आसपास के लोगों के अलावा अपनी विशेष मान्यताओं की वजह से यह मंदिर दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात आदि राज्यों में भी काफी मशहूर है। यहां दूर-दराज के इलाकों से लोग अपनी मनोवांछित इच्छा को पूरी करने के उद्देश्य से भगवान को झाडू चढ़ाने आते हैं।

क्यों चढ़ाया जाता है झाडू?

भगवान शिव के पातालेश्वर मंदिर में भक्त चर्म रोग से मुक्ति पाने के लिए झाडू चढ़ाते हैं। इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1902 में हुई थी। कहा जाता है कि उस समय से ही मंदिर में भगवान शिव को झाडू चढ़ाने का प्रचलन है। इस मंदिर के पास ही नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर के तर्ज पर बना एक और भगवान शिव का मंदिर भी मौजूद है, जिसमें 501 शिवलिंग स्थापित हैं। यहां भगवान को चढ़ाने के लिए झाडू लेकर आने की जरूरत नहीं होती है। बल्कि मंदिर परिसर में ही कई दुकानें हैं जहां भगवान को चढ़ाने के लिए झाडू किफायती कीमतों पर मिल जाती है।

क्या है मान्यता?

कहा जाता है कि पातालेश्वर महादेव के इस मंदिर का निर्माण बहजोई के पूर्व जमींदार साहू भिखारीदास ने की। इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं बहुत प्रचलित हैं। उनमें से एक मान्यतानुसार भिखारीदास को महादेव ने सपने में अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाया था। जब भिखारीदास ने उस स्थान की खोज की तो वह सादातवाड़ी में मिली। यहां साहू को एक पत्थर दिखाई दिया।

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साहू ने उस स्थान की खुदाई शुरू करवा दी। कहा जाता जाता है कि खुदाई कर शिवलिंग के आकार के उस पत्थर को जितना बाहर निकाला जाता वह शिवलिंग उतना ही जमीन के अंदर धंसता चला जाता। खुदाई करते हुए जब जमीन से पानी निकल आया तो भिखारीदास उसकी गहराई नापने के लिए गड्डे में उतरा। लेकिन ऐसा करते ही उसकी आंखों की रोशनी चली गयी। फिर जब भिखारीदास और उसके पिता तुलाराम ने भगवान शिव से माफी मांगी तब जाकर उसकी आंखे ठीक हो सकी। इसके बाद ही भिखारीदास ने मंदिर का निर्माण शुरू करवा दिया।

दूसरी मान्यता के अनुसार गांव में भिखारीदास नामक एक धनी व्यापारी रहता था, जो चर्म रोग से पीड़ित था। वह अपना इलाज करवाने कहीं जा रहा था। रास्ते में उसे प्यास लगी। वह भगवान शिव के इस मंदिर में पानी पीने आ गया और यहां उस वक्त झाडू लगा रहे एक महंत से ठकरा गया। ऐसा होते ही बिना इलाज के ही उसका चर्म रोग दूर हो गया।

कहा जाता है कि महंत को खुश होकर जब व्यापारी ने काफी धन देना चाहा तो महंत ने पैसे लेने से मना कर दिया। बदले में उससे मंदिर को भव्य बनाने का अनुरोध किया। व्यापारी ने यहां भगवान शिव का बड़ा मंदिर बनवा दिया और तभी से यहां यह बात प्रचलित हो गयी कि भगवान शिव को झाडू चढ़ाने से चर्म रोगों से मुक्ति मिल जाती है।

आज भी श्रद्धालु यहां चर्म रोगों से मुक्ति के लिए भगवान शिव को झाडू चढ़ाने के लिए आते हैं। इस मंदिर के प्रति स्थानीय लोगों के मन में गहरी आस्था है।

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